आप्रवासियों को लेकर इटली के 'आक्रामक इरादे'

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- Author, कुलदीप मिश्र
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
लियोनार्डो दा विंची की कलाकृतियां, फेडरिको फेलीनी का सिनेमा, वेनिस और रोम का वास्तुशिल्प, पुचीनी और वर्दी का ओपेरा और समृद्ध लोकसंगीत.
ये इटली के सांस्कृतिक ख़ज़ाने के वो नगीने हैं, जिनके लिए वह दुनिया में प्रसिद्ध है. लेकिन इटली कुख्यात भी है, अपने अस्थिर राजनीतिक इतिहास के लिए. दूसरे विश्व युद्ध के बाद से इटली में अब तक 66 सरकारें बदल चुकी हैं.
मार्च 2018 में हुए चुनावों के बाद लगभग तीन महीने की अस्थिरता से गुज़रकर इटली को आख़िर एक नया प्रधानमंत्री मिला है.
लेकिन क़ानून के प्रोफेसर जुसेप कोंते के लिए यह चुनौती इसलिए भी मुश्किल है क्योंकि वह मजबूरी में साथ आए दो बेमेल विचार वाले दलों की गठबंधन सरकार के मुखिया हैं.
यह गठबंधन है व्यवस्था विरोधी- फाइव स्टार मूवमेंट पार्टी और धुर दक्षिणपंथी पार्टी लेगा यानी नॉर्थ लीग के बीच.
सरकार में साझेदारी के तहत गृह मंत्री का पद लीग पार्टी के नेता मात्तेओ सलवीनी को मिला है और पद संभालते ही उन्होंने अपने आक्रामक आप्रवासी विरोधी इरादे स्पष्ट कर दिए हैं.
इटली में अफ्रीका से आते हैं आप्रवासी
इटली की भौगोलिक स्थिति ये है कि उसका दक्षिणी सिरा अफ्रीकी महाद्वीप से महज़ 230 किलोमीटर दूर है. ख़ासी संख्या में अफ्रीका से आप्रवासी इटली के दक्षिणी द्वार सिसिली पहुंचते हैं. इसीलिए पद संभालने के बाद मात्तेओ सलवीनी अपना संदेश साफ करने सबसे पहले सिसिली पहुंचे और वहां उनका खुली बांहों से स्वागत भी हुआ और थोड़ा विरोध भी हुआ.

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मात्तेओ की लीग पार्टी मानती है कि इन आप्रवासियों के आने से इटली में रोज़गार की स्थिति बदतर हुई है.
सिसिली में उन्होंने कहा, "ज़िंदग़ियां बचाने का सर्वश्रेष्ठ तरीक़ा ये है कि लोगों को नावों पर सवार होने से रोका जाए. मैं यूरोपीय सहयोगियों और उत्तरी अफ्रीकी देशों के साथ इस पर काम करूंगा, ताकि उन हज़ारों लोगों का ये भ्रम टूटे कि इटली में सबके लिए घर और नौकरी है. यहां इतालवी लोगों के लिए भी घर और नौकरियां नहीं हैं."
मात्तेओ का मत ये भी है कि सिर्फ नए आप्रवासियों को रोकने से काम नहीं चलेगा, बल्कि जो पहले आ चुके हैं, उन्हें जल्द वापस भी भेजना होगा. ये बात अगर बयान से आगे बढ़ती है तो इटली के रुख़ में अब तक के रुझान में यह एक बड़ा बदलाव होगा. फ्रांस में मौजूद वरिष्ठ पत्रकार वैजू नरावने इसके लिए कुछ हद तक यूरोप को भी ज़िम्मेदार मानती हैं.
वह कहती हैं, "आज तक इटली ऐसा देश था, जिसने कभी बाहर से आने वाले लोगों को मना नहीं किया था. पहली बार हम देख रहे हैं कि इटली का मूड उनके ख़िलाफ़ हो गया है. उसकी वजह यूरोपीय संघ ही है. इटली का एक लंबा चौड़ा समुद्री किनारा है, जहां से शरणार्थी आते हैं, लेकिन यूरोप ने इस आप्रवासी समस्या का सामने करने में कभी इटली का हाथ नहीं बंटाया. तो आज जो हम देख रहे हैं, उसमें यूरोपीय संघ की भी कुछ ज़िम्मेदारी है."

