'अच्छे कपड़े पहन रही हूं, मोदी जी से मिली हूं, यह सिर्फ़ क्रिकेट की वजह से', वर्ल्ड चैंपियन ब्लाइंड महिला क्रिकेटर्स की कहानी

विमेन्स ब्लाइंड टी 20 वर्ल्ड कप 2025

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इमेज कैप्शन, कोलंबो में 23 नवंबर 2025 (रविवार) को नेपाल के ख़िलाफ़ फ़ाइनल मुक़ाबले में भारत ने सात विकेट से जीत हासिल की थी

"अच्छा हुआ कि मुझे दिखता नहीं है. क्योंकि मुझे नहीं दिखता इसलिए मैं वर्ल्ड कप खेल रही हूं. अगर दिखता तो मैं उनकी तरह 7-8 क्लास तक पढ़ती और शादी हो जाती."

यह कहना है गंगा एस. कदम का, जो हाल ही में हुए विमेन्स ब्लाइंड टी 20 वर्ल्ड कप 2025 के दौरान भारतीय टीम का हिस्सा रही हैं.

भारतीय टीम ने बीते हफ़्ते विमेन्स ब्लाइंड टी 20 वर्ल्ड कप 2025 का ख़िताब अपने नाम किया. यह टूर्नामेंट पहली बार आयोजित किया गया था.

इस प्रतियोगिता में भारत ने न सिर्फ़ वर्ल्ड कप ट्रॉफ़ी जीती, बल्कि पूरे टूर्नामेंट में अजेय भी रही.

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टीम की खिलाड़ियों से बातचीत में यह सामने आया कि इस मुक़ाम तक पहुंचने के लिए उन्हें कितनी चुनौतियों का सामना करना पड़ा. उन्होंने यह भी बताया कि कैसे छोटे-छोटे गाँवों से निकलकर यहां तक आने का उनका सफ़र काफ़ी कठिन रहा.

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बीबीसी हिन्दी के साप्ताहिक कार्यक्रम 'द लेंस' में कलेक्टिव न्यूज़रूम के डायरेक्टर ऑफ़ जर्नलिज़्म मुकेश शर्मा ने भारतीय टीम की खिलाड़ियों से बात की.

इस बातचीत में भारतीय टीम की खिलाड़ी सुषमा पटेल, गंगा एस. कदम, दीपिका टीसी, सिमू दास, फुला सोरेन और भारतीय महिला ब्लाइंड क्रिकेट टीम की मैनेजर शिखा शेट्टी शामिल हुईं.

ब्लाइंड क्रिकेट कैसे खेला जाता है?

विमेन्स ब्लाइंड टी 20 वर्ल्ड कप 2025

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इमेज कैप्शन, फ़ाइनल मुक़ाबले में भारत ने नेपाल को 114/5 के स्कोर तक सीमित कर दिया और केवल 12.1 ओवर में लक्ष्य हासिल कर लिया

ब्लाइंड क्रिकेट सामान्य क्रिकेट से कई मामलों में अलग होता है. इसके रूल्स और रेगुलेशन्स में खिलाड़ियों की दृष्टि क्षमता के अनुसार विशेष बदलाव किए जाते हैं.

भारतीय महिला ब्लाइंड क्रिकेट टीम की मैनेजर शिखा शेट्टी ने इसके बारे में और विस्तार से जानकारी दी है.

शिखा शेट्टी बताती हैं कि ब्लाइंड क्रिकेट में इस्तेमाल होने वाली गेंद सामान्य क्रिकेट बॉल से बिल्कुल अलग होती है. इस खेल में प्लास्टिक की गेंद का उपयोग किया जाता है.

गेंद के अंदर धातु की बहुत छोटी बेयरिंग होती हैं. जब गेंद हिलती है तो उसमें से झनझनाहट जैसी आवाज़ आती है. खिलाड़ी इसी आवाज़ के आधार पर गेंद की दिशा और गति का अंदाज़ा लगाते हैं.

ब्लाइंड क्रिकेट में खिलाड़ियों को उनकी दृष्टि क्षमता के आधार पर तीन कैटेगरी में बांटा जाता है. इन कैटेगरी को बी1, बी2 और बी3 कहा जाता है.

