#70yearsofpartition: 'जो कुछ मैं देख कर आ रहा हूँ, अगर आप देख लें तो जूती भी न पहनें'

सफ़िया हमदानी
    • Author, सफ़िया हमदानी
    • पदनाम, पाकिस्तान से, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए

बंटवारे के समय सफ़िया हमदानी 13 साल की थीं और उन्होंने अपने परिवार के साथ फिरोजपुर से पाकिस्तान यात्रा का वर्णन किया है.

मैं फिरोजपुर में 1936 में पैदा हुई. हम पांच बहनें और एक भाई थे और मैं सबसे छोटी हूँ. उन सब में अब मैं ही केवल जीवित हूं.

मेरे पिता सैयद बशीर हमदानी वकील थे. मेरे पैदा होने के कुछ समय बाद हम लोग गुरदासपुर चले गए लेकिन जल्द ही हम वापस फिरोज़पुर लौट आए और मेरे पिता कासो बेगू में ऑर्डिनेंस डिपो में सिविल लेबर ऑफिसर लग गए. फिरोज़पुर डिपो शहर से 17 से 18 किलोमीटर दूर था और हम स्कूल जाते थे.

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पाकिस्तान के लिए जुलूस

इसलिए शहर के कूचा क़ादिर बख़्श गली में घर लिया गया और मेरे पिता सेना की ट्रक से डिपो जाया करते थे. उनके साथ इस ट्रक में कई और भी सिविल ऑफिसर जाया करते थे.

हम सुनते थे कि लोग पाकिस्तान के लिए जुलूस निकलते हैं. मेरा भाई जो पांचवी कक्षा में था, एक दिन कहने लगा कि चलो हम भी जुलूस निकालते हैं.

मैं, मेरा भाई और मेरे चाचा के बेटे थे. हम नारे लगाते चल पड़े. आगे मेरा भाई और मैं और हमारे रिश्तेदार पीछे नारे लगाते चल पड़े. हम सिविल अस्पताल के सामने पुलिस स्टेशन के पास रुक गए और नारे लगाने लगे.

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हिंदू और सिख

हमारी आवाज़ सुनकर पुलिस स्टेशन से एक सिपाही निकला जिसे देखकर मेरे रिश्तेदार भाग पड़े लेकिन मेरा भाई खड़ा होकर नारे लगाता रहा. सिपाही ने मेरे भाई का हाथ पकड़ कर कहा 'चल काका अब घर जाओ.' इस सिपाही ने मेरे पिता को भी शिकायत लगाई जिसके बाद हमारे पिता ने हमें बहुत डांटा.

मेरी एक मौसी पुलिस लाइंस में रहती थीं और मौसा सीआईडी में इंस्पेक्टर थे. ईद से एक दिन पहले वे सभी आए और कहने लगे कि आज पुलिस स्टेशन में सभी स्टाफ हिंदू और सिख आ गए हैं और पुलिस लाइंस में अब केवल वे ही मुसलमान रह गए हैं. मेरे पिता और माँ ने उनसे कहा कि वे हमारे यहां ही रुक जाएं.

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परिवार को कसूर भेज दिया...

ऐसे कूचा क़ादिर बख़्श गली के घर में हमारा परिवार, हमारे चाचा और मौसी का परिवार इकट्ठा हो गया. कूचा क़ादिर बख़्श गली में लगभग सभी लोग मुसलमान ही रहते थे और ज़्यादातर मुसलमान कसूर से थे और ईद से दो या तीन दिन पहले उन्होंने अपने परिवार को कसूर भेज दिया था.

ईद गुजर गई और उसके दूसरे दिन सब कहने लगे कि आज रात को बहुत खतरा है और इस मुहल्ले पर सिख हमला करेंगे. उसी रात हम खाना खाकर लेटे ही थे कि हमें आवाजें सुनाई दीं, 'सत श्री अकाल जो बोले सो निहाल.' इस आवाज के साथ ही हमारे मोहल्ले में मुसलमानों ने या अली और अल्लाहो अकबर के नारे लगाए.