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उत्तर और दक्षिण का भेद
इटली का राजनीतिक इतिहास भी विविधतापूर्ण रहा है. 19वीं सदी के मध्य में इटली में राष्ट्रवादी भावना उभरी. कई सालों के विदेशी प्रभाव से मुक्त होकर 1871 तक इटली लगभग एकीकृत हो चुका था और एक बड़ी शक्ति बन गया था.
इसके बाद पहले विश्वयुद्ध में जीत और फिर राजनीतिक अस्थिरता का वक़्त आया. फासिस्ट पार्टी के बेनितो मुसोलिनी इटली के तानाशाह बन गए. लेकिन दूसरे विश्व युद्ध में इटली की हार हुई और 1946 में जनमत संग्रह के बाद इटली को गणतंत्र घोषित किया गया.
19वीं सदी के आखिर और 20वीं सदी की शुरुआत तक इटली में तेज़ी से औद्योगीकरण हुआ, लेकिन सिर्फ उत्तरी हिस्सों में, दक्षिण में नहीं. आज भी इटली की ज़्यादातर संपदा उत्तर में ही है और दक्षिणी हिस्सा आर्थिक तौर पर उतना मज़बूत नहीं है. यह भेद अब तक बना हुआ है और उसका असर चुनावों में भी दिखता है.

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लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में राजनीति शास्त्र के प्रोफेसर जॉनाथन हॉपकिन मानते हैं कि मात्तेओ सलवीनी की यह जल्दबाज़ी और आक्रामकता अपनी पार्टी के समर्थकों को आश्वस्त करने के लिए है, जो मूलत: उत्तरी इटली में ही बसते हैं. वो ये भी कहते हैं कि शरणार्थियों को वापस भेजना क़ानूनी तौर पर एक टेढ़ी खीर होगा.
उनके मुताबिक, "इटली की न्यायिक प्रक्रिया काफ़ी जटिल और आम तौर पर धीमी है. आप्रवासियों को सीधे निकाल देना तो बहुत मुश्किल होगा. तय प्रक्रिया के तहत न किया जाए तो यह अवैध भी होगा और कई ताक़तवर शक्तियां इटली की प्रतिबद्धता न टूटे, इसमें भी लगी हुई हैं, इसलिए मुझे नहीं लगता कि बड़े स्तर पर लोगों को निकाला जाएगा."
बेमेल गठबंधन
चुनाव से पहले देश के दक्षिणी हिस्से की ग़रीबी और देश में बढ़ती बेरोज़गारी का मुद्दा उठाने और प्रवासियों का विरोध करने वाली पार्टी फ़ाइव स्टार मूवमेंट चुनाव के बाद सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी है. लेकिन लोकप्रियतावादी कही जाने वाली इस पार्टी को सरकार बनाने के लिए धुर दक्षिणपंथी और उत्तरी इटली में लोकप्रिय लीग पार्टी से समझौता करना पड़ा है.
वैजू नरावने बताती हैं कि लीग पार्टी ने अपने उदय के समय दक्षिणी इटली विरोधी रुख़ अपनाया था. इसके नेताओं ने दक्षिणी इटली के लोगों को आलसी और माफिया गतिविधियों में संलिप्त बताया था और एक ऐसी व्यवस्था की वक़ालत की थी जिसमें उत्तर के लोगों का टैक्स का इस्तेमाल उत्तर के लिए और दक्षिण के टैक्स का इस्तेमाल दक्षिण के लिए हो.
इससे होता ये कि उत्तरी इटली अमीर होता जाता और दक्षिणी इटली ग़रीब का ग़रीब बना रहता. धीरे धीरे इस पार्टी ने आप्रवासी विरोधी रुख़ अपना लिया. वहीं फाइवस्टार मूवमेंट के विचार इससे बिल्कुल अलग हैं.

