क्या संविधान में बदलाव करा सकेंगे शिंज़ो आबे?

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- Author, आदर्श राठौर
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
इस साल अगस्त और सितंबर में 15 दिन के अंदर दो बार जापान के होकाइडो द्वीप में अलार्म की आवाज़ से अफ़रा-तफ़री फैल गई. होकाइडो के आसमान से उत्तर कोरिया की बैलिस्टिक मिसाइल गुज़र रही थीं और नीचे ये अलार्म लोगों को आगाह कर रहे थे.
जिस वक़्त जापान समेत पूरी दुनिया के लोगों की निगाह उत्तर कोरिया के इन मिसाइल परीक्षणों की तरफ थी, जापान के प्रधानमंत्री शिंज़ो आबे ने समय से पहले चुनाव कराने का ऐलान कर दिया. उन्होंने कहा कि वह कुछ संकटों से निपटने के लिए जनता का समर्थन चाहते हैं. जिन संकटों का हवाला देकर उन्होंने जल्दी चुनाव करवाए, उनमें उत्तर कोरिया भी एक था.
चुनाव का एलान करते समय शिंज़ो आबे ने कहा था, "उत्तर कोरिया ने जापान को समंदर में डुबोने की धमकी दी है. चुनाव लोकतंत्र की आत्मा होते हैं और उत्तर कोरिया की धमकियों का उन पर कोई असर नहीं पड़ना चाहिए. इसीलिए मैं चुनाव कराकर जनमत चाहता हूं ताकि सरकार उत्तर कोरिया से पैदा हुए ख़तरे का मुकाबला कर सके."
शिंजो आबे ने चुनावों की घोषणा उस वक्त की थी, जब उनकी लोकप्रियता में लगातार गिरावट आ रही थी. मगर उत्तर कोरिया संकट के बीच कराए गए चुनावों में उन्हें बड़ी कामयाबी मिली. सत्ताधारी गठबंधन दो-तिहाई बहुमत पाने में कामयाब रहा.

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जल्दी चुनाव करवाने की वजह क्या थी?
जब शिंज़ो आबे चुनाव जीतकर आए, उन्होंने फिर से वादा किया कि उत्तर कोरिया के ख़िलाफ़ कड़ी जवाबी कार्रवाई की जाएगी. मगर क्या ये चुनाव वाकई उत्तर कोरिया के ख़तरे से निपटने के लिए कराया गया था?
जापान की सोका यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर मुकेश विलियम्स कहते हैं, "इसे उनकी होशियारी या बुद्धिमता कह सकते हैं. उनकी लोकप्रियता गिर रही थी. पशु चिकित्सा स्कूल स्कैंडल और सरकार की जमीन को सस्ते में बेचने जैसे मामलों पर उन्होंने स्पष्ट तरीके से कोई प्रतिक्रिया नहीं दी थी."
"इससे उनकी लोकप्रियता 26 फीसदी तक गिर गई थी. राजनीति में लोकप्रियता 30 तक आ जाए तो माना जाता है कि पॉलिटिकल कैरियर खत्म है. इसीलिए उन्होंने जनता का विश्वास पाने के लिए जल्दी चुनाव करवाए."

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लोकप्रियता गिरने के बावजूद कैसे जीते?
भ्रष्टाचार के आरोपों को देखते हुए कयास लगाए जा रहे थे कि शिंज़ो आबे के लिए वापसी करना मुश्किल हो सकता है. मगर जैसे-जैसे चुनाव नज़दीक आए, हालात बदलते गए. पहले एग्ज़िट पोल में उनकी जीत का अनुमान लगाया गया और फिर नतीजे भी उनके पक्ष में आए.
मगर लोकप्रियता गिरने के बावजूद क्या वजह रही कि वो लोगों का विश्वास जीतने में कामयाब रहे, इस सवाल के जवाब में जापान में भारत के राजदूत रहे अर्जुन असरानी बताते हैं, "टोक्यो की गवर्नर शिंज़ो के सामने उतरने वाली थीं. वह काफी पॉपुलर हो गई थीं. इसलिए थोड़ा-बहुत माहौल था कि शायद शिंज़ो की जीत अच्छी ना हो. लेकिन वह बात ठीक नहीं थी."
असरानी बताते हैं कि शिंज़ो आबे ने चुनाव कराने का फ़ैसला सोच-समझकर लिया था.
उन्होंने कहा, "वैसे भी आबे का कार्यकाल खत्म हो रहा था तो उन्हें चुनाव कराने ही थे. उन्होंने जानबूझकर पहले करवा दिए क्योंकि उन्हें भरोसा था कि अभी वापसी की संभावना ज्यादा है, एक साल बाद जाने क्या होगा."
जानकार इस जीत की वजह ये भी मानते हैं कि शिंज़ो आबे ने चुनाव के दौरान अपना प्रचार अर्थव्यवस्था में सुधार और रोज़गार देने पर केंद्रित कर दिया था. साथ ही इन चुनावों में विपक्षी पार्टियां भी एकजुट नहीं थीं.

