मोदी की दलितों से हमदर्दी, मुसलमानों पर चुप्पी

- Author, राजेश जोशी
- पदनाम, बीबीसी रेडियो संपादक
अगर किसी देश के प्रधानमंत्री को तैश में आकर कहना पड़े कि “गोली मारनी है तो मुझे मारिए”, तो समझ लिया जाना चाहिए कि उसे अपनी राजनीतिक ज़मीन पर फैली फिसलन साफ़ नज़र आने लगी है.
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को दो दिन में दो बार कथित गौ रक्षकों को कड़ी लताड़ लगाते हुए उनके ख़िलाफ़ क़ानूनी कार्रवाई की बात करनी पड़ी क्योंकि उन्हें समझ में आ गया है कि अगर इस गोबर पर एक बार उनका पैर फिसला तो संभलना मुश्किल होगा.
दिलचस्प बात ये है कि ये राजनीतिक फिसलन उस गुजरात से उपजती और फैलती दिख रही है जिसे दशकों से ‘हिंदुत्व की प्रयोगशाला’ कहा जाता रहा है और जहाँ नरेंद्रभाई मोदी ने पंद्रह बरस तक एकछत्र राज करके ‘हिंदू हृदय सम्राट’ का तमग़ा हासिल किया.
आख़िर क्यों उन्हें गोरक्षकों को सीधे संबोधित करते हुए कहना पड़ा, “अगर वार करना है तो मुझ पर कीजिए, मेरे दलित भाइयों पर वार करना बंद कर दीजिए. गोली चलानी है तो मुझ पर चलाइए मेरे दलित भाइयों पर मत चलाइए”?

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मोदी ही नहीं बल्कि भारतीय जनता पार्टी की मातृसंस्था राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को भी गाय की रक्षा करने वालों के ख़िलाफ़ आधिकारिक बयान जारी करना पड़ गया.
क्या कुछ महीने पहले ये कल्पना की जा सकती थी कि गाय को राष्ट्रीयता और हिंदू अस्मिता से जोड़कर ‘राष्ट्रवादी बनाम राष्ट्रद्रोही’ के राजनीतिक विमर्श में बदलने वाला आरएसएस कथित गौरक्षकों के ख़िलाफ़ बोलेगा?
ये दलित एकजुटता की सफलता है.
उना से हैदराबाद तक दलितों में खदबदाते ग़ुस्से ने मोदी और आरएसएस के सरकार्यवाह भैयाजी जोशी को स्वयंभू गौरक्षकों के ख़िलाफ़ खुलेआम बोलने पर मजबूर कर दिया है.

आरएसएस और प्रधानमंत्री मोदी तब तक ख़ामोश रहे जब तक गोरक्षकों की सेना हिंदुत्व के खेत की सुरक्षा कर रही थी और मुसलमानों को गोहंता के तौर पर चिन्हित करके उन पर हमला कर रही थी.
लेकिन जब बाड़ ही खेत को खाने लगी तो संघ परिवार चौकन्ना हो गया क्योंकि हिंदुत्व के प्रतीकों की रक्षा करने की बजाए अब हथियारबंद गोरक्षक “विशाल हिंदू परिवार” को एकजुट करने के संघ परिवार के प्रोजेक्ट में ही पलीता लगाने लगे हैं.
वरना पिछले दो बरसों में उत्तर भारत के अनेक छोटे छोटे क़स्बों शहरों में डंडे, भाले, चाकू और लाठियाँ लिए गौरक्षकों के हाट-बाज़ार से लेकर हाईवेज़ पर मोटरसाइकल पर सवार होकर झुंड के झुंड निकलते रहे, ट्रक ड्राइवरों, उनके खलासियों, जानवरों के व्यापारियों को निर्ममता से पीटते रहे, और अक्सर पुलिस पीड़ितों के ख़िलाफ़ ही गोवंश हत्या का मुकदमा दायर करने में मुस्तैदी दिखाती रही.
जब तक गोरक्षकों के निशाने पर मुसलमान था तब तक न प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को ग़ुस्सा आया और न ही संघ में किसी तरह की बेचैनी महसूस की गई.

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28 सितंबर 2015 को दादरी में गोमांस रखने के शक में अख़लाक़ को पीट-पीट कर मार डाला गया तब संस्कृति मंत्री डाक्टर महेश शर्मा ने कहा, “इसे दुर्घटना माना जाए”.
झारखंड के झाबरा गाँव में 18 मार्च को 35 साल के मजलूम अंसारी और उनके साथ 12 साल के इम्तियाज़ ख़ान को पेड़ से फाँसी पर लटका दिया क्योंकि वो गाय-बैलों की ख़रीदारी करते थे. पर तब प्रधानमंत्री ने समाज के ताने बाने के टूटने की चिंता नहीं जताई.
पिछले साल अक्तूबर में जम्मू कश्मीर के ऊधमपुर में ट्रक क्लीनर ज़ाहिद हुसैन को गौरक्षा के नाम पर मार डाला गया, हिमाचल में नोमान को भीड़ ने पीट पीट कर मार डाला, पंजाब में ट्रक ड्राइवरों को पीटा गया, ट्रकों को आग के हवाले किया गया, राजस्थान और मध्य प्रदेश में बीफ़ रखने के शक में मुसलमान औरतों और मर्दों को पीटे जाने के वीडियो आते रहे.
दिल्ली के पास दो मुसलमान नौजवानों को गोबर खाने पर मजबूर किया गया लेकिन सत्ता प्रतिष्ठान में किसी ज़िम्मेदार आदमी ने वैसा ग़ुस्सा नहीं दिखाया जैसा आज प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी दिखा रहे हैं.

