एच1बी वीज़ा में बदलाव का भारतीयों पर असर?

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- Author, वरिकूटी रामाकृष्णा
- पदनाम, बीबीसी तेलुगू संवाददाता
डोनल्ड ट्रंप प्रशासन के एच1बी वीज़ा में बदलाव करने के प्रस्ताव की ख़बर भारतीय मीडिया में सुर्खियां बनी कर छा गईं थीं.
अमरीका में रहने वाले कई भारतीयों और भारत में रहने वाले उनके परिवारों के लिए भी ये परेशानी का सबब बन गई.
मामला ये है की जिन लोगों को एच1बी वीज़ा मिलता है उन्हें ही अमरीका में अस्थायी रुप से काम करने की इजाज़त होती है. एच1बी वीज़ा धारकों के परिवारजनों को एच4 वीज़ा मिलता है और वो भी अमरीका में रह सकते हैं.
साल 2015 में राष्ट्रपति बराक ओबामा के कार्यकाल के दौरान एच1बी वीज़ा के नियमों में बदलाव किए गए थे और एच4 वीज़ा धारकों को भी अमरीका में काम करने की इजाज़त देने की बात की गई.
बताया जा रहा है कि मौजूदा ट्रंप प्रशासन वीज़ा नियमों में बदलाव करना चाहता है जिसके बाद एच4 वीज़ा धारकों देश में काम करने की इजाज़त नहीं होगी साथ ही एच1बी वीज़ा धारकों के परिजनों को मिलने वाले वीज़ा पर भी लगाम लग सकती है.
क्यों है इसका विरोध?

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तकनीक के सेक्टर में काम करने वाली कई बड़ी कंपनियां अमरीका में हैं. ये कंपनियां काम के लिए विदेश से आए एच1बी वीज़ा धारकों पर निर्भर करती हैं. अमरीका क आरोप है कि कुछ कंपनियां वीज़ा नियमों में मौजूद खामियों का लाभ उठा रही हैं और एच1बी वीज़ा नियमों का उल्लघंन कर रही हैं.
अप्रैल 2017 में व्हाइट हाउस ने आरोप लगाया था कि टीसीएस, इंफ़ोसिस और कॉग्निजेंट जैसी आईटी कंपनियां वीज़ा पर जितने लोग रख रहे हैं उससे ये साफ़ समझा जा सकता है कि वो वीजा के नियमों का उल्लंघन करके ऐसा कर रहे हैं.
कम से कम तनख्वाह 60 हज़ार डॉलर

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एच1बी वीज़ा से संबंधित नियमों में साल 1998 में संशोधित बदलाव किए गए थे. उस वक्त कंपनियों पर आरोप लगाए गए थे कि वो नौकरियों में अमरीकी नागरिकों के बजाय एच1बी वीज़ा धारकों को प्राथमिकता दे रहे हैं.
एच1बी वीज़ा नियम के अनुसार वीज़ा धारक को काम के एवज़ में न्यूनतम 60 हज़ार अमरीकी डॉलर का वेतन दिया जाना चाहिए. नियमों के अनुसार ऐसे पद जिनमें वेतनमान इस न्यूनतम राशि से कम हो उनमें अमरीकी नागरिकों की नियुक्ति की जानी चाहिए. ये नियम उन पर लागू नहीं होता था जिन्होंने अमरीका से ही मास्टर की डिग्री हासिल की है.
वीज़ा नियमों का उल्लंघन

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व्हाइट हाउस के मुताबिक, कंपनियां अधिक से अधिक एच1बी वीज़ा धारकों को सालाना 60 से 65 हज़ार अमरीकी डॉलर का वेतन देकर नौकरियों पर रख रही हैं. इसकी तुलना में एक अमेरीकी आईटी कर्मचारी को सालना कम से कम 150 हज़ार अमरीकी डॉलर की तनख़्वाह देनी पड़ती है.
अमरीका राजनीतिक प्रतिनिधियों का कहना है कि कंपनियां कम पैसे देकर विदेशियों को नौकरियां दे रही हैं और इस कारण अमरीकी नागरिक बेरोज़गार हो रहे हैं.
एच1बी वीज़ा आवेदनों की संख्या की भारत सबसे आगे
(स्रोत: अमरीका सिटिज़नशिप एंड इमिग्रेशन सर्विसेस)
अमरीका में विरोध प्रदर्शन
अमरीका में आईटी क्षेत्र में काम करने वाले वो लोग जो अपनी नौकरी खो चुके हैं उन्होंने 'सेव जॉब्स यूएसए' नाम से एक संगठन बनाया है.
इस समूह के सदस्य दावा करते हैं कि एच1बी वीज़ा धारकों के कारण उनकी नौकरियां छिन गई हैं. ये समूह एच4 वीज़ा धारकों को दिए जाने वाले वर्क परमिट पर भी सवाल उठाता है.
साल 2016 में 'सेव जॉब्स यूएसए' कोलंबिया में अमरीका कोर्ट ऑफ अपील में एक याचिका दायर किया जिसमें एच4 वीज़ा धारकों को नौकरियों पर रखने के डिपार्टमेंट ऑफ़ होमलैंड सिक्योरिटी के फ़ैसले को चुनौती दी गई थी. इस याचिका को जिला न्यायालय ने ख़ारिज कर दिया था.
साल 2017 में इसी तरह का एक और मुक़दमा अदालत फिर से दायर किया गया है. कोर्ट इस मुद्दे पर डिपार्टमेंट ऑफ़ होमलैंड सिक्योरिटी के जवाब का इंतज़ार कर रही है.
राजनेताओं की भूमिका

