'दलित देखते रहे और सांसद ग़ायब रहे'

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- Author, सलमान रावी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
गुरुवार की बात है, दोपहर के भोजन अवकाश के बाद लोक सभा की कार्यवाही दोबारा शुरू हुई. पूरे देश की निगाहें संसद के निचले सदन पर टिकी हुईं थीं क्योंकि लोक सभा में दलितों पर हो रहे हमलों पर चर्चा होनी थी.
प्रधानमंत्री के हाल के बयान के बाद लोगों में और भी उत्सुकता थी. प्रधानमंत्री हालिया हमलों पर सदन के बाहर बोल रहे थे. मगर सदन की कार्यवाही शुरू होते ही निराशा फैल गयी.
लोक सभा का कोरम पूरा नहीं हो पाया और सदन की घंटी बजने लगी. कार्यवाही हो, इसके लिए ज़रूरी कोरम के अनुसार 15 प्रतिशत सांसदों की मौजूदगी अनिवार्य है.
मगर संख्या कम होने की वजह से बहस शुरू नहीं हो पा रही थी.

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यह हाल सिर्फ सत्ता पक्ष का नहीं था. विपक्ष की बेंचें भी खाली थीं. ना तो कांग्रेस के सदन में नेता मल्लिकार्जुन खड़गे मौजूद थे और ना ही राहुल गांधी.
बाद में ज्योतिरादित्य सिंधिया ने सफाई देते हुए कहा कि कांग्रेस नेता खड़गे को किसी ज़रूरी काम से बेंगलुरु जाना पड़ा, जबकि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की तबीयत खराब चल रही है.
चर्चा शुरू होने से पहले सदन में सिर्फ 70 सांसद मौजूद थे जिसमें विपक्ष के 38 सदस्य शामिल थे.

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चर्चा के दौरान बोलते हुए गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने चुनौती देते हुए कहा कि उनकी सरकार के कार्यकाल के दौरान दलितों पर हमलों की घटनाओं में कमी आई है.
उनका कहना था कि जहां साल 2013 में दलितों पर हमलों के 39,346 मामले दर्ज किए गए, वहीं 2014 में इसकी संख्या 40,300 थी जबकि साल 2015 में कुल 38,564 मामले दर्ज किए गए.
लोक सभा में एक पल ऐसा भी आया जब वित्त राज्य मंत्री अर्जुन राम मेघवाल को बोलना था मगर वो सदन में मौजूद नहीं थे.
लोक सभा की चर्चा पर नज़र रख रहे लोगों को थोड़ी निराशा ज़रूर हुई.
कुछ दलित चिंतकों को लगता है कि जिस तरह विपक्ष और सत्ता पक्ष के लोग सदन में दलितों पर हो रहे हमले जैसे मुद्दे पर ग़ैर ज़िम्मेदाराना रवैया लेकर गए थे, वो बहुत निराशाजनक था.
समाज शास्त्री प्रोफेसर बद्री नारायण का कहना है कि सांसदों के बर्ताव से एक बार तो ऐसा लगने लगा जैसे कि उन्हें ही संसद पर विश्वास नहीं रह गया है.

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प्रोफेसर बद्री नारायण को लगता है कि देश में एक 'नए वर्ग' का जन्म हुआ है जिसमें संपन्न दलित भी शामिल हैं जिन्हें दलितों के मुद्दों में कोई रुचि नहीं है.
वहीं एक अन्य दलित चिंतक प्रोफेसर लोखांडे मानते हैं कि दलित वोट बैंक तक ही सीमित हैं, चाहे कोई भी राजनीतिक दल क्यों ना हों.

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वो कहते हैं, "वो तो भला हो संविधान बनाने वालों का जिन्होंने लोक सभा और विधानसभा की सीटें ओबीसी, अनुसूचित जाति और जनजाति के लोगों के लिए आरक्षित कीं. वरना उनका प्रतिनिधित्व नहीं के बराबर ही रहता. दलित देखते रहे और सांसद ग़ायब रहे."
मगर इस चर्चा के दौरान तेलुगु देसम पार्टी के रविंद्र बाबू पांडूला ने सबको खामोश कर दिया जब उन्होंने सदन में पूछा, "क्यों दलितों की लड़ाई सिर्फ दलितों को ही लड़नी पड़ रही है."
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