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रविवार को तेलंगाना में भी मोदी ने सिर्फ़ दलितों पर हुए हमलों पर “ग़ुस्सा” जताया. मोदी ने कहा, “जो लोग समाज के ताने-बाने को तोड़ने पर तुले हुए हैं, ऐसे मुट्ठी भर लोग गोरक्षा के नाम पर समाज में टकराव लाने की कोशिश कर रहे हैं.”
तेलंगाना में मोदी के भाषण में एक बार भी मुसलमानों पर पिछले दिनों हुए हमलों का ज़िक्र नहीं था, अलबत्ता दलितों को उन्होंने बार बार “मेरे दलित भाई” कह कर पुकारा. उन्होंने ये ज़रूर कहा कि हिंदुस्तान “अनेक सांप्रदायिक मान्यताओं से भरा देश है”.
दरअसल प्रधानमंत्री की चिंता संघ परिवार की उस चिंता का हिस्सा है जिसका मक़सद व्यापक हिंदू समाज को एकजुट करना है. इसमें दलित और दूसरी हिंदू जातियाँ तो शामिल हैं क्योंकि संघ परिवार हिंदू वोटरों का एक ऐसा भारी ब्लॉक तैयार करना चाहता है जिसकी ताक़त के आगे सब नतमस्तक हों लेकिन इस विज़न में मुसलमान नहीं हैं.

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राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अगर सिर्फ़ हिंदुओं की बात करता है तो वो समझ में आती है, लेकिन ख़ुद को सवा अरब भारतीयों का प्रधान सेवक कहने वाले प्रधानमंत्री की चिंता में अगर मुसलमान कहीं नहीं हैं तो इसे गंभीरता से लिया जाना चाहिए.
गोरक्षक और गोहंता के युद्ध में जब तक मुसलमानों पर गोहंता का बिल्ला लगाया गया तो ये बात संघ परिवार को रास आती रही. यही कारण है कि लोकसभा चुनाव प्रचार के दौरान ख़ुद नरेंद्र मोदी “पिंक रिवॉल्यूशन” और गाय पालने और गाय मारने वाले के बीच फ़र्क़ समझाते थे.
लेकिन जब गौरक्षकों की फ़ौज दलितों को भी गौहंता घोषित करके उन पर हमले करने लगी तब हिंदू समाज की भीतरी दरारें अचानक चौड़ी होकर उभर आईं.

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व्यापक हिंदू एकता को हासिल करने के लिए संघ परिवार की अलग अलग शाख़ाएँ अलग अलग तरह से काम करती हैं – इनमें एक ओर शिक्षा, सेवा, विकास के प्रकल्प चलाने वाले वनवासी कल्याण आश्रम और विद्या भारती जैसे संगठन हैं तो दूसरी ओर छुरे की शक्ल के त्रिशूल चलाने और बंदूक़बाज़ी की ट्रेनिंग देने वाला बजरंग दल भी है.
जहाँ विद्या भारती शिक्षा में हिंदू संस्कार देने की बात करता है तो बजरंग दल को हिंसक तरीक़ों से भी परहेज़ नहीं है पर दोनों तरीक़ों का अंतिम उद्देश्य एक ही है— हिंदुओं का दबदबा कायम करना.

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पर सवाल ये है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सरकार बनते ही अचानक इन गौरक्षकों के हौसले कैसे इतने बुलंद हो गए? कैसे उनके दिलों से क़ानून का ख़ौफ़ ख़त्म हो गया? किसने उन्हें हिंदू समाज और गौमाता का संरक्षक नियुक्त कर दिया? और सबसे महत्वपूर्ण सवाल ये है कि नरेंद्र मोदी और भैयाजी जोशी की झिड़की के बावजूद क्या “गौरक्षक” और उसके संरक्षक उस ताक़त को यूँ ही तिरोहित होने देंगे?
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ग़ुस्से और उनकी चिंता की गंभीरता तभी साबित होगी जब उन्हीं के शब्दों में “समाज को तहस-नहस करने वाले” गौरक्षकों पर उत्तर प्रदेश के विधानसभा चुनावों के बाद भी लगाम कसी रख पाएँगे वरना ये चिंता भी एक चुनावी जुमला बनकर रह जाएगी.
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