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रविवार, 10 जुलाई, 2005 को 14:26 GMT तक के समाचार
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कोलकाता में वेश्याओं का 'अपना बैंक'

वेश्याओं का बैंक
बैंक ने वेश्याओं की आर्थिक समस्या का समाधान ढूँढने की कोशिश की है
नाम से और देखने में यह किसी आम दफ्तर जैसा लगता है. लेकिन भीतर कुछ देर तक रहने के बाद धीरे-धीरे इसकी खासियत सामने आने लगती है.

खासियत यह कि देश के सबसे बड़े रेडलाइट इलाकों में से एक, कोलकाता के सोनागाछी की हजारों वेश्याओं का यह ‘अपना बैंक’ है.

‘ऊषा मल्टीपर्पस कोऑपरेटिव सोसाइटी लिमिटेड’ एक ऐसा अनूठा बैंक हैं जहाँ कर्मचारी भी सेक्स वर्कर हैं और ग्राहक भी. फिलहाल इस सोसाइटी में सात हजार तीन सौ ग्राहक हैं.

 अब अपने बैंक से हमें दूसरे बैंकों से मिलने वाली तमाम सहूलियतें मिलती हैं. इसके अलावा शरीर ढल जाने पर इस रकम से मैं कम से कम दो वक्त की रोटी तो जुटा सकती हूँ
कल्पना

समिति की सचिव सुजाता दत्त कहती हैं कि "यह वेश्याओं का अपना बैंक हैं, जहाँ वे बेहिचक आकर अपना पैसा जमा करती हैं. उनको आम बैंकों के मुकाबले ज्यादा सूद मिलता है. कोई भी बैंक बचत खाते में जमा रकम पर तीन से चार फीसदी ही ब्याज देता है. लेकिन समिति साढ़े छह फीसदी देती है."

वे कहती हैं कि "फिलहाल हमारी जमा पूंजी आठ करोड़ तक पहुँच गई है."

ब्याज के लिए पैसे कहाँ से आते हैं? इस सवाल पर दत्त का कहना है कि "हम विभिन्न योजनाओं में इन पैसों को लगाते हैं. इसके अलावा वेश्याओं को कर्ज भी दिया जाता है. समिति की कई योजनाएँ है. लेकिन ज्यादातर ग्राहक दैनिक जमा योजना के ही हैं. वेश्याएं इसमें रोजाना तीन सौ से लेकर एक हजार तक की रकम जमा करती हैं."

सुविधा

इस समिति की संस्थापक दुर्बार महिला समन्वय समिति की अध्यक्ष स्वपना गाइन बताती हैं कि "वेश्याओं को सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में खाता खोलने में काफी दिक्कत होती थी. उनसे पति के नाम के अलावा तमाम प्रमाणपत्र माँगे जाते थे. इन दिक्कतों के कारण ही हमने वर्ष 1995 में इस समिति की स्थापना की."

स्वप्ना गाइन
बैंक की स्थापना स्वप्ना ने दस वर्ष पहले की थी

वे बताती हैं कि "यहाँ जमा रकम वेश्याओं के लिए बुढ़ापे में काफी सहारा साबित होती है. कई वेश्याएँ अपनी बचत के जरिए ही अपने बेटे-बेटियों को दूर बोर्डिंग स्कूलों में पढ़ा रही हैं. वे नहीं चाहतीं कि उनके बच्चे भी इस पेशे में आएँ."

बैंक में पैसा जमा करने आई कल्पना बताती है कि उसका बेटा एक हॉस्टल में रहकर पढ़ता है. उसके लिए ही वह अपने पैसे बचाकर रखती है. पहले ऐसा संभव नहीं था, क्योंकि बैंक वाले खाता नहीं खोलते थे.

वे कहती हैं, "अब अपने बैंक से हमें दूसरे बैंकों से मिलने वाली तमाम सहूलियतें मिलती हैं. इसके अलावा शरीर ढल जाने पर इस रकम से मैं कम से कम दो वक्त की रोटी तो जुटा सकती हूँ."

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