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शुक्रवार, 07 नवंबर, 2003 को 13:53 GMT तक के समाचार
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कॉन्डम के इस्तेमाल से अब भी कतराते हैं लोग
विभिन्न कॉन्डम
भारत में लोग अब भी कॉन्डम के इस्तेमाल से कतराते हैं

हाल में हुए एक सर्वेक्षण से ये पता चला है कि भारत में एड्सग्रस्त लोगों में से 80 प्रतिशत को ये रोग असुरक्षित यौन संबंधों से होता है. इसके बावजूद भारत में लोग आमतौर पर कॉन्डम के इस्तेमाल से दूर भागते हैं.

हिंदुस्तान लेटेक्स लिमिटेड भारत में कॉन्डम बनाने वाला एक प्रमुख कारखाना है.

वहाँ भारत के जाने माने ब्रांड निरोध, मूड्स वगैरह बनते हैं.

कंपनी के प्रबंध निदेशक एजी पणिक्कर ने बताया," कंपनी के उत्पादन से देश में कॉन्डम की खपत को आसानी से पूरा किया जा सकता है. दरअसल भारत में कंपनी के उत्पादन का सिर्फ़ पाँच प्रतिशत कॉन्डम ही इस्तेमाल हो पाता है."

भारतीय समाज में संतान रोकने के लिए भी कॉन्डम की जगह नसबंदी ही ज़्यादा पंसद की जाती है.

इस सीमित इस्तेमाल के बारे में भारत सरकार के स्वास्थ्य सचिव जेवीआर प्रसाद राव का कहना था,

"भारत में कॉन्डम का इस्तेमाल कम इसलिए है क्योंकि यहाँ उसके इस्तेमाल की जानकारी को अच्छी तरह से व्यवस्थित नहीं किया जा सका है."

अगर शुरू से ही कॉन्डम के इस्तेमाल में पुरुष सक्रियता दिखाते तो आज देश की जनसंख्या नियंत्रित रहती. मैं अचंभित हूँ कि मर्द इसके इस्तेमाल से पीछे भागते हैं

मीनाक्षी दत्ता घोष

उन्होंने ये भी कहा," ज़रूरत है इसकी सही मार्केटिंग की. इसे हर जगह उपलब्ध होना चाहिए. यहाँ तक की पान की दुकानों में भी. जब जिसे जहाँ ज़रूरत हो वो निस्संकोच होकर कॉन्डम ख़रीद ले."

तो क्या जब हर जगह कॉन्डम मिलेगा तो लोग उसका इस्तेमाल करेंगे? इस बारे में पता लगाने का अच्छा साधन हो सकते थे ट्रक ड्राइवर.

इस पर अधिकतर ट्रक ड्राइवरों का कहना था कि इस रोग से मरने का डर तो सबको लगता है पर कॉन्डम का इस्तेमाल कम लोग ही करते हैं.

शायद समाज में खुलेपन की कमी के चलते लोग इसके बारे में बातचीत करना भी कम ही पसंद करते हैं.

वहीं राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संस्थान (नैको) की प्रमुख मीनाक्षी दत्ता घोष का कहना है, "अगर शुरू से ही कॉन्डम के इस्तेमाल में पुरुष सक्रियता दिखाते तो आज देश की जनसंख्या नियंत्रित रहती. मैं अचंभित हूँ कि मर्द इसके इस्तेमाल से पीछे भागते हैं."

हिंदुस्तान लेटेक्स लिमिटेड
हिंदुस्तान लेटेक्स लिमिटेड देश की एक प्रमुख कॉन्डम निर्माता फ़ैक्टरी है

उन्होंने ये भी बताया कि महिलाओं पर एड्स का ख़तरा अधिक है.

दिल्ली की स्वयंसेवी संस्था नाज़ फ़ाउंडेशन की अंजली गोपालन इसे 'भारतीय समाज के पाखंड' की संज्ञा देती हैं.

इन तमाम प्रतिक्रियाओं को देखने के बाद लगता तो यही है कि लोगों में अपनी सुरक्षा को लेकर सजगता की कमी हैं.

आज के इस प्रचार तंत्र में सरकारों और विभिन्न मीडिया संगठनों की सक्रियता को देखते हुए ऐसा भी नहीं कह सकते हैं कि लोगों के पास जानकारी नहीं है.

पर सब कुछ जानते हुए भी लोग अब भी कॉन्डम के इस्तेमाल से भाग ही रहे हैं.

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