अराफ़ात की हत्या के लिए हर हद तोड़ सकता था इसराइल

इसराइल-अराफ़ात
इमेज कैप्शन, यूरी अव्नेरी पीएलओ नेता यासीर अराफ़त से मिलने वाले पहले इसराइली थे
    • Author, टॉम बेटमैन
    • पदनाम, बीबीसी, येरूशलम

लेबनान की राजधानी बेरूत के एक गर्म दिन में ट्रेफ़िक की लंबी कतार कांटेदार तारों और घरों की पंक्तियों के बीच सरक रही थी.

हज़ारों लोग 1982 के इसराइल-लेबनान युद्ध में एक दिन के युद्धविराम के दौरान चेकप्वाइंट पार कर रहे थे जो शहर को पूर्व और पश्चिम में बांटता है.

उन सबमें एक पत्रिका के संपादक यूरी अव्नेरी भी थे जिन्हें बेरूत म्यूज़ियम के पास फिलिस्तीन लिबरेशन ऑर्गेनाइज़ेशन(पीएलओ) के चेकप्वाइंट पर पहुंचने के निर्देश दिए गए थे.

अव्नेरी कुछ ही देर में पीएलओ नेता यासीर अराफ़त से मिलने वाले थे.

देश के घोषित दुश्मन से मिलने जाने हुए उस रास्ते को अव्नेरी "थोड़ा खतरनाक" कह कर याद करते हैं. वो बताते हैं कि उन्हें एक हथियारबंद मर्सिडिज़ कार ने उठा लिया था और दक्षिण बेरूत से पीएलओ हाउस ले गई थी.

उन्होंने बताया, "हमने शांति पर ही बात की, इसराइल और फिलिस्तीन के बीच शांति की बात."

लेकिन अराफ़ात से मुलाकात की कहानी सिर्फ अव्नेरी की दक्षिणपंथी पत्रिका में छपकर खत्म नहीं हो गई.

लगभग तीन दशक बाद इस कहानी में एक नया मोड़ सामने आया है. आरोप लग रहा है कि इसराइली कमांडो अपने ही नागरिक पत्रकार का पीएलओ नेता से मुलाकात के लिए जाते हुए पीछा कर रहे थे और उन्हें निशाना बनाने के लिए भी तैयार थे.

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इमेज स्रोत, AFP

इमेज कैप्शन, 1982 में इसराइल पीएलओ को हटाने के लिए लेबनान में घुसा था

विशेष टीम कर रही थी पीछा

इसराइली पत्रकार रोनेन बर्गमैन ने हाल ही में एक किताब में इसराइल की राजनीतिक हत्याओं पर बात करते हुए पीएलओ नेता को मारने की कोशिशों पर लिखा था.

बर्गमैन ने सैंकड़ों लोगों का इंटरव्यू किया था, जिसपर काफी विवाद हुआ. उन्होंने बताया कि उनके शोध के दौरान एक सेना प्रमुख ने उन पर देशद्रोह का आरोप लगाया था.

बेरूत पर इसराइल के कब्ज़े की कार्रवाई 1982 में हुई थी. बर्गमैन लिखते हैं कि सॉल्ट फिश नाम की एक विशेष कमांडो यूनिट को अराफ़ात को मारने का ज़िम्मा सौंपा गया था.

उनके मुताबिक यूनिट ने यूरी अव्नेरी और अराफ़ात की मुलाकात का फ़ायदा उठाने की सोची और यूनिट को अव्नेरी और उनके दो सहयोगियों को अनजाने में पीएलओ नेता तक पहुंचाने का मौका दिया.

बर्गमैन लिखते हैं, "यूनिट के सदस्यों के बीच इस बात पर बहस हुई कि क्या इसराइली पत्रकारों की जान खतरे में डालना या उन्हें मारना ठीक होगा? जिस नतीजे पर वे पहुंचे, वो था कि ये ठीक होगा."

लेकिन उनका कहना है कि रास्ते में ही सॉल्ट फिश टीम की नज़रों से अव्नेरी ओझल हो गए.

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इसराइल में हुआ था हंगामा

यूरी अव्नेरी कहते हैं कि उन्हें अपनी मुलाकात बहुत अच्छे से याद है क्योंकि उन्होंने मुलाकात के बारे में हर शब्द प्रकाशित किया था.

