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यौनकर्मियों को नहीं मिलती दो गज़ ज़मीन | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
यौनकर्मियों का जीवन तो कष्टप्रद होता ही है पर बांग्लादेश में कुछ यौनकर्मियों की तकलीफ़ यह है कि उन्हें मरने के बाद क़ब्र तक नसीब नहीं है. इन इलाक़ों में जब यौनकर्मियों की मौत होती है तो उनकी लाशें पानी में फेंक दी जाती हैं. बांग्लादेश के मोंगला बंदरगाह से सटा यौनकर्मियों का ऐसा ही एक गांव है बनियासांता. यहाँ पिछले साल तक यौनकर्मियों की लाशें पानी में बहा दी जाती थीं. लंबी लड़ाई के बाद अब इन यौनकर्मियों को क़ब्रगाह के लिए जगह मिली है लेकिन अभी भी इसमें अड़चनें आ रही हैं. बनियासांता में यौनकर्मियों के क़रीब 65 घर हैं जिसमें 170 यौनकर्मी रहते हैं. झोपड़ियों में रहने वाले इन यौनकर्मियों की हालत बहुत ख़राब कही जा सकती है क्योंकि अब पहले की तरह उनका कारोबार भी नहीं चलता है. यौनकर्मी और स्थानीय गैर सरकारी संगठन महिला जागृति संघ की सचिव रज़िया कहती हैं, "कई मुश्किलें हैं. पहले मोंगला बंदरगाह पर कई विदेशी नौकाएं आती थीं और हमें ग्राहक मिलते थे. अब ये बंदरगाह वीरान रहता है. हमारा धंधा चौपट हो गया है. यह स्थान धीरे-धीरे मर रहा है. हम भूखों मरने को मजबूर हैं."
मोंगला बंदरगाह के बंद होने की अपनी वजहें हैं जो जलवायु परिवर्तन से जुड़ी हैं. बांग्लादेश का आरोप है कि भारत के फरक्का बांध से पानी नहीं छोड़ने के कारण मोंगला बंदरगाह पर पानी नहीं आता और यहाँ मिट्टी जमा हो गई जिससे बंदरगाह धीरे-धीरे मर रहा है. बनियासांता में पिछले 25 बरसों से फेरी करने वाले अब्दुल सलाम कहते हैं, "बनियासांता तो शेष पथ पर है. तीन चार साल में यहाँ कोई नहीं होगा. एक ज़माने में ये गांव जगमग करता था. विदेशी ग्राहक आते थे. पैसा था. पांच सौ से अधिक वेश्याएं थी. अब तो कुछ भी नहीं है. ग़रीबी है. खंडहर है. शेष पथ है बस." इलाक़े में ग़ैरसरकारी संगठन काम कर रहे हैं लेकिन ये पर्याप्त नहीं हैं. रोज़ी के साथ-साथ स्कूल, विकास जैसे मसले हैं. एड्स के बारे में जागृति भी कम है लेकिन इसके बावजूद इन यौनकर्मियों की सबसे बड़ी खुशी क़ब्रगाह के लिए जगह पाना है. एक और यौनकर्मी सूफ़िया कहती हैं, "ग़ैरसरकारी संगठनों ने हमें अधिकारों के प्रति जागरुक किया. अब हम वोट देते हैं. अपने अधिकार पहचानते हैं. हमने क़ब्रगाह भी ले ली है सरकार से. अब कोई लाश फेंकी नहीं जाएगी. पहले हमें चप्पल पहनने का भी अधिकार नहीं था. अब हम चप्पल पहनकर बाज़ार में जाते हैं."
बनियासांता में कई मुस्लिम यौनकर्मी हैं जिनके लिए क़ब्र में दफ़नाया जाना बहुत महत्वपूर्ण है. एक और यौनकर्मी लकी(काल्पनिक नाम) कहती हैं, "हम तो जीवनभर बुरा काम करते हैं लेकिन मर कर भी हमें मिट्टी नहीं मिलती है. इससे बुरा क्या हो सकता है. अब कम से कम मिट्टी तो मिलेगी." बनियासांता को क़ब्रगाह सरकार से मिली है लेकिन कुछ बाहुबली उस पर कब्ज़ा करना चाहते हैं. रज़िया कहती हैं कि वो किसी को भी क़ब्रगाह नहीं देंगी और क़ानूनी लड़ाई लड़ती रहेंगी. बात करते हुए लकी की आँखों में आँसू आ जाते हैं और वो कहती हैं, "आपके लिखने से कुछ होगा क्या. कौन ये काम करना चाहता है. हमें कोई दूसरा काम मिले तो हम भी ये काम छोड़ना चाहेंगे लेकिन ऐसी मदद कोई नहीं करता." बनियासांता की यौनकर्मियों को अलग जगह बसाना या उनकी समस्याएं दूर करना शायद संभव नहीं है लेकिन उन्हें कम से कम इस बात का संतोष ज़रुर है कि उन्हें मिट्टी तो मिल सकेगी. | इससे जुड़ी ख़बरें ऐसा भी एक समुद्र तट...07 नवंबर, 2007 | भारत और पड़ोस सुंदरबन के मुहाने पर...07 नवंबर, 2007 | भारत और पड़ोस एक नदी के कितने नाम?06 नवंबर, 2007 | भारत और पड़ोस बांग्लादेश के गलाचिपा गाँव की दास्तां05 नवंबर, 2007 | भारत और पड़ोस बंगलादेश पर मंडराता 'ख़तरा'04 नवंबर, 2007 | भारत और पड़ोस अधिकार चाहती हैं भारतीय यौनकर्मी18 सितंबर, 2005 | भारत और पड़ोस कोलकाता में वेश्याओं का 'अपना बैंक'10 जुलाई, 2005 | भारत और पड़ोस सरकार ने बेसहारा छोड़ा | भारत और पड़ोस | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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