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वह बताती हैं, 'फाइव स्टार मूवमेंट सरकार विरोधी विचारों का समन्वय है. इटली में सरकारी ब्यूरोक्रेसी हावी रही है और सरकारी दख़ल भी रहा है. वो बिल्कुल व्यवस्था विरोधी है, जो कहते हैं कि हमें सांस्थानिक तौर पर कुछ नहीं चाहिए, हम सिर्फ एक आंदोलन हैं, हम राजनीतिक दल भी नहीं हैं. तो यह गठबंधन काफी अलग अलग विचारों के लोगों का है जो एक साथ आ गए हैं और उनका सरकार विरोधी और व्यवस्था विरोधी रुख़ एक-सा है.'
अगर यूरोपीय संघ से बाहर आया इटली?
इटली यूरोज़ोन की चौथी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है लेकिन वह भारी क़र्ज़ संकट से भी जूझ रही है. छह करोड़ की जनसंख्या वाले इस देश की औसत उम्र क़रीब 46 साल है. यह भी एक वजह है कि अब यह उतनी तेज़ी से औद्योगिक प्रगति नहीं कर सकता. उस पर बढ़ती बेरोज़गारी ने बाहर से आप्रवासियों के आने पर कुछ तबकों में नाराज़गी पैदा की है. यूरोपीय संघ के लिए यह कितनी चिंता की बात है?
वैजू नारावने कहती हैं, "यूरोपीय राजनीति में बड़ा उतार-चढ़ाव आ रहा है क्योंकि पोलैंड और हंगरी जैसे दो-तीन देश हैं, जिन्होंने आप्रवासन के ख़िलाफ सख़्त नीतियां बनाई हैं, जो इस वक़्त इटली भी कर रहा है. इटली इसलिए भी बहुत ही महत्वपूर्ण देश है क्योंकि वह यूरोपीय संघ का संस्थापक सदस्य है और वह अगर ऐसे क़दम उठाने लगता है जो यूरोपीय संघ के बुनियादी मूल्यों के ख़िलाफ़ है तो प्रश्न उठेंगे ही."

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इटली की ये दोनों ही पार्टियां कुछ वक़्त पहले तक यूरोज़ोन की मुख़ालफ़त करती थीं, लेकिन अपने चुनाव अभियान में उन्होंने अपने आवाज़ को मद्धम कर लिया. इटली का यूरोज़ोन से बाहर आना फिलहाल दूर की कौड़ी ही है, लेकिन अगर ऐसी स्थितियां बनीं तो क्या होगा.
जेएनयू में यूरोपियन स्टडीज़ के असोसिएट प्रोफेसर एसएन प्रसाद कहते हैं, "इटली सरकार पर जो क़र्ज़ है वो उनके सकल घरेलू उत्पाद का 132 फीसदी है. इन दोनों पार्टियों का यूरोपीय संघ पर बहुत ज़्यादा विश्वास नहीं रह गया है. अगर इटली यूरोपीय संघ से अलग हो जाता है तो इस आर्थिक संकट से उबरने का दूसरा मौक़ा नहीं मिलेगा. उसे इस क़र्ज़ से उबरने में कोई यूरोपीय देश मदद नहीं करेगा."
वैजू नरावने ये भी कहती हैं कि हो सकता है कि इटली में बहुत जल्द दोबारा चुनाव हों. वह कहती हैं कि कुछ महीनों में इटली में दोबारा चुनाव हो सकते हैं, क्योंकि ये इतने भिन्न विचारों वाला गठबंधन है कि उनके आपस में सहमत होने के आसार कम हैं.
जानकार मानते हैं कि यूरोपीय देशों में अपने राष्ट्रीय हितों पर ध्यान केंद्रित करने की प्रवृत्ति बढ़ी है और इसने यूरोपीय देशों में एक राजनीतिक भेद पैदा कर दिया है. इटली अब किस दिशा में बढ़ेगा और यूरोप इससे कैसे प्रभावित होगा, इसे लेकर आशंकाएं बढ़ गई हैं.
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