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पार्टी में भी शिंज़ो के मुक़ाबले कोई नहीं
आबे जब पहली बार प्रधानमंत्री बने थे, तब भी उन्हें मुश्किलों का सामना करना पड़ा था. 2006 में 52 साल की उम्र में वो विश्वयुद्ध के बाद जापान के सबसे युवा प्रधानमंत्री बने थे. मगर एक साल के अंदर ही मुश्किल हालात में उन्हें पद छोड़ना पड़ा था. उनकी कैबिनेट के सदस्य इस्तीफा दे रहे थे और ऊपरी सदन के चुनावों में बड़ा नुकसान भी उठाना पड़ा था.
इसके बाद शिंज़ो आबे ने 2012 में फिर वापसी की. उन्होंने लिबरल डेमोक्रैटिक पार्टी का शीर्ष पद हासिल किया और उसी साल दिसंबर में दूसरी बार देश के प्रधानमंत्री बने. और अब, हाल ही में चुनावों में मिली जीत के साथ ही शिंज़ो आबे ने अपनी पार्टी एलडीपी के अधिवेशन में नेता के तौर पर लगातार तीसरी बार तीन साल के लिए चुने जाने की संभावनाएं मजबूत कर दी हैं.
इस तरह से वह 2021 तक प्रधानमंत्री पद पर बने रह सकेंगे, क्योंकि उन्हें पार्टी के अंदर से भी चुनौती नहीं मिल रही. अर्जुन असरानी कहते हैं, "चुनाव तो हर चार साल में होते हैं लेकिन पार्टी प्रधानमंत्री को दो साल के लिए चुनती है. फिर पार्टी में दो साल बाद चुनाव होते हैं कि प्रधानमंत्री को बनाए रखा जाए या बदला जाए."
असरानी बाते हैं, "पिछले सालों में पार्टी के अंदर हलचल रही और लोग बदलते गए. हर प्रधानमंत्री को चुनौती मिलती रही, मगर आबे के ख़िलाफ़ अपनी पार्टी में कोई ऐसा नेता ही नहीं था जो उन्हें टक्कर दे सके."

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संविधान संशोधन का वादा
अब हालिया चुनाव के बाद उनके सत्ताधारी गठबंधन के पास संसद में दो-तिहाई बहुमत भी आ गया है. इसके साथ ही शिंजो आबे के लिए जापान में संविधान में संशोधन का रास्ता भी खुल गया है, जिसका ज़िक्र वह अक्सर करते रहे हैं.
दरअसल विश्व युद्ध के बाद मित्रपक्ष शक्तियों के नियंत्रण के दौरान बनाया गया जापान का 'शांति संविधान' उसे न तो सशस्त्र सेना रखने की अनुमति देता है और न ही अंतरराष्ट्रीय मसलों को हल करने के लिए ताकत के इस्तेमाल की इजाज़त देता है. मगर आबे संविधान में बदलाव करना चाहते हैं ताकि इस बहस की गुंजाइश ही न रहे कि आत्मरक्षा बलों का गठन संवैधानिक है या असंवैधानिक.
चुनाव जीतने के बाद भी उन्होंने संविधान में संशोधन की बात दोहराते हुए कहा, "संविधान में संशोधन को लेकर पहले तो विशेषज्ञों के बीच चर्चा होगी. फिर संसद में इस पर बहस होगी. फिर नागरिक ही फैसला करेंगे. यह बात सबसे महत्वपूर्ण है."
जापान में बहुत से लोग मौजूदा संविधान को एलाइड फ़ोर्सेज़ के कब्ज़े की याद के तौर पर देखते हैं. मगर बहुत से लोग ऐसे भी हैं जो दूसरे विश्वयुद्ध के ख़ौफ से उबरे नहीं हैं. ऐसे में उन्हें लगता है कि संविधान से छेड़छाड़ नहीं होनी चाहिए. मगर आबे चाहते हैं कि 2020 तक संविधान को बदल दिया जाए.
संविधान में संशोधन करना आसान होगा?
इस बारे में अर्जुन असरानी कहते हैं, "संविधान बदलना मुश्किल है. संसद में दो-तिहाई बहुमत चाहिए. फिर जनमतसंग्रह होना चाहिए. लोअर और अपर हाउस में मजबूती होने पर ही यह प्रक्रिया शुरू हो सकती है. इसीलिए उन्होंने खुद को मजबूत करने के इरादे से मध्यावधि चुनाव करवाए ताकि कम से कम प्रक्रिया तो शुरू हो सके."

