सऊदी अरब में महिलाओं की पेंटिंग बनाना 'पाप' है

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    • Author, अभिमन्यु कुमार साहा
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

"भारत और सऊदी अरब की पेंटिंग में बहुत अंतर है. यहां की पेंटिंग के कैरेक्टर इमारत, रेगिस्तान, ऊंट, खजूर के पेड़... होते हैं. आप यहां किसी महिला की तस्वीर नहीं बना सकते हैं."

सऊदी अरब में रहने वाली प्रेरणा यह कहते हुए मायूस हो जाती हैं. हाल में ही सऊदी शाह सलमान ने महिलाओं के पक्ष में कई फ़ैसले लिए हैं जिनसे थोड़ी उम्मीद जगा रही है. प्रेरणा चाहती हैं कि शाह सलमान कला पर लगी पांबदियों में भी ढिलाई दें.

प्रेरणा पिछले 30 सालों से सऊदी अरब में रह रही हैं. वो कलाकार हैं. नागपुर में जन्मी प्रेरणा ने भोपाल के एक विश्वविद्यालय से फ़ाइन आर्ट्स में मास्टर्स किया है.

सऊदी अरब में कला पर कई पाबंदियां हैं. यहां कलाकार सऊदी हुकूमत के दिशा-निर्देशों के अनुसार ही पेंटिंग बनाते हैं. किसी भी प्रदर्शनी से पहले कलाकारों की पेंटिंग को सेंसरशिप से गुजरना होता है.

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बीबीसी से बात करते हुए प्रेरणा ने बताया, "यहां जब भी मैं प्रदर्शनी लगाती हूं तो एक दिशा-निर्देश आता है कि आप क्या-क्या कर सकती हैं और क्या नहीं. उसमें ये होता है कि आप धर्म से जुड़ी किसी तरह की तस्वीर नहीं बनाएंगे."

पाबंदियों को गिनाते हुए प्रेरणा आगे कहती हैं, "दूसरा ये कि आप किसी महिला की तस्वीर नहीं बनाएंगे. आपको महिला की तस्वीर बनानी ही हो तो उसकी शर्त है कि वो धुंधली होनी चाहिए. आप तस्वीर में महिलाओं की आंखें और नाक नहीं दिखा सकते हैं."

वो आगे बताती हैं कि अगर किसी पेंटिंग में महिला कैरेक्टर की ज़रूरत है तो उनकी आउटलाइन बना सकते हैं पर पेंटिंग में भी महिलाएँ लबादे में होनी चाहिए जिसे अबाया कहते हैं.

दरअसल, सऊदी अरब में पेंटिंग में महिला बनाना किसी पाप से कम नहीं है. मध्ययुगीन इतिहास और देशों की अंतर-संस्कृति पर किताबें लिखने वाले अमरीकी लेखक हंट जनीन और मार्गरेट बशीर ने अपनी किताब 'कल्चर्स ऑफ द वर्ल्डः सऊदी अरब' में लिखा है कि दुनिया की कलाओं में सऊदी अरब के दो मुख्य योगदान हैं- मस्जिद और शायरी.

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इमेज कैप्शन, इंसानों को दर्शाती पेंटिंग में उनके आंख और नाक स्पष्ट नहीं होते हैं

आखिर प्रतिबंध क्यों...?

उन्होंने लिखा है कि सऊदी अरब की कला पर धार्मिक प्रतिबंध है. कलाकार अपनी पेंटिंग में किसी तरह की जीवित प्राणी नहीं बना सकते हैं.

यह पाबंदी एक इस्लामिक मान्यता से जन्मी है, जिसके तहत सिर्फ अल्लाह ही जीवन की रचना कर सकते हैं. उनकी रूढ़िवादी मान्यताओं के मुताबिक अगर कोई व्यक्ति किसी जीवित प्राणी की पेंटिंग बनाता है तो वह भगवान बनने की कोशिश करने लगता है.

सऊदी मान्यताओं के मुताबिक ऐसी तस्वीरें लोगों का ध्यान उनके अल्लाह से भटका सकती हैं और वो उन्हें मानने के बजाए तस्वीरों में यकीन करने लगेंगे.

किताब में लिखा गया है, "धार्मिक मान्यताओं पर आधारित इस तरह की पाबंदी को कई मुस्लिम देश नहीं मानते हैं लेकिन सऊदी अरब इस पर किसी तरह का समझौता नहीं चाहता है."

