चरमपंथियों के जनाज़े में क्यों उमड़ती है भीड़?

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भारत प्रशासित जम्मू-कश्मीर में सुरक्षा बलों के साथ मुठभेड़ में हिज़्बुल मुजाहिदीन के कथित चरमपंथी बुरहान वानी की मौत के बाद घाटी में प्रदर्शनों का दौर थम नहीं रहा है.
प्रदर्शनों के दौरान हुई पत्थरबाज़ी, पेलेट गन के इस्तेमाल और झड़पों में 65 से ज़्यादा लोग मारे गए हैं और सुरक्षाकर्मियों समेत सैकड़ों लोग घायल हुए हैं.
दिल्ली में रह रहे एक कश्मीरी हिंदू सुशील पंडित ने इन प्रदर्शनों की वजहों की पड़ताल की है. पढ़ें उनकी राय-
"कश्मीर घाटी एक बार फिर भड़क उठी है.
तमाम लोगों का कहना है इस बार इसकी वजह जुलाई में सुरक्षा बलों के साथ हुई मुठभेड़ में चरमपंथी नेता बुरहान वानी की मौत है.
पिछली बार इस पैमाने पर कश्मीर में हिंसा 2010 में हुई थी, जब सुरक्षा बलों के साथ प्रदर्शनकारियों की झड़पों में सौ से ज़्यादा लोग मारे गए थे.
उस समय हिंसा तब भड़की थी जब श्रीनगर में आंसू गैस के गोलों की चपेट में आकर तुफ़ैल अहमद मट्टू नामक किशोर की मौत हो गई थी.

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इन दोनों घटनाओं के बीच में साल 2013 में चरमपंथी अफ़ज़ल गुरु को फांसी दी गई थी. उन्हें साल 2001 में भारतीय संसद पर हुए हमले में दोषी पाया गया था. उन्हें दिल्ली में फांसी दी गई थी और वहीं दफ़ना दिया गया था.
कश्मीर में अनेक लोगों की नज़र में मट्टू और वानी को मिला कर भी जो क़द बनता है, अफ़ज़ल गुरु का क़द उससे कई गुणे बड़ा था. पर उन्हें फांसी दिए जाने के बाद घाटी में हिंसा की कोई बड़ी वारदात नहीं हुई थी.
कश्मीर की मुख्यधारा की पार्टियों ने विद्रोहियों के 'घावों पर मरहम लगाने' और उनसे 'मेलजोल बढ़ाने' के नाम पर उन्हें जेलों से रिहा किया था और मारे गए चरमपंथियों के जनाज़े में शामिल होने की उन्हें इजाज़त दी थी.

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वानी का जनाज़ा इस कड़ी में अब तक का अंतिम और सबसे ज़्यादा उन्माद बढ़ाने वाला था.
वानी की मौत के कुछ दिन पहले ही कश्मीर सरकार ने पत्थरबाजी करने वाले 600 से अधिक लोगों को माफ़ करते हुए जेलों से रिहा कर दिया था. ऐसा उनके बीच 'विश्वास बढाने' के तहत किया गया था. ऐसा उस समय किया गया, जब लोग सुरक्षा बलों पर पत्थर फेंक रहे थे.
इसके अलावा, बीते दो सालों से सुरक्षा बलों के साथ मुठभेड़ में मारे गए पाकिस्तानी चरमपंथियों की लाशें भी अंत्येष्टि के लिए स्थानीय मस्जिदों को सौंपी जाने लगी थीं. इनके जनाज़े में स्थानीय लोग हज़ारों की तादाद में भाग लेते थे.

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इसके लिए सिर्फ़ जम्मू कश्मीर सरकार को ही दोष नहीं दिया जा सकता. बीती जुलाई में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की भाजपा के नेतृत्व वाली महाराष्ट्र सरकार ने याक़ूब मेमन की सार्वजनिक अंत्येष्टि की इजाज़त दी थी.
याक़ूब को 1993 में मुंबई में सिलसिलेवार बम धमाकों में उनकी भूमिका के लिए फांसी दी गई थी. उन धमाकों में 257 लोग मारे गए थे और 1,400 से अधिक ज़ख़्म़ी हो गए थे.
इस तरह की सार्वजनिक अंत्येष्टि से अलगाववादियों के दो मक़सद पूरे होते हैं.
एक तो उन्हें विघटनकारी भावनाओं को भड़काने में मदद मिलती है.