अंतरराष्ट्रीय नियमों के अनुसार, एक टीम में आमतौर पर बी1 कैटेगरी के 4 खिलाड़ी, बी2 कैटेगरी के 3 खिलाड़ी और बी3 कैटेगरी के 4 खिलाड़ी शामिल होते हैं.

महिला वर्ल्ड कप

शिखा शेट्टी कहती हैं कि इन कैटेगरी के अलावा भी ब्लाइंड क्रिकेट में बहुत सी चीज़ें सामान्य क्रिकेट से अलग होती हैं. यहां खेल पूरी तरह संवाद पर आधारित होता है.

वह कहती हैं कि गेंदबाज़ पहले विकेटकीपर और फील्डरों से पूछता है कि क्या वे तैयार हैं. फिर बल्लेबाज़ से पूछा जाता है 'क्या आप तैयार हो?', बल्लेबाज़ के 'हाँ' कहने के तुरंत बाद गेंदबाज़ 'प्ले' कहकर गेंद फेंकता है.

इस खेल में विकेटकीपर गेंदबाज़ को यह मार्गदर्शन देता है कि गेंद किस लाइन पर डालनी है.

ब्लाइंड क्रिकेट में जो स्टंप्स इस्तेमाल होते हैं, वे मेटल के बने होते हैं. ऐसे में जब गेंद स्टंप से टकराती है तो एक तेज़ आवाज़ आती है, जिससे खिलाड़ियों को पता चलता है कि विकेट गिर गया है.

शिखा शेट्टी बताती हैं कि बी1 कैटेगरी के खिलाड़ी जब दौड़कर रन बनाते हैं, तो उनके हर रन को दोगुना माना जाता है.

'मैंने अपने पापा–मम्मी को पहचान दी'

फुला सोरेन बीबीसी से बात करते हुए
इमेज कैप्शन, फुला सोरेन कहती हैं कि अब उनके माता-पिता उनके नाम से जाने जाते हैं
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भारतीय महिला ब्लाइंड क्रिकेट टीम की कप्तान दीपिका टीसी कहती हैं कि यह पल उनके लिए बेहद गर्व का है. वह बताती हैं कि यह उनका पहला टी20 वर्ल्ड कप था और पहली ही कोशिश में टीम विजेता बन गई.

दीपिका कहती हैं, "हमारी खिलाड़ियों ने बहुत मेहनत की. मैं इस वर्ल्ड कप को अपनी सेना को डेडिकेट करती हूँ."

जीत के बाद टीम ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से मुलाक़ात की. इस मुलाक़ात को याद करते हुए दीपिका कहती हैं, "उन्होंने हमसे वैसे ही बात की जैसे हमारे पापा हमसे करते हैं."

इसी टीम का हिस्सा रहीं फुला सोरेन अपनी कहानी बताते हुए उन कठिनाइयों का ज़िक्र करती हैं, जिनसे गुज़रकर वह यहां तक पहुंची हैं.

वह कहती हैं, "सब लोग कहते थे कि ये अंधी है, क्या करेगी, कहां तक जाएगी. यह सुनकर बहुत बुरा लगता था. लेकिन अब वही लोग कहते हैं कि हम जहां नहीं जा पाए, वहां तुम गईं. तुम्हें लोग पहचानते हैं."

फुला का कहना है कि लोगों को अक्सर उनके मां-बाप से जाना-पहचाना जाता है लेकिन 'मैंने अपने पापा-मम्मी को पहचान दी है'.

वह बताती हैं, "अगर मेरे पापा कहीं बाहर जाते हैं तो लोग कहते हैं, 'अरे, ये फुला के पापा हैं.' यह सुनकर मुझे बहुत गर्व महसूस होता है."

शुरुआत में हुई परेशानी

सिमू दास
इमेज कैप्शन, सिमू दास ने सफ़र में आने वाली कठिनाइयों के बारे में बताया है

भारतीय टीम की खिलाड़ी सिमू दास अपने शुरुआती संघर्षों को याद करते हुए बताती हैं कि जब उन्होंने पहली बार क्रिकेट ज्वाइन करने का फ़ैसला किया, तो गांव में लोगों ने कई तरह की बातें कीं. वह बताती हैं, "गाँव वाले कहते थे कि तुम दिल्ली में जाकर क्या करोगी."