फिलहाल वे 94 साल के हैं और तेल अवीव के अपने घर में मुझसे बात कर रहे थे, जहां दीवारों पर पुरानी पड़ रही अराफ़ात, बिल क्लिंटन और पूर्व इसराइली प्रधानमंत्री इतज़ाक रेबिन की तस्वीरें टंगी थी.

वे बताते हैं कि 1982 के उनके इस इंटरव्यू के बाद इसराइल में काफ़ी हंगामा हुआ था और सरकार ने जांच के आदेश दिए थे.

"अटॉर्नी जनरल ने फैसला किया कि मैंने कोई कानून नहीं तोड़ा है क्योंकि तब पीएलओ से मिलने के खिलाफ़ कोई कानून नहीं था"

पर क्या अराफ़ात से मिलना उनके लिए जानलेवा भी साबित हो सकता था?

इस पर वह कहते हैं, "मैं यकीन से नहीं कह सकता." वो बताते हैं कि मुलाकात के 24 घंटे पहले ही उन्होंने मीटिंग के लिए फ़ोन किया था.

"लेकिन...अगर वे काफ़ी सक्षम रहे होंगे तो उन्होंने फ़ोन कॉल सुनी होगी. मुझे फ्रंट लाइन से गुज़रते हुए देख हमारी कार का पीछा किया होगा. मुमकिन है."

'युद्ध अंधा होता है'

इस सॉल्ट फिश यूनिट के प्रमुख ऊज़ी दयान थे जो बाद में इसराइल सेना के डिप्टी कमांडर भी बने.

उन्होंने मुझे बताया कि उनकी टीम ने 8 से 10 बार अराफ़ात की जान लेने की कोशिश की थी.

जब उनसे पूछा कि इस प्रक्रिया में क्या किसी आम नागरिक की भी जान गई तो उन्होंने बताया, "मेरी जानकारी में तो नहीं."

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इमेज कैप्शन, ऊज़ी दयान

पर वो कहते हैं, "मासूम लोगों की बात करते हैं तो क्या उनका सदस्य निर्दोष था? नहीं. क्या उनके किसी अफ़सर की पत्नी निर्दोष थी? सोचा जा सकता है. और अगर उसके साथ बच्चा भी हो तो?"

"तो अगर हमें पता था कि आम लोग वहां हैं तो उन्हें हम अपना निशाना नहीं कहेंगे. लेकिन युद्ध अंधा होता है. आप नहीं कह सकते कि पड़ोस में किसी को नुकसान नहीं पहुंचा होगा."

'ये सोचना ही बेतुका है'

इसराइल के बेरूत पर कब्ज़े के वक्त रक्षा मंत्री एरियल शेरन की शक्तियां बाकी कई मंत्रियों के पास आ गई थी.

मेजर जनरल दयान अपने मिशन को लेकर अटल थे और याद करते हैं कि कितने ही इसराइली नागरिकों की हिंसक मौतें पीएलओ के हाथो हुईं या उन हमलों में, जो उसने लेबनान के बेस से किए.

लेकिन वे इनकार करते हैं कि उनकी यूनिट ऐसे किसी ऑपरेशन के पीछे थी जिसका ज़िक्र रोनेन बर्गमैन ने किया है.

उन्होंने कहा, "ये सोचना भी पागलपन है कि कोई इसराइली अफ़सर या इसराइली रक्षा मंत्री या इसराइली प्रधानमंत्री अराफ़ात को मारने की इजाज़त देंगे और साथ ही उनसे मिलने वाले इसराइली नागरिकों को, जिसमें यूरी अव्नेरी भी शामिल हैं"

वो कहते हैं, "तो ऐसी किसी स्थिति के बारे में मुझे तो कुछ नहीं पता है"

जनरल दयान 'राजनीतिक हत्या' जैसे शब्द के इस्तेमाल से बचते हैं लेकिन दोहराते हैं कि उनका इरादा था कि अराफ़ात ज़िंदा ना रहे.

सालों बाद जब इसराइल और फिलीस्तीन के बीच शांति वार्ता चल रही थी, तब अराफ़ात और जनरल की कई बार मुलाकातें हुईं.

जनरल दयान का कहना है कि उन्होंने कभी पीएलओ नेता से उनकी जान लेने की कोशिशों के बारे में बात नहीं की लेकिन वो आगे कहते हैं, "मुझे लगता है उन्हें पता था."

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