पाकिस्तानः नई सरकार में पहले 100 दिन क्या करेंगे इमरान ख़ान

पाकिस्तान, इमरान खान

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    • Author, शुमाइला जाफरी
    • पदनाम, पाकिस्तान से, बीबीसी संवाददाता

'नए पाकिस्तान' में जब इमरान ख़ान इस देश के नए प्रधानमंत्री की ज़िम्मेदारी उठाई है तब पाकिस्तान की जनता दम साधे देख रही है आने वाले दिनों की तरफ़.

नए पाकिस्तान के समर्थकों में तो रोमांच है ही, लेकिन इमरान के आलोचक भी नज़रें लगाए बैठे हैं कि पाकिस्तान को बदलने का नारा लगाने वाले अब देश में कैसे बदलाव लेकर आते हैं.

चुनावी अभियान के दौरान आरोप लगाना और गाली गलौच ख़ूब होती रही और इस तल्ख़ी की एक दलील तो हमेशा यही दी जाती रही कि जलसे का माहौल और होता है और सरकार के सदनों का माहौल और.

बदले हुए माहौल की एक झलकी पूरी दुनिया 26 जुलाई को देख चुकी है. जब एक भाषण में इमरान ख़ान ने अपनी जीत का एलान किया. वही सफ़ेद कुर्ता सलवार, गले में वही पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ़ के रंगों का मफ़लर और वही बनी गाला का कमरा. अगर कुछ बदला हुआ था तो इमरान ख़ान के शब्द और लहजा.

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उनके भाषण को लगभग सभी वर्गों में अच्छी नज़र से देखा गया. उनके समर्थक और विरोधी इस बात पर सब सहमत हैं कि उस दिन वो इमरान नज़र आए जो पहले कभी देखने को नहीं मिले.

सरकार बनाने की जोड़तोड़, पुराने विरोधियों को वर्तमान का सहयोगी बनाने का सफ़र भी तहरीक-ए-इंसाफ़ ने क़रीब एक ही दिन में तय कर लिया.

पंजाब की पेचीदा परिस्थितियों को लेकर मीडिया में काफ़ी ले-दे होती रही और सबसे बड़ी आलोचना यही रही कि पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ़ का होमवर्क ही अच्छा नहीं था.

अब जब सरकार बन गई है तो सबकी नज़रें पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ़ के पहले सौ दिनों के कार्यकाल के प्लान पर है.

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पहले 100 दिन में क्या होगा?

पीटीआई ने पाकिस्तान की आर्थिक परिस्थितियों को बदलने, देश को मज़बूत करने, सामाजिक सेवाओं और शासन को बेहतर बनाने, कृषि क्षेत्र की कमियों को दूर करने, बलूचिस्तान में सुरक्षा व्यवस्था बनाने और दक्षिणी पंजाब को अलग राज्य बनाने, आम आदमी का जीवन बेहतर करने समेत ऐसे वादे किए हैं जो पूरे होंगे तो पाकिस्तान जन्नत ना सही, जन्नत जैसा तो बन ही सकता है.

लेकिन ये होगा कैसे? जब ये सवाल मैंने किया पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ़ के नेता चौधरी मोहम्मद सरवर से तो उनका कहना था कि पीटीआई के सौ दिन के मंसूबे को मीडिया में सही समझा ही नहीं गया. चौधरी सरवर का कहना था कि सौ दिनों में इमरान ख़ान की सरकार और शासन की दिशा ही तय होगी और ये सब वादे जो किए गए हैं इनके पूरे होने में समय लगेगा.

विश्लेषक सुहैल वडोच कहते हैं कि ''किसी भी सरकार के पहले सौ दिन तो हनीमून के हैं और उन्हीं सौ दिनों में नई सरकार के बारे में जनता की राय बनती है. अब देखना ये है कि क्या पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ़ सौ दिनों में लोगों में सकारात्मक और अच्छी राय पैदा कर पाएगी. क्या जनता को ये जता पाएगी वो सही दिशा में आगे बढ़ रही है."

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भारत से रिश्ते कैसे होंगे?