सिमू के अनुसार, गांव के लोग अक्सर यह सोचते थे कि दिल्ली लड़कियों के लिए सुरक्षित जगह नहीं है. वह कहती हैं, "जब मैं पढ़ाई के लिए दिल्ली आई, तब भी उन्होंने बहुत कुछ कहा, लेकिन मैंने किसी की बात नहीं मानी."

वह बताती हैं कि इस पूरे सफ़र में उनकी मां ने उनका सबसे ज़्यादा साथ दिया. वह कहती हैं, "जब मैंने क्रिकेट ज्वाइन किया, तो लोगों ने कहा कि तुम कैसे खेलोगी, तुम्हें दिखता नहीं है. उस समय मुझे भी लगा कि अगर लोग ऐसा कह रहे हैं, तो मैं कैसे कर पाऊँगी."

वह बताती हैं, "लेकिन जैसे ही मैंने खेलना शुरू किया, मेरा चयन नेशनल के लिए हुआ. फिर इंटरनेशनल के लिए चुना गया. मेरा पहला अंतरराष्ट्रीय मैच नेपाल के खिलाफ़ था. जब मैं वहाँ खेलने गई, तो लोग कहने लगे, 'हमने नेपाल का चेहरा भी नहीं देखा और तुम नेपाल घूम आई'."

सिमू कहती हैं कि उनके प्रति लोगों का नज़रिया भी धीरे-धीरे बदल गया. "पहले जब मैं हॉस्टल से घर जाती थी, तो कोई पूछता भी नहीं था. लेकिन अब लोग कहते हैं, 'अरे, आपकी बेटी आ गई है'."

उन्होंने कहा, "मुझे लगता है कि मैं ब्लाइंड हूं, इसलिए दुनिया घूम रही हूं. कितने लोग मेहनत करते हैं, नौकरी करते हैं, फिर भी उन्हें कहीं जाने का मौक़ा नहीं मिलता."

खिलाड़ियों की क्या मांग?

शिखा शेट्टी
इमेज कैप्शन, भारतीय महिला ब्लाइंड क्रिकेट टीम की मैनेजर शिखा शेट्टी

खिलाड़ियों का कहना है कि जिस तरह से नॉर्मल क्रिकेट को सपोर्ट किया जाता है उसी तरह से उन पर भी ध्यान दिया जाए. वह बताती हैं कि अभी भी ऐसे खिलाड़ियों के लिए मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं.

कप्तान दीपिका कहती हैं, "मैं एक ही आग्रह करती हूं कि सरकार हमारे लिए भी थोड़ा और मदद करे. इससे हमारे जूनियर भी आगे आएंगे."

"जैसे आप लोग नॉर्मल क्रिकेट को सपोर्ट करते हैं, हम लोग चाहते हैं कि लोग ब्लाइंड क्रिकेट को भी उतना ही सपोर्ट करें."

सिमू दास ने बताया, "हमें दिखता नहीं है इसलिए हम नॉर्मल ग्राउंड में नहीं खेल सकते. अगर हमें खेलने के लिए अच्छा ग्राउंड मिल जाए और थोड़ा फंड वगैरह मिल जाए तो हम और भी अच्छा करेंगे."

शिखा शेट्टी का कहना है कि ऐसा नहीं कह सकते कि ब्लाइंड क्रिकेट के लिए सपोर्ट नहीं है.

उन्होंने बताया, "कुछ-कुछ सरकारें हमें बहुत सपोर्ट कर रही हैं. लेकिन जब खेल की बात आती है तो फिर जो मूल सुविधा है वह यहां पर नहीं है. जैसे हम नॉर्मल स्टेडियम देखते हैं तो यहां पर ब्लाइंड्स के लिए कोई ऐसा स्टेडियम नहीं है."

शिखा ने कहा, "स्कूल, ज़िले में जो मूल सुविधा इन लोगों को मिलनी चाहिए ये सब इन लोगों को नहीं मिलती. अगर इन्हें ये सपोर्ट मिला तो इन लोगों का भी लेवल बदल जाएगा, जैसे हम नॉर्मल क्रिकेट का देखते हैं, वह उस लेवल पर पहुंच जाएंगे."