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या अली के नारे...

इतना शोर हो गया कि हम बच्चे चीख़ें मारने लगे. हमारा पड़ोसी एक हिंदू था जो एक अमीर आदमी था. उसने जब हमारे घर से चीखों की आवाजें सुनकर पूछा, 'हमदानी साहब खैरियत है? इतना शोर क्यों है?' मेरे पिता ने कहा कि 'खैरियत है बस बच्चे डर गए थे.' ऊंची आवाज में या अली और अल्लाहो अकबर सुनकर सिख आगे नहीं आए.

अगले दिन सबने कहा कि यहां रहना उचित नहीं है और आज सिख ज़रूर आएंगे. कर्फ्यू लगा हुआ था. हमारे घर के ऊपर वाले हिस्से में एक खिड़की सड़क पर खुलती थी और सीढ़ियों से नीचे जाती थी. मोहल्ले वालों ने हमें कहा कि आप सीढ़ियां बंद करें. इसलिए दरवाजे के आगे सामान रखा ताकि कोई बाहर से दरवाजा न खोल पाए.

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मानवता नहीं है...

मोहल्ले वाले मदद के लिए आए और ऊपर वाली खिड़की के पास ईंट जमा कर लीं कि अगर हमला होता है तो ऊपर से ईंट मारेंगे. मेरे पिता ने कहा कि ईंट अभी से तोड़ कर रख लेते हैं ताकि जब हमला हो तो उस समय ईंट तोड़नी न पड़ें. मोहल्ले वालों ने कहा कि ईंट क्यों तोड़ रहे हैं, ईंट तो साबुत मारनी हैं?

मेरे पिता ने कहा कि यह मानवता नहीं है, साबुत ईंटें मारने से अंदरूनी चोट लग सकती है. सब कहने लगे कि 'हमदानी साहब वे मारने के लिए कटार लाएंगे और आप मानवता की बात कर रहे हैं.'

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पुलिस स्टेशन करीब है...

अगले दिन मेरे पिता और चाचा ने कहा कि यहां से पुलिस स्टेशन करीब है और मौसा, जो सीआईडी में इंस्पेक्टर थे, से कहा कि सफेद कपड़े पकड़कर पुलिस स्टेशन जाएं और उनसे कहें कि सीमा पार करवाने के लिए ट्रक दें. कासो बेगू ऑर्डिनेंस डिपो के कर्नल अंग्रेज थे और वहाँ दो आला अधिकारी मुसलमान भी थे.

कर्नल ने कहा कि हालात इतने खराब हैं और सीएलओ यानी मेरे पिता शहर में हैं और उन्हें वहां से निकाला जाना जरूरी है. मेरे चाचा के दामाद भी सेना में थे और कर्नल ने उन्हें हमारी तरफ भेजा. वे हमारे घर पहुंचे और कहा कि ट्रक खड़ा है जल्दी चलें. मेरी माँ ने दो सैनिकों को भेजने के लिए कहा ताकि दो-तीन सूटकेस उठाया जा सके.

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सेना की ट्रक...

वे कहने लगे कि 'जो कुछ मैं देख कर आ रहा हूँ, अगर आप देख लें तो जूती भी न पहनें.' हम तीन परिवार के 20 लोग घर से रवाना हुए और सेना की ट्रक को पुलिस स्टेशन के पास रोका ताकि मौसा को वहां से बिठा लें. मेरे मौसा इतने परेशान थे कि किसी को पहचान नहीं रहे थे और बड़ी मुश्किल से उन्हें ट्रक में बिठाया गया.

वे कहने लगे कि मैं जब मैंने पुलिस स्टेशन के कर्मचारी से कहा कि सीमा पार करवाने के लिए ट्रक की व्यवस्था करवा दो तो हिंदू पुलिसकर्मी ने कहा कि 'आओ बैठें. अब वाहन की व्यवस्था करते हैं.'

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परिवार के साथ...

मौसा ने बताया कि सामने अस्पताल में ट्रकों में घायल लोग और शव आ रही थे और पुलिस वाले ठहाके लगाकर गिनती कर रहे थे और जब मैं उठने लगता तो वे कहते कि आप बैठें, अब व्यवस्था करते हैं.'

