ब्लॉग: राम रहीम या डंडे वाले पीर में क्या कमीं है

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- Author, वुसतुल्लाह ख़ान
- पदनाम, पाकिस्तान से बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
जब आप रोशनदान खोलते हैं तो ताज़ा हवा के साथ मक्खी-मच्छर भी अंदर आ जाते हैं.
बिल्कुल इसी तरह जब आप जम्हूरियत का रोशनदान खोलते हैं तो आज़ादी की हवा तो ख़ैर आती ही है, मगर इसके साथ वे चलन भी अंदर घुस आते हैं जिन्होंने लाखों दिमाग़ों पर पहले से ही कब्ज़ा कर रखा होता है.
और फिर वो इस कब्ज़े से मिलने वाली ताकत को लोकतंत्र की रूह को बंदी बनाने के लिए इस्तेमाल करते हैं.
और फिर यूं होता है कि जिसके पास जितने ग़ुलाम, उतनी ही उसकी वाह-वाह. वोट लेना है तो ग़ुलामों के राजा की चौखट पर तो आना ही पड़ेगा, माथा तो रगड़ना ही पड़ेगा. भला राजा से कौन सवाल पूछ सकता है?

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किस्मत खुल जाती है...
आप सेक्युलर हों या नॉन सेक्युलर, गुरुजी की चौखट पर आप सिर्फ एक , भिखारी हैं. सिंध में सब जानते हैं कि हजरत मियां मिट्ठू किस तरह से लोगों का धर्म बदलवाते हैं.
मगर उनके मुरीदों की संख्या चूंकि लाखों में है, इसलिए मुस्लिम लीग हो या पीपल्स पार्टी या फिर इमरान की तहरीक-ए-इंसाफ़, मियां मिट्ठू सबके दुलारे हैं.
पीर पगारा की सियासी ताकत उनके मुरीद हैं. पीर साहब जिस पर हाथ रख दें उसकी किस्मत खुल जाती है.
विदेशी मामलों के पूर्व मंत्री शाह महमूद कुरैशी अगर हज़रत भाउद्दीन ज़िकरिया के गद्दीनशीं न होते तो मेरी तरह के ही शरीफ़ आदमी होते.
बेग़म आबिदा हुसैन अगर गद्दीनशीं न होतीं तो उनके अमरीका में पाकिस्तान का राजदूत या मरकज़ में मंत्री बनने उतनी ही संभावना होती जितनी मेरी है.

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सलाह नहीं टालते...
नवाज़ शरीफ़ हों या स्वर्गीय बेनज़ीर भुट्टो, दोनों एबटाबाद के छड़ी बाबा के पास इस आस में जाते रहे कि बाबा जी अगर एक डंडा पीठ पर मार देंगे तो नसीब खुल जाएगा.
आसिफ़ ज़रदारी के साथ पीर एजाज़ शाह भी पूरे पांच साल राष्ट्रपति भवन में विराजमान रहे. पीर साहब रोज़ाना पहले काला बकरा कुर्बान करते, उसके बाद राष्ट्रपति को सरकारी कामकाज शुरू करने की इजाज़त देते.
भूतपूर्व प्रधानमंत्री यूसुफ रज़ान गिलानी तो माशाअल्लाह खुद पीर हैं. ऑक्सफर्ड के पढ़े-लिखे और नया पाकिस्तान बनाने का नारा लगाने वाले इमरान ख़ान भी पाक पतन की एक पीरानी बुशरा पिंकी बीवी के मुरीद हैं और उनकी कोई सलाह नहीं टालते.
मगर जैसे दूध में मक्खी गिर जाती है, उसी तरह बहुत से अच्छे पीरों, साधुओं और बाबाओं में भी कुछ फ्रॉडी खाल पहनकर घुस आते हैं और फिर एक दिन सवालों की हांडियां चौक पर फूट जाती हैं.

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बाबा में क्या कमी है?
अब अगर सिरसा वाले बाबा को रेप केस में सज़ा न मिलती तो फिर यह सवाल भी न उठता कि उनका चाल-चलन कैसा है. उनकी ताकत वैसी ही बनी रहती और हर लोकतांत्रिक उनकी चौखट पर माथा टेकता रहता.
बात अच्छे या बुरे बाबा या पीर की नहीं, बात यह है कि क्या लोकतंत्र इसी का नाम है कि आप वोटों के लालच में बेचारे लोकतंत्र को भी किसी गुरु, किसी बाबा या किसी पीर के खूंटे पर बकरे की तरह बांध दें?
करोड़ों लोग आपको किसी आस उम्मीद में वोट देते हैं. मगर आपकी आस उन लोगों की ग़ुलाम बनी रहती है जिन्हें कोई लगाम नहीं बांध सकती.
अगर यही जम्हूरियत है और जनता के बजाय बाबाओं की ही सेवा करनी है तो बाबा गुरमीत राम रहीम या एबटाबाद के डंडे वाले पीर बाबा में क्या कमी है? दे दें सत्ता भी उन्हीं के हाथों में और ख़ुद मुक्ति पा लें उनके चरणों में बैठकर.
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