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अंधेरी ज़िंदगी में उम्मीद की नई किरण

पाठ्यक्रम को यौनकर्मियों की बेटियों की संस्था 'परचम' के माध्यम से लागू किया जाएगा
इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय बिहार के सबसे बड़े और सबसे पुराने रेडलाइट इलाक़े चतुर्भुज स्थान की यौनकमिर्यों के लिए उनके ही क्षेत्र में रोज़गारोन्मुख पाठ्यक्रम शुरू करने जा रहा है.

अधिकारियों को यक़ीन है कि ऐसे क़दम से यौनकर्मियों और उनकी बेटियों को रोज़गार के सम्मानजनक विकल्प मिलेंगे जिससे उन्हें अपने ख़ानदानी पेशे को छोड़ने में मदद मिल सकेगी.

इंदिरा गांधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय (इग्नू) के इस प्रस्ताव से चतुर्भुज स्थान की यौनकर्मियों के साथ-साथ उनकी युवा लड़कियों में काफी उत्साह है.

चतुर्भुज स्थान में चार सौ से अधिक परिवारों की महिलाएँ पुश्त-दर-पुश्त से नाचने-गाने के अलावा यौन व्यवसाय में लगी हैं.

 चाहे जितनी भी कोशिश कर ली जाए, जब तक हम उनके सामने रोज़गार के सम्मानजनक विकल्प नहीं मुहैया कराते तब तक उनके लिए यौन व्यापार से हटना संभव नहीं है
एएन त्रिपाठी, क्षेत्रीय निदेशक इग्नू

इग्नू के क्षेत्रीय निदेशक एएन त्रिपाठी के प्रयासों से ही ये पाठ्यक्रम चतुर्भुज स्थान में शुरू हो रहा है.

त्रिपाठी कहते हैं, "चाहे जितनी भी कोशिश कर ली जाए, जब तक हम उनके सामने रोज़गार के सम्मानजनक विकल्प नहीं मुहैया कराते तब तक उनके लिए यौन व्यापार से हटना संभव नहीं है."

आशा

इग्नू की इस पहल का ज़िक्र सुनते ही संजीदा, नाज़नीन, शकुंतला और अरुणा जैसी अनेक यौनकर्मियों की आंखों में अपमान और समाजिक बहिष्कार की पीड़ा से मुक्ति की उम्मीद में खुशी के आंसू छलक पड़ते हैं.

संजीदा, नाज़नीन, चुन्नी बेगम, शकुंतला और अरुणा की उम्र चालीस से पैतालीस वर्ष के बीच है और इन सभी की बेटियाँ भी जवान हो चली हैं इसलिए उनकी माँओं को उनके भविष्य को लेकर काफी चिंता है.

 मेरी अनेक सहेलियों की बेटियों ने न चाहकर भी इस पेशे को अपना लिया है लेकिन अब लगता है कि इग्नू की इस पहल से हमारे अंदर इज़्ज़त से जीने की आस जगेगी
चुन्नी बेगम

चुन्नी बेगम कहती हैं, "मेरी अनेक सहेलियों की बेटियों ने न चाहकर भी इस पेशे को अपना लिया है लेकिन अब लगता है कि इग्नू की इस पहल से हमारे अंदर इज़्ज़त से जीने की आस जगेगी."

चतुर्भुज स्थान की कोई तीन दर्जन लड़कियों ने मिलकर अपनी एक ग़ैर सरकारी संस्था ‘परचम’ बनाई है. इसका मक़सद आत्मसम्मान जगाने के साथ-साथ रोज़गार के सम्मानजनक विकल्पों की तलाश करना है.

इग्नू ने अपनी योजना को ‘परचम’ के माध्यम से ही लागू करने का फैसला किया है.

नसीमा 'परचम' की सचिव हैं और वे अपनी पहचान नहीं छिपाती हैं

24 वर्षीय नसीमा ‘परचम’ की सचिव हैं. वे कहती हैं, "हमने रेडलाइट एरिया की पच्चीस बेटियों की पहचान की है जो इन पाठ्यक्रमों में दाखिला लेने को तैयार हैं."

निक़हत, रोमा और शबनम अभी पंद्रह वर्ष की हैं और पास के एक स्कूल में पढ़ रही हैं. यहाँ उन्हें कई तरह की सामाजिक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है.

‘परचम’ के संपर्क में आकर इनके अंदर आत्मविश्वास जागा है और वे ये बताने में भी नहीं हिचकतीं कि वे यौनकर्मियों की बेटियाँ हैं.

शबनम कहती हैं, "हम अपनी सच्चाइयों को खूब समझते हैं और हमें लगता है कि इग्नू की यह पहल हमारे लिए कारगर साबित हो सकती है और हमें जब रोज़गार के सम्मानजनक विकल्प मिलेंगे तो हम दुनिया को बता सकते हैं कि हम भी कुछ कर के दिखा सकते हैं."

इग्नू के क्षेत्रीय निदेशक एएन त्रिपाठी कहते हैं, "हमारे पाठ्यक्रम ऐसे हैं जिसे पूरा करके औपचारिक शिक्षा नहीं रखने वाले भी स्नातक तथा अन्य रोज़गारपरक पाठ्यक्रमों में नामांकन कराने के पात्र हो सकते हैं."

कई कोर्स

इग्नू की चतुर्भुज स्थान में कंप्यूटर, मोटर मैकेनिक और हस्तशिल्प सरीखे अन्य कई पाठ्यक्रम भी शुरू करने की योजना है.

रेडलाइट एरिया की इन लड़कियों के लिए चुन्नी बेगम एक रोल मॉडल हैं जिन्होंने कई वर्ष पहले यौन व्यवसाय से होने वाले हज़ारों की आमदनी को ठुकरा कर एक निजी संस्था में मामूली पैसे पर नौकरी शुरू कर ली थी.

 हम अपनी सच्चाइयों को खूब समझते हैं और हमें लगता है कि इग्नू की यह पहल हमारे लिए कारगर साबित हो सकती है और हमें जब रोज़गार के सम्मानजनक विकल्प मिलेंगे तो हम दुनिया को बता सकते हैं कि हम भी कुछ कर के दिखा सकते हैं
शबनम

चुन्नी कहती हैं, "ऐसा नारकीय जीवन कौन जीना चाहता है पर हमारी मजबूरी है कि हमारे पास कोई विकल्प नहीं है. अगर नए रास्ते खुलते हैं तो इससे अधिक हमें और क्या चाहिए."

‘परचम’ की सचिव नसीमा कहती हैं, "हमें यह कहने में कोई अपमान नहीं महसूस होता कि हमारी माँ यौन व्यवसाय से जुड़ी हैं और हमें उन्होंने इसी रोज़गार से पाला पोसा है."

वे कहती हैं, "इग्नू से हमें काफी उम्मीदें हैं और लगता है कि हमारे सपने अब मरेंगे नहीं. वह एक प्रसिद्ध कविता की पंक्ति अपने अंदाज़ में दोहराती हैं... 'खतरनाक होता है सपनों का मर जाना.’ फिर उनकी आँखें छलक जाती हैं.

वे बताती हैं कि स्कूल की सहेलियाँ उन पर ताने कसा करती थीं और उनकी माँ की पहचान को आधार बनाकर पढ़ाई की ज़रूरतों पर सवाल उठाया करती थीं.

नसीमा कहती हैं, "हमारी लड़ाई अभी लंबी है... अल्लाह हमारी मदद करे... आमीन."

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