|
पोलिंग एजेंट बनीं यौनकर्मी भी | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
किसी भी चुनाव के दौरान महिला यौनकर्मी वोट तो देती हैं लेकिन इस बार कोलकाता में वे पहली बार पोलिंग एजेंट भी बनेंगी. सोनागाछी की छह यौनकर्मी महिलाओं को सरकार ने इस बार पोलिंग एजेंट का काम सौंपा है. ये यौनकर्मी सोनागाछी इलाक़े में होने वाले मतदान के दौरान पोलिंग एजेंट के तौर पर काम करेंगी यानी वोट डालने में मतदाताओं की मदद करेंगी. इन्हीं पोलिंग एजेंटों में शामिल हैं सपना और रेखा जो पिछले कई वर्षों से सोनागाछी में देह व्यापार कर रही हैं. सपना कहती हैं, "हमने अख़बार में कहीं पढ़ा था कि सरकार के पास पर्याप्त संख्या में पोलिंग एजेंट नहीं हैं तो हमने सरकार से कहा कि क़रीब पाँच हज़ार यौनकर्मी यह कार्य कर सकते हैं." लेकिन सभी यौनकर्मियों को ये काम क्यों नहीं मिला, इस पर सपना कहती हैं, "ये तो सरकार का फ़ैसला है, हम क्या कर सकते हैं. यौनकर्मियों को मुख्यधारा में लाने में इससे मदद ही मिलेगी." बदलाव सोनागाछी की बदनाम गलियों में हज़ारों की संख्या में लड़कियाँ इस देह व्यापार में लिप्त हैं और हर पाँच साल पर वो वोट भी डालती हैं लेकिन उनके जीवन में क्या कोई बदलाव आया है.
सपना कहती हैं, "आज से बीस साल पहले प्रॉक्सी वोटिंग होती थी यानी हम लोगों से फ़र्ज़ी मतदान कराया जाता था लेकिन अब हम ऐसा नहीं करते हैं. हमें पता है कि हमारे वोट की क़ीमत है. मैं तो सभी से कहती हूँ कि उनके वोट से ही बदलाव आएगा." सोनागाछी में राजनीतिक दल चुनाव प्रचार भी करते हैं और यौनकर्मियों को बदलाव का भरोसा देते हैं लेकिन यौनकर्मियों को भी पता है कि ये भरोसा छोटी मोटी बातों का है. राजनेता उनके जीवन में कोई क्रांतिकारी बदलाव नहीं ला सकते. सपना और रेखा जैसी अनेक यौनकर्मी महिलाएँ इस इलाक़े में हैं जिनके बच्चे भी हैं. ये बच्चे सोनागाछी में नहीं रहते बल्कि एक स्वयंसेवी संस्था द्वारा चलाए जा रहे एक छात्रावास में रहकर पढ़ाई करते हैं. सपना के दो बच्चे हैं और सपना चाहती है कि उनके बच्चे बड़े होकर कुछ अच्छा कर सकें. सपना अब एक स्वयंसेवी संस्था के लिए पूरे समय काम करती हैं लेकिन वो उन दिनों को नहीं भूलतीं जब वो इस व्यवसाय में आई थीं. अस्वीकृति वो उन दिनों को याद करते हुए कहती हैं, "छोटी उम्र में शादी हो गई. ग़रीब परिवार था. मैं किसी के घर में काम करती थी और वहाँ मेरा शारीरिक शोषण होता था. मुझे पैसे चाहिए थे तो मैं मना नहीं कर पाती थी. इससे बचने की कोशिश की तो भूखे मरने लगी. मरती क्या न करती इस धंधे में आना पड़ा."
रेखा की कहानी थोड़ी सी अलग है. वो कहती हैं कि उन्हें छोटी उम्र में किसी ने इस धंधे में धकेल दिया. बड़ी होने पर जब उन्होंने वापस परिवार में आने की कोशिश की तो समाज ने उन्हें स्वीकार नहीं किया. वो कहती है, "इसी धंधे की कमाई से अपने माँ बाप का भरण पोषण करती हूँ. बहन की शादी की. भाई को पढ़ाया. मेरे घर वालों को मेरे पेशे के बारे में पता है. मैं भी शादी कर के घर बसाना चाहती थी लेकिन समाज ने मुझे स्वीकार नहीं किया." रेखा की एक बेटी है जो डॉक्टर बनना चाहती है. यौनकर्मियों को अपने पेशे में आए दिन मुसीबतों का सामना करना पड़ता है और इससे सामना करने के लिए उन्हें पता नहीं क्या-क्या करना पड़ता है. रेखा और सपना को लगता है कि पोलिंग एजेंट बनकर लोकतंत्र के महापर्व में शामिल होने से उनका महत्व थोड़ा बढ़ जाएगा जिससे वो खुद को और अपने साथियों को छोटी मोटी समस्याओं से निजात दिला पाएँगी. |
इससे जुड़ी ख़बरें असम से महिलाओं की तस्करी पर चिंता06 जून, 2008 | भारत और पड़ोस अंधेरी ज़िंदगी में उम्मीद की नई किरण23 जनवरी, 2008 | भारत और पड़ोस यौनकर्मियों को नहीं मिलती दो गज़ ज़मीन12 नवंबर, 2007 | भारत और पड़ोस वेश्याओं को बाँटे जाएँगे महिलाओं के कंडोम14 मार्च, 2007 | भारत और पड़ोस उन्हें मिले 'मनोरंजनकर्मी' का दर्जा27 फ़रवरी, 2007 | भारत और पड़ोस लोकप्रिय हो रहा है यौनकर्मियों का बैंक27 अक्तूबर, 2006 | भारत और पड़ोस यौनकर्मियों की संख्या में भारी वृद्धि03 जुलाई, 2006 | भारत और पड़ोस यौनकर्मियों ने बदलावों का विरोध किया09 दिसंबर, 2005 | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
| |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||