राजनीतिक विश्लेषक रसूल बख़्श कहते हैं कि जिन मामलों के बारे में पीटीआई ने अपने मंसूबों में बात की है पाकिस्तान के इतिहास में उनका उदाहरण नहीं मिलता. उनका मानना है कि आम तौर पर तो पार्टियां महज़ मंत्रालय बांटने की तैयारी करती हैं ना कि शासन की.

"पीटीआई ने पहले ही देश के मुद्दों की पहचान कर ली है. अब सरकार इनके हाथों में है. जनता के उन पर भरोसे और बदलाव के उनके नारों का तक़ाज़ा है कि वो अपने मंसूबों पर अमल करें. वो ऐसा करने की क्षमता रखते हैं."

इमरान ख़ान इससे पहले स्वतंत्र विदेश नीति के बहुत बड़े समर्थक रहे हैं. अमरीका हो या भारत, सभी के साथ रिश्तों की प्रकृति पर उनकी आलोचना बेरहमाना रही है. अब देखना ये है कि उनकी अपनी सरकार अलग-अलग देशों से रिश्तों को कैसे आगे बढ़ाती है.

अपने चुनावी अभियान में वो नवाज़ शरीफ़ को "मोदी का यार" कह चुके हैं. लेकिन अपने पहले ही भाषण में उन्होंने भारत को संबोधित करके कहा कि अगर वो एक क़दम उठाएंगे तो पाकिस्तान रिश्ते बेहतर करने के लिए दो क़दम उठाएगा.

क्या ये खुला विरोधाभास नहीं? पीटीआई के चौधरी सरवर का कहना था कि "हमने कभी ये नहीं कहा कि हम अमरीका और भारत के साथ जंग का एलान कर देंगे."

चौधरी सरवर कहते हैं कि तहरीक-ए-इंसाफ़ बराबरी के स्तर पर देशों के साथ रिश्ते स्थापित करेगी और किसी के सामने झुकेगी नहीं और भारत प्रशासित कश्मीर में जारी मानवाधिकार उल्लंघनों पर आवाज़ उठाती रहेगी.

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अर्थव्यवस्था सुधरेगी?

अब बराबरी की पीटीआई की क्या परिभाषा है इसका पता तो कुछ दिनों बाद ही चलेगा. लेकिन जिन मुश्किल आर्थिक हालातों में इमरान ख़ान ने देश की कमान अपने हाथों में ली है, विदेशी संस्थानों की मदद के बग़ैर अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाना नामुमकिन ही होगा. वो इस मक़सद के लिए किन देशों पर ज़्यादा भरोसा करते हैं ये तो आने वाले दिनों में ही पता चल सकेगा.

लेकिन सुहैल वडोच कहते हैं कि ''उनके पास ज़्यादा विकल्प मौजूद नहीं हैं. उन्हें मामलों को अच्छे तरीके से आगे बढ़ाने के लिए विपक्ष से तालमेल भी चाहिए होगा और दूसरे देशों का सहयोग भी. वरना न तो आर्थिक प्रगति हो सकेगी न ही क़ानून व्यवस्था बरक़रार रह सकेगी.''

रसूल बख़्श समझते हैं कि अगर इमरान ख़ान अपने सौ दिन के मंसूबों पर अमल न करें तो उनके वोटरों में मायूसी पैदा होगी.

"कुछ मामले तो इमरान के अपने हाथ में होंगे, लेकिन कुछ के लिए उन्हें विपक्ष का सहयोग चाहिए होगा और विपक्ष का सहयोग उनके अपने सियासी फ़ायदे या नुक़सान से तय होगा."

इमरान ख़ान की लोकप्रियता की सबसे बड़ी वजह ये है कि जनता उन्हें पारंपरिक राजनेता नहीं समझती, बल्कि एक ऐसे व्यक्ति के तौर पर जानती है जो किसी बात की ठान ले तो उसे करके दिखाता है. अब देखना ये होगा कि सियासत की मजबूरियां उनकी इस ख़ासियत को कायम रहने देती है या नहीं.

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