पुलिस स्टेशन से हम खैरियत से ऑर्डिनेंस डिपो अपने रिश्तेदार की तरफ पहुँच गए. लेकिन अगले दिन सुरक्षा अधिकारी ने मेरे पिता से कहा वे कि केवल अपने परिवार के साथ रह सकते हैं और बाकी लोग जाएं. मेरे पिता ने कहा कि ये सब मेरा परिवार है तो उस पर अंग्रेज कर्नल ने कहा कि उन्हें सीमा पार करवा दो.

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कागज़ पर हस्ताक्षर...

इस ट्रक का कैप्टन एक सिख था. वह हमें शिविर ले गया और कहने लगा कि वो केवल उनके परिवार को सीमा पार ले जाएगा. मेरे पिता ने उससे कहा कि कर्नल ने सब को ले जाने के लिए कहा है. लगभग 15 से 20 मिनट तक बहस करने के बाद उसने कहा कि आप कागज़ पर हस्ताक्षर कर दें कि सीमा पार करवा दी है.

मेरे पिता ने कहा कि वह साइन नहीं करेंगे. वह हमें शिविर में छोड़ कर चला गया. शिविर क्या था एक खुली जगह जहां मिट्टी ही मिट्टी थी. कोई जमीन पर लेटा हुआ था तो कोई इधर-उधर घूम रहा था. कोई आकर पूछता था कि पानी तो दे दो, अगर रोटी है तो दे दो, दो दिन से भूखे हैं.

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हम मजबूर थे...

हम वहाँ दो घंटे ही बैठे थे कि वह सिख कप्तान फिर ट्रक लेकर आया और कहा कि 'हमदानी साहब, आप साइन करना भूल गए.' मेरे पिता ने कहा कि 'मैं भूला नहीं, मैंने किया नहीं और न ही करूंगा.' आखिरकार सिख कप्तान बोला कि सीमा पार करवा देता हूँ.

शिविर में मौजूद लोग हमारे सामने हाथ फैला रहे थे कि हमारे बुजुर्ग माता-पिता या या उसे ले जाएं लेकिन हम मजबूर थे. हमने पुल पार किया तो सामने लिखा था 'कसूर रेलवे स्टेशन.' मेरे पिता ने कागज पर साइन किया तो सिख कप्तान ने कहा कि 'मुझे धन्यवाद नहीं कहेंगे?'

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कसूर से मुल्तान

मेरे पिता ने कागज़ साइन करते हुए कहा कि 'कर्नल साहब को धन्यवाद कह देना.' कसूर रेलवे स्टेशन पर मुल्तान के लिए ट्रेन तैयार खड़ी थी और हम भी ट्रेन पर सवार हो गए. हर स्टेशन पर लोग बाल्टी में चने की दाल और रोटी लाते और इसके साथ नींबू देते कि पानी में डालकर पी लें.

पाक पतन जाकर ट्रेन रुक गई कि कोयला समाप्त हो गया है और सुबह तक कोयला पहुंचेगा तो ट्रेन चलेगी. पुरुषों से कहा गया कि प्लेटफॉर्म पर सो जाएं और एक पतली लकड़ी की सीढ़ी लगा दी कि औरतें और बच्चे ट्रेन के ऊपर सो जाएं. रात राजी-खुशी से गुज़री और हम मुल्तान पहुंचे.

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मुल्तान में मेरे दो मामा रहते थे. हमने उन्हें फोन किया कि हम पहुँच गए हैं. मेरे छोटे मामा ने हमें रेलवे स्टेशन से लाने के लिए ये कहते हुए इनकार कर दिया कि 'मैं नहीं जा रहा, मेरी बहन कहेगी कि मेरी बेटियों को सिख उठाकर ले गए.' मेरे बड़े मामा हमें स्टेशन पर लेने आए तो सबसे पहले पूछा कि 'बहन सबसे बच्चियां खैरियत हैं ना.'

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