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दादा के नक्श-ए-क़दम पर चल रहे हैं शिंज़ो?
शिंज़ो आबे को राजनीति विरासत में मिली है. उनके पिता शिंतारो विदेश मंत्री रह चुके हैं और दादा नोबूसुके कीशी जापान के प्रधानमंत्री रह चुके हैं.
आबे के दादा कीशी को जापान में ऐसे प्रधानमंत्री के तौर पर याद किया जाता है, जिन्होंने अमरीका और जापान के बीच के रक्षा समझौते का संशोधन करवाया था. 1960 में किए गए इस सुधार से पहले अमरीका चाहे तो जापान के संसाधनों का इस्तेमाल कर सकता था, मगर वह उसकी रक्षा के लिए बाध्य नहीं था.
कीशी लंबी लड़ाई के बाद इस समझौते में बदलाव लाने में तो कामयाब रहे थे, मगर इसका नतीजा यह हुआ था कि एक महीने के अंदर ही उन्हें पद छोड़ना पड़ा था.
तो क्या संविधान में बदलाव करके आबे अपने दादा की तरह कुछ ऐसा करना चाहते हैं जिसे लोग याद रखें?
मुकेश विलियम्स कहते हैं कि शिंज़ो आबे के तौर-तरीके काफी हद तक उनके दादा जैसे ही हैं. उन्होंने कहा, "मुझे लगता है कि शिंज़ो अपने दादा कीशी की 1957-1958 की राजनीति का पालन कर रहे हैं. उनकी बातें वैसी ही हैं. प्रचार-प्रसार और प्रोपगैंडा, छवि बनाना."

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क्या है शिंज़ो की विदेश नीति?
शिंजो आबे के प्रधानमंत्री रहते हुए हालात के मुताबिक जापान अपनी विदेश नीति में भी बदलाव लाने की कोशिश कर रहा है.
अर्जुन असरानी बताते हैं, "जापान में एक बड़ा तबका यह महसूस करने लगा है कि ज्यादा वक्त तक अमरीका पर निर्भर नहीं रहा जा सकता. ख़ासकर डोनल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति बनने के बाद, जापानियों की चिंताएं बढ़ गई हैं."
शिंजो आबे ने रूस से संबंध सुधारने की कोशिश तो की, मगर उसमें ज्यादा कामयाबी नहीं मिल रही. दोनों देशों के बीच कुरैल द्वीपों को लेकर गतिरोध बना हुआ है. इन द्वीपों पर दूसरे विश्वयुद्ध के बाद से ही रूस का नियंत्रण है. साथ ही चीन से भी रिश्तों में उतनी गर्माहट नहीं रही.
असरानी बताते हैं कि ऐसे में जापान को भारत के रूप में एक दोस्त नजर आ रहा है. इसीलिए हाल ही में जापान के प्रधानमंत्रियों ने भारत के प्रति जो झुकाव रखा है, आबे ने उसे आगे बढ़ाया है.
उन्होंने कहा, "पिछले समय में चीन दक्षिणी प्रशांत क्षेत्र में आक्रामक हुआ है और उत्तर कोरिया से ख़तरा भी बढ़ा है. साथ ही ट्रंप के आने से जापान के लोगों और सरकार को लगने लगा है कि अमरीका पर पूरा भरोसा नहीं रखा जा सकता. ऐसे में वो और भी दोस्तों की तलाश कर रहे हैं. वो देखते हैं कि भारत मजबूत देश है, उसकी नेवी भी मज़बूत है. ऐसे में वे भारत के साथ दोस्ती बनाने में फ़ायदा देखते हैं. आर्थिक पहलू तो है ही."

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शिंज़ो की भारत से करीबी को कैसे देखते हैं जापान के लोग?
भारत में भी जापान के साथ बढ़ती करीबी को लेकर उत्साह नज़र आता है. शिंज़ो आबे हाल ही में भारत भी आए थे, जहां उन्होंने बुलेट ट्रेन प्रॉजेक्ट का शिलान्यास किया था. मगर क्या जापान में भी ऐसा ही उत्साह है?
प्रोफ़ेसर मुकेश कहते हैं, "जापान में एक वर्ग ऐसा भी है जिसकी राय में जापान के भारत के करीब आने से जापान को नुकसान हुआ है."
उन्होंने कहा, "आबे की राजनीति भारत के करीब हो रही है. मगर जापान में लोग ये कहते हैं कि इससे जापान का आर्थिक नुकसान हो रहा है. जापान चीन का बहुत बड़ा पार्टनर है. उनका मानना है कि हिंदुस्तान की तरफ झुकने से नुकसान ज़्यादा हुआ है, फायदा कम."
शिंज़ो आबे के सामने अब कई चुनौतियां हैं- अपने वादों के मुताबिक युवाओं को रोज़गार देना, उत्तर कोरिया के ख़िलाफ ठोस कदम उठाना और संविधान में संशोधन करना. इनमें सबसे मुश्किल काम संविधान संशोधन करने का है. और अगर वह इसमें कामयाब रहे तो शांति से संविधान में बदलाव करने वाले वह जापान के पहले प्रधानमंत्री होंगे.
इन सबके बीच आबे के सामने उनका स्वास्थ्य भी बड़ी चुनौती है. वह बॉउल डिजीज़ से जूझ रहे हैं. उनके सहयोगी हीरोशीगे सेको ने कहा था कि वह दवाओं के ज़रिये इसपर काबू पा रहे हैं.
मगर फिलहाल, शिंज़ो आबे दूसरे विश्वयुद्ध के बाद जापान में सबसे ज्यादा समय तक पद पर बने रहने वाले प्रधानमंत्री बनने की राह पर हैं.
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