लू श्याबाओ की मौत पर दुनिया भर में चीन की तीखी आलोचना

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अपने सबसे बड़े विद्रोही नेता लू श्याबाओ के लिवर कैंसर का देश के बाहर इलाज़ नहीं करवाने के लिए अंतरराष्ट्रीय मंच पर चीन को आलोचना का सामना करना पड़ रहा है.
11 साल से ज़ेल में बंद राजनीतिक कार्यकर्ता श्याबाओ की चीन के एक अस्पताल में 61 वर्ष की उम्र में मौत हो गई.
2010 में श्याबाओ को नोबेल शांति पुरस्कार से सम्मानित करने वाली समिति ने कहा है कि उनकी मौत के लिए चीन सबसे अधिक ज़िम्मेदार है.
अब बीज़िंग से उनकी नज़रबंद पत्नी को छोड़ने का आग्रह किया जा रहा है.
चीन में आधिकारिक प्रतिक्रियाओं को रोक दिया गया है और एक सरकारी अख़बार ने पश्चिमी ताक़तों पर इस मामले का राजनीतिकरण करने का आरोप लगाया है.
इलाज़ में लापरवाही का आरोप
लू श्याबाओ को पिछले महीने उत्तर-पूर्वी शहर शेनयांग की एक ज़ेल में भारी सुरक्षा के बीच रखा गया था.
चीन की सरकार ने पश्चिमी देशों के द्वारा शू का इलाज़ देश से बाहर कराने की मांग को यह कहते हुए ठुकरा दिया था कि बीमारी की वज़ह से वो यात्रा करने में सक्षम नहीं हैं.
जबकि हाल ही में उनकी जांच के लिए पहुंचे एक जर्मन और अमेरिकी डॉक्टर ने कहा था कि वो इलाज़ के लिए विदेश ले जाने लायक हैं.

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श्याबाओ के अंतिम शब्द
लू श्याबाओ का निधन उनकी पत्नी और परिजनों की मौज़ूदगी में हुआ. मौत से पहले उन्होंने कहा, "अच्छी तरह जीना."
उनकी की मौत के बाद शेनयांग के स्थानीय अधिकारियों ने एक बयान जारी कर बताया, "लू के शरीर के कई अंगों ने काम करना बंद कर दिया था, उन्हें बचाने के सारे प्रयास नाकाम रहे."
लू श्याबाओ की मौत को असामान्य बताते हुए नोबेल पुरस्कार समिति ने कहा कि उन्हें देश के बाहर इलाज़ कराने की अनुमति नहीं दिए जाने से वो बेहद आहत हैं.
जर्मनी ने जताया अफ़सोस
जर्मनी के विदेश मंत्री सिगमर गेब्रियल ने भी श्याबाओ के निधन पर शोक जताते हुए कहा कि उन्हें दुख है कि उनको इलाज़ के लिए बाहर नहीं ले जाया सका. जर्मनी को श्याबाओ के इलाज़ के लिए एक वैकल्पिक देश के रूप में देखा जा रहा था.

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मीडिया ने लिखा पथभ्रष्ट नेता
चीन की मीडिया में श्याबाओ की मौत की ख़बर को ख़ास तवज्जो नहीं दिया गया. शिन्हुआ और सीसीटीवी समाचार ने अपनी अंग्रेजी की वेबसाइट पर केवल इतना लिखा कि "राजसत्ता को उखाड़ फेंकने के लिए सजायाफ़्ता लू श्याबाओ का निधन."
कम्युनिस्ट पार्टी के मुखपत्र ग्लोबल टाइम्स ने लिखा कि लू श्याबाओ पश्चिम का शिकार "पथभ्रष्ट नेता."
अख़बार ने आगे लिखा कि चीनी पक्ष श्याबाओ के उपचार पर अपना ध्यान केंद्रित करता रहा, लेकिन कुछ पश्चिमी ताक़तें हमेशा उनके इलाज़ को मानवाधिकार से जोड़ कर इस मामले को राजनीतिक चोला पहनाने का प्रयास करते रहे.
शोक संदेश हटाए गए
सोशल मीडिया यूजर्स को भी ऑनलाइन प्रतिक्रियाओं को दबाने का प्रयास दिखा. यहां कई प्रतिक्रियाएं डिलिट कर दी गईं. यहां तक कि कैंडल इमोजी और आरआईपी तक को हटा दिया गया.

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कौन थे लू श्याबाओ?
पूर्व प्रोफ़ेसर, 61 वर्षीय लू श्याबाओ को सत्ता को उखाड़ फेंकने की कोशिश का दोषी पाया गया था और वो लिवर कैंसर से जूझ रहे थे.
चीन की सरकार ने उन्हें अपराधी घोषित कर उनके जीवन काल के दौरान उन्हें कई बार ज़ेल भेजा.
अपने विद्रोही राजनीतिक विचारों और चीनी कम्युनिस्ट पार्टी की तीखी आलोचना के लिए जाने जाने वाले लू लगातार लोकतंत्र और मुक्त चीन के लिए अभियान चलाते रहे.
उनके सामाजिक अभियान का सबसे अहम पहल 1989 में आया जब तियानमेन नरसंहार हुआ था.
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