भारत के साथ रिश्ते पर पाकिस्तान की फ़ौज के सामने इमरान ख़ान की कितनी चलेगी?

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- Author, वात्सल्य राय
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
ऑस्ट्रेलिया में लिखी गई जीत की ये कहानी अमर है.
इमरान अहमद ख़ान नियाज़ी 25 मार्च, 1992 के बाद किसी और मैदान पर न भी उतरते तो भी पाकिस्तानी इतिहास के सबसे बड़े नायकों में गिने जाते.
क्रिकेट के पांचवें वर्ल्ड कप में उन्होंने अपनी करिश्माई कप्तानी के जरिए उस टीम को ट्रॉफी जीतने की राह दिखाई, जो शुरुआती पांच में से सिर्फ़ एक मैच जीत सकी थी.
जिसके खिलाड़ी हौसला हार चुके थे और नाकामी की यादों के साथ खाली हाथ घर लौटने की तैयारी में थे.

लेकिन इमरान ख़ान ने नाउम्मीदी की राख को आग में बदल दिया और पाकिस्तान की हर विरोधी टीम झुलसती गई. हाशिए पर खड़ी टीम चमत्कारिक ढंग से वर्ल्ड चैंपियन बन गई.
करिश्मा, किस्मत और कामयाबी
26 साल बाद इमरान ख़ान एक और मैदान पर विजेता बनकर उभरे. 65 बरस के हो चुके इमरान ने इस जीत के लिए पूरे 22 साल संघर्ष किया. इस दौरान नाकामी दर नाकामी के बीच आलोचकों ने उनका नाम तक बदल दिया. उन्हें इमरान 'कान्ट' कहा जाने लगा. यानी 'इमरान से नहीं हो पाएगा'.
अब वही इमरान ख़ान पाकिस्तान की सरकार के मुखिया यानी प्रधानमंत्री हैं.
भ्रष्टाचार के ख़िलाफ उनका संघर्ष और नया पाकिस्तान बनाने का नारा वोटरों को भा गया.

