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गुमनाम बच्चों को मिली पहचान | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
पूजा, भोला, तापसी और पियाली को ऑस्कर के बारे में भले कोई जानकारी नहीं हो, लेकिन वे इसी बात से खुश हैं कि उनकी जाना आंटी को कोई बड़ा इनाम मिला है. अब उनको इंतजार है अपनी आंटी का जो अगले महीने कोलकाता आने वाली हैं. जाना ब्रिस्की और रोज काफ़मैन के वृत्तचित्र ‘बार्न इंटू ब्राथेल्स’ को मिले ऑस्कर ने 14 से 16 साल की उम्र के इन गुमनाम बच्चों को अचानक मानों एक पहचान दे दी है. आखिर हो भी क्यों न? इन्हीं की खींची तस्वीरों के आधार पर तो बनी है यह डाक्यूमेंट्री. ये बच्चे सोनागाछी में रहने वाली वेश्याओं के हैं. ऑस्कर की घोषणा होते ही इन बच्चों में खुशी की लहर दौड़ गई. इन्होंने केक काटा और नाच-गाकर खुशियाँ मनाईं. जाना ब्रिस्की के लिए सबसे ज्यादा तस्वीरें खींचने वाली पूजा कहती हैं कि उसे बचपन से ही फोटोग्राफी का शौक था. आंटी के कैमरे ने उसकी यह इच्छा पूरी कर दी. वह कहती है कि “बड़ी होकर फोटोग्राफर ही बनूँगी.” उसने टीवी पर अपनी आंटी को ऑस्कर लेते देखा था. देखते हुए उसकी आंखों से आँसू निकल पड़े थे. उसे और बाकी बच्चों को इस बात का दुख है कि वे इस फिल्म को नहीं देख पाएँगे. पहचान का संकट इस फ़िल्म से बच्चों को पहचान तो मिली लेकिन यह पहचान अब उनके लिए मुसीबतें भी खड़ी कर रही है.
इनमें से कुछ बच्चे ‘सबेरा फाउंडेशन’ नामक एक गैर-सरकारी संगठन के छात्रावास में रह कर पढ़ाई करते हैं. उसके एक अधिकारी कहते हैं कि पहले बाकी बच्चों को यह पता नहीं था कि कुछ बच्चे सोनागाछी से भी आए हैं. लेकिन इस डाक्यूमेंट्री को मिले ऑस्कर ने इस रहस्य से पर्दा उठा दिया है. वेश्याओं के बीच काम करने वाले सबसे बड़े संगठन ‘दुर्बार महिला समन्वय समिति’ के महासचिव मृणाल कांति दत्त कहते हैं कि “हमने जाना को फिल्म का एक प्रिंट भेजने को भी कहा था. लेकिन उस पत्र का कोई जवाब नहीं मिला. इससे पता नहीं चलता कि फिल्म में सोनागाछी का चित्रण कैसे किया गया है.” लेकिन फिल्म का आधार बनने वाले बच्चों को इन सब बातों से कोई मतलब नहीं है. उनको तो अपनी जाना आंटी का बेसब्री से इंतजार है. उन्होंने यहाँ इस बस्ती के बच्चों के लिए एक स्कूल खोलने का वादा किया है और तस्वीर खींचने वाले बच्चों को अमरीका घुमाने का भी. |
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