दूसरे, इससे उनके समर्थकों की नज़र में 'मारे गए चरमपंथियों के चारों तरफ़ शहादत का प्रभामंडल' सा बन जाता है. स्कूल की पढ़ाई बीच में छोड़ चुके और गर्व करने लायक कुछ कर गुजरने की मंशा रखने वाले लोगों को चरमपंथी संगठनों में भर्ती करने में इससे सहूलियत होती है.
कश्मीर की मुख्य धारा के दोनों राजनीतिक दलों ने इसे रोकने के कोई प्रयास नहीं किए हैं.
हालांकि वे भारत और इसके धर्मनिरपेक्ष लोकतंत्र के प्रति आस्था जताते हैं, पर उनकी राजनीति कुछ और ही है.

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वे अटॉनोमी, पड़ोसी पाकिस्तान के साथ खुली सीमा और उसके साथ साझी सार्वभौमिकता की बात करते हैं. वे शरिया के मुताबिक़ चलने वाली बैंकिंग प्रणाली की बात करते हैं. ये दल सुप्रीम कोर्ट, केंद्रीय ऑडिटरों और चुनाव आयोग की भूमिका कम करने की मांग भी करते रहते हैं.
इन राजनीतिक दलों ने कश्मीर छोड़ने को मजबूर हुए लाखों हिंदुओं को न्याय दिलाने के मुद्दे पर सिर्फ़ जुबानी जमाखर्च ही किया है.
जब इन विस्थापितों की वापसी और घाटी में उनके पुनर्वास का मुद्दा उठता है, ये पार्टियां बिल्कुल वैसा ही करती हैं जैसा अलगाववादी करते हैं.
कश्मीर में सक्रिय चरमपंथी गुट और कथित तौर पर पाकिस्तान में उन्हें शह देने वाले लोगों का मानना है कि कश्मीर में जिहाद के दो चेहरे हैं.

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एक तो हथियारबंद विद्रोही हैं, जिन्हें सीमा पार के चरमपंथी गुटों से सीधी मदद और दिशा निर्देश मिलते हैं. छोटी छोटी स्वतंत्र इकाइयों के रूप में ये कश्मीर घाटी में फैले हुए हैं, उन्हें नियंत्रित करने और उन पर लगाम रखने की पूरी संरचना पाकिस्तान में है.
इसके अलावा अलगाववादी नेताओं का संगठन हुर्रियत कांफ़्रेंस है. यह तमाम अलगाववादी गुटों को मिलाकर बनाया गया शीर्ष राजनीतिक संगठन है. यह इन विद्रोहियों को एक तरह की बौद्धिक वैधता देता है. यह विद्रोहियों की स्थिति और अलगाववाद को उचित ठहराने के लिए जोड़ तोड़ करता रहता है.

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घाटी की 'मुख्यधारा' की कथित पार्टियां जाने अनजाने इसमें मदद करती हैं. ये पार्टियां चुनाव लड़ती हैं, भारतीय संविधान के तहत काम करने की शपथ लेती हैं, पर देखा गया है कि वे अलगाववादियों के साथ ताल मेल बिठा कर काम करती हैं.
इसके अलावा एक बहुत ही छोटा सा अभिजात्य वर्ग भी है. इसमें राजनेता, पत्रकार, वकील, नौकरशाह, थिंक टैंक और बुद्धिजीवी हैं. इलाक़े के संकट पर भारतीय स्टेट किस तरह प्रतिक्रिया देता है, यह तय करने में इस वर्ग की ख़ासी पकड़ है.

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विवाद को सुलझाने के लिए जो कुछ भी किया जा सकता है, किया गया है. इसमें संविधान की 'संरचनात्मक' व्याख्या करने और यहां तक कि उसमें संशोधन करने के प्रस्ताव भी शामिल हैं. कई बार तो यह भारत से अलग होने को जायज़ ठहराने जैसा हो जाता है. पर कोई उपाय कारगर साबित नहीं हुआ है.
इस बीच, कश्मीर में अलगाववाद एक फ़ायदेमंद अर्थव्यवस्था बन चुकी है और इसमें बहुत से निहित स्वार्थ जुड़ गए हैं. और भारत भुगत रहा है.
(सुशील पंडित कश्मीरी हिंदू हैं और दिल्ली में रहते हैं. ये लेखक के निजी विचाह हैं.)
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