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ब्रूस मॉरिसन जैसे पूर्व कांग्रेस सदस्य जिन्होंने एच1बी वीज़ा के कार्यान्वयन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी, वो अब वीज़ा के प्रावधानों के बदलाव लाए जाने की मांग कर रहे हैं.
रिपब्लिकन नेता डैरेल इस्सा ने अमरीकी नौकरियों को देश से बाहर आउटसोर्सिंग रोकने और कुशल कामगरों के इमिग्रेशन कार्यक्रम में सुधारों से सेबंधित एक बिल भी पेश किया है.
क्या कहना है अमरीका का?
अमरीकी प्रशासन ने फ़िलहाल ने एच1बी वीज़ा या एच4 वीज़ा की जरी करने की मियाद बढ़ाने पर रोक लगाने के संबंध में कोई आधिकारिक घोषणा नहीं की है.

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भारत के अमरीकी दूतावास के अधिकारी मैक लैरन ने बीबीसी को बताया कि मौजूदा वक्त में एच1बी वीज़ा में बदलाव का कोई प्रस्ताव नहीं है और पुराने नियम ही लागू हैं.
अगर अमरीकी प्रशासन एच1बी वीज़ा नियमों में बदलाव लाने का फ़ैसला करती है को इस बात की पूरी संभावना है कि पीड़ित अदालत का दरवाज़ा खटखटाएं. तकनीक के क्षेत्र में काम करने वाली गूगल और फ़ेसबुक जैसी कंपनियां एच1बी वीज़ा नियमों में संशोधन के प्रस्ताव पर पहले ही अपनी नाराज़गी ज़ाहिर कर चुकी हैं.
फेसबुक के मुख्य कार्यकारी अधिकारी मार्क ज़ुकरबर्ग और गूगल के मुख्य कार्यकारी अधिकारी सुंदर पिचाई राष्ट्रपति डोनल्ड की नीतियों का आलोचना कर चुके हैं.
क्या अमरीका को इससे नुकसान होगा?

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गूगल, माइक्रोसोफ़्ट और आईबीएम जेसी कंपनियों में अप्रवीसी भारतीय ऊंचे ओहदों पर हैं और महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं.
वॉशिगटन पोस्ट में मार्क ज़ुकरबर्ग ने लिखा था, "कई क्षेत्र में अमरीका आगे है और इसका एक कारण विदेशी नागरिक भी है जिनके कार्यकौशल से अमरीका को फायदा मिलता है. अगर एच1बी वीज़ा धारकों को देश से वापिस भेज दिया जाए तो इसकी असर कंपनियों के साथ साथ पूरे अमरीका पर होगा."
प्रवासी भारतीयों पर क्या होगा असर?

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सॉफ्टवेयर प्रोफेशनल रंजीत अकुला कहते हैं, "अगर एच1बी वीज़ा और एच4 वीज़ा के लिए प्रस्तावित नियमों को लागू किया गया तो दस लाख प्रवासी भारतीयों पर इसका असर होगा."
"अगर आप एच1बी वीज़ा धारकों के परिवारजनों को भी शामिल करें तो ये संख्या 25-30 लाख तक हो सकती है. कई लोगों ने यहां घर भी ख़रीदे हैं. उनके बच्चे यहां पढ़ते हैं. उनके लिए देश छोड़ कर वापिस जाना इतना आसान नहीं होगा."
वो कहते हैं, "साथ ही ऐसी नौकरी अपने देश में फिर से ढूंढ़ पाना भी आसान कम नहीं."
डर का माहौल

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अमरीका में बसे भारतीय सुमालिनी सोमा कहती हैं, "ट्रंप प्रशासन के प्रस्तावित बदलावों के कारण यहां विदेशियों में एक तरह से डर का माहौल बन रहा है."
वो कहती हैं कि इन प्रस्तावों ने एच1बी और एच4 वीज़ा धारकों की नींद छीन ली है और फ़िलहाल तनाव की बड़ी वजह हैं.
कैलिफोर्निया में रहने वाले भारतीय छात्र स्कंद चिंटा कहते हैं कि कंसलटेन्सी देने वाली कई भारतीय कंपनियां वीज़ा के नियमों का उल्लंघन कर रही हैं.
वो मानते हैं, "ऐसी कंसलटेन्सी सेवाओं की हरकतों के कारण सरकार कठोर नियम लागू करने की योजना बना रही है. और इसका असर उन लोगों को पड़ा रहा है जो ग़लत रास्ते नहीं अपनाते."
क्या डरने की ज़रूरत है

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वीज़ा मामलों के जानकार सतीश कुमार कहते हैं कि फ़िलहाल इस मामले पर डरने की कोई ज़रूरत नहीं है.
वो कहते हैं कि मौजूदा वक्त में एच1बी वीज़ा नियमों में संशोधन करने की गुंजाइश काफ़ी कम है क्योंकि ऐसे करने से पहले भी कई क़ानूनी पेंच से निपटना पड़ेगा.