वहीं सिमू ने कहा, "हम लोगों को फंड्स वगैरह ज़्यादा नहीं मिलता है, ग्राउंड नहीं मिलता. अगर हमें ग्राउंड वगैरह मिले तभी हम और अच्छा कर सकते हैं."

समाज की चुनौतियां

गंगा का बयान

सभी खिलाड़ियों ने उन चुनौतियों के बारे में बताया जो उन्हें अक्सर गांव और मोहल्ले में मिलती थीं. साथ ही उन्होंने यह भी कहा कि उन्होंने उन बातों को नज़रअंदाज़ करते हुए अपने लक्ष्य की ओर बढ़ना जारी रखा.

गंगा अपनी कहानी बताती हैं, "हमारे घर में आठ बहनें हैं. खेल में कोई नहीं थी क्योंकि सबकी क्लास 7–8 तक पढ़ाई करके शादी हो गई. मैं अकेली ब्लाइंड थी. मेरी सभी बहनों को दिखता था और मुझे नहीं दिखता था, तो मुझे बहुत बुरा लगता था."

उन्होंने कहा, "लेकिन अच्छा हुआ कि मुझे नहीं दिखता है. क्योंकि अगर नहीं दिखता है तभी मैं वर्ल्ड कप खेल रही हूं. अगर मुझे दिखता, तो मैं भी उनकी तरह 7–8 क्लास तक पढ़ती और शादी हो जाती."

वहीं सुषमा पटेल कहती हैं, "पापा का सपना था कि मेरे कोई न कोई बच्चे क्रिकेट खेलें. ज़्यादातर वह बेटों को सपोर्ट करते थे. लेकिन हम लोगों के लिए भी उन्होंने किया."

"सबकी ज़िंदगी में चुनौतियां होती हैं. मेरे लिए भी ऐसा ही था. पापा का तो सपना था लेकिन गांव से निकलना मुश्किल था. मेरे गांव में 12–14 साल की उम्र में लड़कियों की शादी कर देते हैं. मेरे पापा की अलग सोच थी. उन्हीं की वजह से मैं आगे आई."

उन्होंने बताया, "गांव के लोग मेरे पिता से कहते थे कि लड़कियों की तो शादी हो जाएगी. उनसे क्या मिलेगा. लड़कों को देखो, वे घर चलाएंगे. वही घर के चिराग हैं."

सुषमा पटेल

सुषमा ने कहा, "गांव के लोग पहले बोलते थे कि ये क्या क्रिकेट है. ऐसे तो गली के बच्चे क्रिकेट खेलते हैं. और ये लोग इंटरनेशनल में खेल रही हैं. लेकिन अब सब अच्छा बोलते हैं."

"हमारे जैसे बहुत बच्चे हैं जो कुछ नहीं कर पाते. इसलिए हम चाहते हैं कि जो बच्चे अपना भविष्य देखते हैं उन्हें भी हमारी बदौलत यह मौक़ा मिले."

फुला कहती हैं, "हम बार-बार बाहर जाते हैं तो गांव में लोग कहते हैं कि ये लोग बाहर जाती हैं. क्या करती हैं. और लोग बहुत खराब बातें बोलते हैं. वे कहते हैं कि लड़की है तो घर में रहेगी तो सुरक्षित रहेगी. अगर मैं क्रिकेट नहीं खेलती रहती तो शायद उसी छोटे से गांव में रह जाती. और मेरी भी शादी हो जाती."

"अभी मैं अच्छे कपड़े पहन रही हूं. और मोदी जी से मिली हूं. तो यह सिर्फ़ क्रिकेट की वजह से संभव हुआ है."

सिमू कहती हैं, "अगर हम ब्लाइंड क्रिकेट की बात करें तो चुनौतियां बहुत हैं. जब हम पहली बार घर से निकलते हैं तो लोग नहीं चाहते कि लड़कियां कुछ करें. अगर हम कहें कि हमें घर से बाहर निकलना है तो हर चीज़ को ग़लत नज़र से देखा जाता है. कि पता नहीं कहां जाएगी. क्या करके आएगी."

बीबीसी के लिए कलेक्टिव न्यूज़रूम की ओर से प्रकाशित.

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