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इस्लामाबाद में मौजूद बीबीसी उर्दू के संवाददाता आसिफ फारुकी कहते हैं कि इमरान ख़ान की कामयाबी में करिश्मे के साथ किस्मत की भी बड़ी भूमिका है.
वो कहते हैं, "1992 के वर्ल्ड कप पर नज़र डालें तो इमरान ख़ान की कप्तानी की ख़ूबियों के साथ-साथ पाकिस्तान टीम की जीत में किस्मत का भी बड़ा अहम किरदार था. इसी तरह राजनीति में भी इमरान ख़ान किस्मत के धनी साबित हो रहे हैं. उन्होंने 2014 में धरना दिया जो तीन-चार महीने चला."
"लेकिन वो नवाज़ शरीफ को हटाने में कामयाब नहीं हुए. लेकिन फिर अचानक पनामा का मुद्दा सामने आया और वो नवाज़ शरीफ को ले डूबा."
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कांटों का ताज
किस्मत कुर्सी दिला सकती है लेकिन पाकिस्तान में प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठना आसान नहीं. इस जिम्मेदारी को कांटों का ताज कहा जाता है.
पाकिस्तान के अख़बार डॉन के वरिष्ठ पत्रकार ख़ुर्रम हुसैन याद दिलाते हैं, "25-30 साल से हमारे देश का ये इतिहास रहा है कि चुनाव के बाद जो प्रधानमंत्री शपथ लेता है, वो अपना कार्यकाल पूरा नहीं कर पाता है. क्या अब वो इतिहास बदलेगा? इमरान के सामने बहुमत बनाए रखने की चुनौती है. वो किस तरह दूसरी पार्टियों को साथ ला पाते हैं. उन्हें हाथ जोड़कर कहना होगा कि अब हमें साथ-साथ चलना है. इस पर बहुत कुछ निर्भर करेगा कि वो क्या नीति अपनाते हैं."
राजनीतिक विश्लेषक दावा करते हैं कि इमरान ख़ान के सामने मुश्किलों का ऐसा पहाड़ है, जिसे पार करना उनकी ज़िंदगी का सबसे बड़ा इम्तिहान साबित हो सकता है.
पाकिस्तान की वरिष्ठ पत्रकार मरियाना बाबर नए प्रधानमंत्री की चुनौतियों की बात करती हैं, "ये क्रिकेट नहीं है. ये ऑस्ट्रेलिया नहीं है. ये है पाकिस्तान जो बड़े अर्से से बहुत सी दुश्वारियों का सामना कर रहा है. सबसे बड़ी चुनौती पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था है, जो बड़े बुरे हाल में है."
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मुश्किल में अर्थव्यवस्था
आम चुनाव के काफी पहले से ही अर्थशास्त्री पाकिस्तान के वित्तीय संकट का मुद्दा उठा रहे हैं. महंगाई बढ़ रही है. विदेशी मुद्रा भंडार और निर्यात घट रहा है. पाकिस्तानी रुपया गोते लगा रहा है और जून 2018 में चालू खाता घाटा बढ़कर 18 अरब डॉलर तक पहुंच गया था.
इमरान ख़ान भी आर्थिक चुनौतियों की बात लगातार करते रहे हैं.
बतौर प्रधानमंत्री पहले संबोधन में उन्होंने कहा, "मैं आज अपनी कौम से आप सबके सामने कहता हूं कि मैं आपको सादा ज़िंदगी गुजारकर दिखाऊंगा. मैं आपका एक-एक पैसा बचाकर दिखाऊंगा."
मरियाना बाबर कहती हैं कि प्रधानमंत्री के इस अंदाज़ की कुछ हलक़ों में तारीफ भी हो रही है.
वो कहती हैं, "कुछ ऐसे उपाय इमरान ख़ान ख़ुद ले रहे हैं, जिनमें बहुत पैसे तो नहीं बचेंगे लेकिन एक रिवाज़ शुरू हो गया है. प्रधानमंत्री का बहुत बड़ा घऱ था, वो उससे निकल गए हैं."