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इमेज कैप्शन, कला पर सेंसरशिप के विरोध में इस तरह का फोटो बनाई थी सऊदी कलाकार जोहरा अल सऊद ने (फोटो कॉपीराइट-JowharaAlSaud/Facebook)

बच्चों को क्या सिखाया जाता है

प्रेरणा प्रदर्शनी लगाने के अलावा सऊदी अरब के स्कूलों में पेंटिंग भी सिखाती हैं. वो बताती हैं कि स्कूलों में बच्चों को भी जीवित प्राणी की आकृति सिखाने पर रोक है.

उन्होंने कहा, "यहां बच्चों को जानवर तक की आकृति नहीं बता सकते हैं. यहां साधारण आर्ट फॉर्म सिखाने को कहा जाता है. प्रकृति की तस्वीरें, पॉट्स, ग्लास जैसे ऑब्जेक्ट से ड्राइंग सिखाने को कहा जाता है."

प्रेरणा मानवीय भावनाओं को दर्शाती तस्वीरें तब तक बनाती थी, जब तक वो भारत में थी. सऊदी अरब में उनकी यह अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सीमित दायरे में सिमट गई है.

वो कहती हैं, "पेटिंग में बंधन तो है. जो मैं चाहती हूं, मैं नहीं बना सकती. लेकिन यहां पर कुछ अमेरिकन, कैनेडियन और ऑस्ट्रेलियन कम्पाउंड है, जहां इस तरीके की पेंटिंग बनाई जा सकती हैं."

"कोई निजी तौर पर ऐसी पेंटिंग चाहते हैं तो उसे बनाकर दी जा सकती है लेकिन सार्वजनिक रूप से इसे न बनाया जा सकता है और न ही प्रदर्शित किया जा सकता है."

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इमेज कैप्शन, सऊद ने फोटो के निगेटिव में छेड़छाड़ कर इंसान के आंख और नाक हटा दिए थे (फोटो कॉपीराइट-JowharaAlSaud/Facebook)

कलाकारों का विरोध

सऊदी अरब में लगी इस पाबंदी का विरोध समय-समय पर स्थानीय कलाकार करते रहते हैं. वे अपना विरोध ट्विटर और फेसबुक के माध्यम से जताते हैं.

ऐसा ही विरोध कुछ साल पहले जोहरा अल सऊद नाम की एक सऊदी कलाकार ने जताया था. उन्होंने पाबंदियों पर कलात्मक तरीके से चोट की थी.

उन्होंने फेसबुक पर 'आउट ऑफ लाइन' सीरिज चलाई थी, जिसमें उन्होंने फोटोग्राफी में मानवीय भावनाओं को कैद किया था और फ़ोटो के निगेटिव से इंसान के नाक और आंख हटाकर प्रिंट किए थे.

प्रेरणा बताती हैं कि मानवीय भावनाओं को सऊदी अरब में पेंटिंग के जरिए दर्शाना बहुत मुश्किल है. भारत की तरह यहां आलिंगन दर्शाती तस्वीरें तो बनती ही नहीं है.

वो बताती हैं, "किसी भी प्रदर्शनी के लिए आयोजकों के दृष्टिकोण से पेंटिंग बनानी पड़ती है. मुझे याद है कि मेरी एक पेंटिंग को प्रदर्शनी में लगाने से इनकार कर दिया गया था. उस पेंटिंग में एक महिला को नाचते हुए दिखाया गया था."

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इमेज कैप्शन, सऊदी अरब के स्टेडियमों में महिलाओं के लिए ज़रूरी इंतजाम कर दिए जाएंगे ताकि साल 2018 की शुरुआत तक वहां लोग अपने परिवारों के साथ जा सकें

सऊदी अरब में प्रेरणा जैसे कलाकारों की अभिव्यक्ति पाबंदियों के दायरे में काम करती है. उन्हें क़ानून का डर होता है. प्रेरणा कहती हैं, "यहां कोई क़ानून के विरुद्ध नहीं जा सकता है. हम लोग भी यहां कानून का पालन करते हैं, ताकि कोई परेशानी न उठानी पड़े."

वो ये भी कहती हैं कि अब धीरे-धीरे सऊदी अरब जागरूक हो रहा है. वो उम्मीद जताती हैं कि ड्राइविंग और स्टेडियम में महिलाओं को मैच देखने की इजाज़त के बाद कला के क्षेत्र में भी कलाकारों को कुछ आज़ादी मिलेगी.

प्रेरणा ने बताया कि उनकी पेंटिंग भारतीय समूह के साथ-साथ स्थानीय लोगों में भी मशहूर हैं. उनकी कई पेंटिंग सऊदी शाह के महलों में लगाई गई है.

(पहचान गुप्त रखने के लिए पेंटर का नाम बदल दिया गया है.)

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