'ज़मीन के कागज पर तो फसल नहीं हो सकती ना'

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    • Author, प्रशांत दयाल
    • पदनाम, अहमदाबाद से, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए

15 अगस्त को गुजरात के वेरावल ज़िले के उना में दलित महापंचायत में दलितों ने मांग की थी कि अगर एक महीने के अंदर मरे हुए पशुओं की खाल निकालने का काम करने वाले दलितों को पांच-पांच एकड़ ज़मीन नहीं दी गई तो देश भर के दलित 'रेल रोको' आंदोलन करेंगे.

दूसरी तरफ गुजरात सरकार दावा करती रही है कि कई सालों से भूमिहीन रहे दलितों को सरकार ज़मीन मुहैया करा रही है.

यह सही है कि गुजरात सरकार दलितों को ज़मीन तो देती है लेकिन ज़मीन मालिक होने के दस्तावेज मिलने के बावजूद सालों से ज़मीन पर गांव के बदमाशों ने कब्ज़ा कर रखा है यानी दलितों को सिर्फ़ कागज मिले, ज़मीन नहीं.

गुजरात के युवा दलित नेता जिग्नेश मेवाणी ने बीबीसी से बात करते हुए कहा, ''हम कई वर्षों से सरकार के पास जा रहे हैं और मांग कर रहे हैं कि अब गुजरात के दलित मरे हुए जानवर की खाल निकालने का काम और गटर में उतरकर सफाई नहीं करना चाहते. दलितों को वैकल्पिक तौर पर नया काम और ज़मीन दो. तब सरकार हमें आंकड़ें दिखाकर कहती है कि वो वर्षों से दलितों को ज़मीन देती आई है.''

सरकार के दावे के मुताबिक़ जिन दलितों को ज़मीन दी गई है, उनसे मैंने बात की तो पता चला कि सरकार का दावा अपनी जगह पर सही है लेकिन सिर्फ़ ज़मीन के कागज उन्हें दिए गए हैं. वास्तव में तो ज़मीन पर गांव के ज़मींदारों या बादमाशों का कब्ज़ा है.

गुजरात के मेहसाणा ज़िले के वणागला गांव के विष्णुभाई सोलंकी ने बताया कि उन्हें ज़िला अधिकारी की तरफ वर्ष 2007 से बताया गया था कि सरकार ने उन्हें साढ़े चार एकड़ ज़मीन दी है और उन्होंने हमें कागजात भी दिए थे. लेकिन जब हमें ज़मीन मिली तब उस पर गांव के ऊंची जाति के लोगों का कब्ज़ा था. हमने इस बारे में सरकार को बार-बार बताया लेकिन इसका कोई परिणाम नहीं निकला.

ऐसी ही स्थिति अहमदाबाद ज़िले के दिनेश मकवाणा की है.

मकवाणा ने बीबीसी को बताया, ''साल 2005 में लैंड कमीशन ने मेरे परिवार को 11 एकड़ ज़मीन दी थी लेकिन उस पर किसी ने अवैध कब्ज़ा कर रखा था. इस बारे में हमने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई. जब हम पुलिस के पास गए तो गांव वालों ने हमें धमकाया कि अगर ज़मीन के मामले में पुलिस के पास गए तो गांव छोड़ना होगा.''

अहमदाबाद के पुलिस अधीक्षक निर्लिप्त राय से जब इस केस के मामले में संपर्क किया गया तो उन्होंने इस बात पर सहमति जताई कि सरकार की ओर से दी गई ज़मीन पर किसी और का अवैध रूप से कब्ज़ा है.

निर्लिप्त राय ने दिनेश मकवाणा की ओर से की गई शिकायत के बारे में भी बताया कि मकवाणा की शिकायत के आधार पर पुलिस ने ग़ैर-कानूनी रूप से ज़मीन पर कब्ज़ा करने वालों पर कारवाई की है और यह मामला अदालत में विचाराधीन है.

ढोलका तहसील के चरोडा गांव में रहने वाले रमन महेरिया ने बताया, ''हम ज़मीन मालिक होने के बावजूद दूसरों के खेतों में मजदूरी करने जाते हैं. सरकार ने साल 2006 में हमारी तहसील के 350 भूमिहीनों को ज़मीन दी थी. सरकारी दस्तावेज़ों के मुताबिक़ हम उन ज़मीनों के मालिक हैं लेकिन सरकार हमें हाथोंहाथ ज़मीन पर कब्ज़ा भी दिलवा देती, तो ही ज़मीन हमें मिल पाती. अब ज़मीन के कागज पर तो फसल नहीं हो सकती ना.''

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