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करिश्मा काम आएगा?
लेकिन, प्रधानमंत्री के ऐसे ऐलानों को असल चुनौतियों के मुक़ाबले परखने वाले ज़्यादा प्रभावित नहीं हैं.
ख़ुर्रम हुसैन कहते हैं, "आपने प्रवासियों के लिए एक बॉन्ड ला दिया या फिर आपने प्रवासियों से मदद मांगी और उन्होंने कुछ चंदा इकट्ठा करके जमा कर दिया. या फिर आपने किसी और मुल्क के बैंकिंग सिस्टम के साथ कार्रवाई की जो आप कह रहे हैं कि लूटे हुए पैसे वापस लाएंगे. लेकिन इनसे आपका आर्थिक संकट दूर नहीं होता. संकट तब दूर होगा जब निर्यात और निवेश बढ़ेगा. जब आप अपनी मुद्रा का सही तरह से प्रबंधन कर सकें."
ख़ुर्रम हुसैन ये भी कहते हैं कि पाकिस्तान, सऊदी अरब, चीन और आईएमएफ से बेल आउट पैकेज लेने के विकल्प पर विचार कर रहा है लेकिन इससे सरकार के हाथ बंध सकते हैं. वो बेनज़ीर भुट्टो का उदाहरण देते हुए कहते हैं कि प्रधानमंत्री का करिश्माई होना मुश्किल ख़त्म होने की गारंटी नहीं देता.
हालांकि, एक तबका ऐसा भी है जो दावा करता है कि इमरान ख़ान मुश्किल का ये दौर पार कर लेंगे. बीबीसी के आसिफ फारुकी कहते हैं, "आज तक चुनाव के बाद ऐसी कोई सरकार नहीं आई जिसने कहा हो कि हमारा ख़जाना भरा हुआ है और हमें आर्थिक दिक्कतें नहीं हैं. हर बार कहा जाता है कि पाकिस्तान तारीख़ के मुश्किल दौर से गुज़र रहा है. लेकिन हर बार कुछ न कुछ गुजारा हो जाता है."
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दहशतगर्दी पर कैसे लगेगी रोक?
लेकिन, चुनौतियां सिर्फ़ यहीं ख़त्म नहीं होती. दहशतगर्दी को काबू करने की चुनौती पर इमरान ख़ान खरे उतर पाएंगे, इस पर भी कई विश्लेषक शक जताते हैं.
मरियाना बाबर कहते हैं, "दहशतगर्दी बहुत बड़ी चुनौती है. पाकिस्तान में अभी भी दहशतगर्द पनाह लेते हैं और यहां से हिंदुस्तान और अफ़गानिस्तान में सरगर्मी करते हैं. क्या इमरान ख़ान इसे बंद कर सकेंगे? हम जिस इमरान ख़ान को जानते हैं, उनकी इन दहशतगर्दों और तालिबान के ख़िलाफ आवाज़ हमने नहीं सुनी है."
मरियाना बाबर ये दावा भी करती हैं कि नॉन स्टेट एक्टर्स यानी ऐसी शक्तियां जो सरकार के काबू में नहीं हैं, वो इमरान ख़ान की विदेश नीति को भी प्रभावित कर सकती हैं.
वो कहती हैं, "मुझे ये डर है कि जब भी पाकिस्तान में निर्वाचित प्रधानमंत्री आता है और हिंदुस्तान की तरफ दोस्ती का हाथ बढ़ाता है तो हम यहां से कुछ न कुछ देख लेते हैं. आपने करगिल देखा. आपने मुंबई में चरमपंथ देखा और पठानकोट देखा. इस तरह के नॉन स्टेट एक्टर को इमरान ख़ान बंद नहीं कर सकते. ये आप लिख लें. हमारे पाकिस्तान के जो नॉन स्टेट एक्टर हैं, वो सीधे पाकिस्तान की फ़ौज के नीचे हैं."
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रिश्ते सुधारने की राह में रोड़े
इमरान ख़ान के लाख इनकार के बाद भी आम चुनाव के दौरान विरोधी लगातार आरोप लगाते रहे कि उनकी पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ को फ़ौज का समर्थन हासिल है. लेकिन विश्लेषक सवाल करते हैं कि अगर विदेश नीति के जटिल मसलों पर इमरान ख़ान ने स्वतंत्र दिशा चुनी तो फ़ौज का रुख क्या होगा?
ख़ासकर भारत के साथ दोस्ती के लिए दो कदम बढ़ाने का दावा कैसे सच होगा?
ख़ुर्रम हुसैन अमरीका और चीन के साथ तालमेल बिठाने को भी इमरान ख़ान के लिए चुनौती बताते हैं.
"हमारे दौर में एक नया किरदार सामने है, वो चीन है. चीन पहले इस क्षेत्र से दूर रहता था. लेकिन अब वो करीब आ गया है. उसने यहां निवेश किए हैं. उसके यहां रणनीतिक हित हैं. अभी लग रहा है कि पाकिस्तान अमरीका और चीन के बीच खड़ा है. हमारे क्षेत्र में इन दोनों देशों की प्रतिस्पर्धा बढ़ने वाली है."
यानी पाकिस्तान के नए सियासी कप्तान के हर कदम पर चुनौतियां हैं. उन्होंने तज़ुर्बेकार लोगों की टीम तैयार की है. लेकिन अगर ये टीम जल्दी ही तमाम चुनौतियों पर जीत हासिल करने का फॉर्मूला नहीं खोज सकी तो इमरान नया पाकिस्तान बनाने का वादा कैसे पूरा करेंगे? अर्थव्यवस्था को कैसे पटरी पर लाएंगे? अमरीका और भारत से कैसे रिश्ते सुधारेंगे? ये सवाल हर दिन मुश्किल होते जाएंगे.


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