दलितों के बढ़ते उत्पीड़न पर बिहार सुस्त

इमेज स्रोत, Manto Pandey
- Author, मनीष शांडिल्य
- पदनाम, पटना से, बीबीसी हिन्दी के लिए
‘‘हमलोगों का सपना धीरे-धीरे चूर होता जा रहा है. हम अब आगे पढ़ नहीं पाएंगे. बढ़ नहीं पाएंगे. इंजीनियरिंग, मेडिकल जैसे उच्च शिक्षण संस्थानों में नहीं जा पाएंगे.’’
ये चिंता दलित छात्र अजय कुमार की है. अजय पटना के महेंद्रू स्थित अंबेडकर कल्याण छात्रावास में रहते हैं. वहीं रहने वाले राम बाबू कुमार अपनी नाराजगी इन शब्दों में बयान करते हैं, ‘‘दलित आज जहां हैं उससे और नीचे गिराने का काम सरकार कर रही है.’’
ये चिंता, ये नाराजगी जून में बिहार सरकार के वज़ीफे संबंधी नीति में बदलाव के कारण सामने आ रही है. सरकार ने उच्च शैक्षणिक संस्थानों में पढ़ाई के लिए एससी/एसटी वर्ग के छात्रों को मिलने वाले वज़ीफे को घटा कर अधिकतम पंद्रह हजार कर दिया है.
दरअसल करीब आठ महीने पुरानी नीतीश सरकार ने अपनी नई पारी में ऐसे कुछ फ़ैसले लिए हैं जिससे दलित समुदाय का अलग-अलग हिस्सा सरकार पर अपनी उपेक्षा का आरोप लगा रहा है. विपक्ष भी इन्हें मुद्दा बनाकर सरकार पर हमला करती रहती है.
इनमें सबसे ताजा उदाहरण हाई कोर्ट के विधि पदाधिकारियों की नियुक्ति का है. सरकार ने 20 जुलाई को 82 पदाधिकारियों की सूची जारी की जिसमें किसी दलित को जगह नहीं मिली है.
राजेंद्र नट एससी/एसटी अधिवक्ता जन कल्याण समिति के प्रधान महासचिव हैं.

इमेज स्रोत, Sanjay Kumar
इस उपेक्षा पर वो कहते हैं, ‘‘पुरानी सरकारों ने हमेशा विधि पदाधिकारियों के रुप में दलितों की भी नियुक्ति की. लेकिन सामाजिक न्याय की सरकार होने का दावा करने वाली महागठबंधन सरकार ने दलितों के साथ अन्याय किया है.’’
राजेंद्र के मुताबिक इससे दलित अधिवक्ताओं में काफी आक्रोष है. वे सवाल कर रहे हैं कि क्या दलितों ने महागठबंधन को वोट नहीं दिया था?
वहीं बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री जीतनराम मांझी के मुताबिक इस नियुक्ति में किसी भी दलित को शामिल नहीं किया जाना समझ से परे है. वो कहते हैं, ‘‘यह दलित समाज के प्रति बड़ा अन्याय है. ऐसी नियुक्तियों में भी आरक्षण कोटा सुनिश्चित किया जाना चाहिए.’’
इसे पहले जून में जब राज्य सभा की पांच और विधान परषिद की सात सीटों के लिए चुनाव हुए थे तब भी सत्तारुढ़ गठबंधन द्वारा किसी दलित को उम्मीदवार नहीं बनाया गया.
हालांकि तब विपक्ष या कहें कि भारतीय जनता पार्टी ने भी ऐसा ही किया था. लेकिन चूंकि महागठबंधन के पास ज़्यादा उम्मीदवारों को इन सदनों में पहुंचाने की ताक़त थी तो ऐसे में दलित उपेक्षा की आलोचना भी ज्यादा उसके ही हिस्से आई.

इमेज स्रोत, Sanjay Kumar
हालांकि बिहार सरकार के पूर्व मंत्री और जदयू के राष्ट्रीय महासचिव श्याम रजक इन आरोपों से इंकार करते हैं कि नई सरकार दलितों को उचित प्रतिनिधित्व नहीं दे रही है.
वे कहते हैं, ‘‘विधि पदाधिकारियों के अगली सूची में दलितों को भी जगह दी जाएगी. साथ ही दो साल बाद जब इन उच्च सदनों के चुनाव होंगे तब उन्हें भी उचित प्रतिनिधित्व मिलेगा.’’
वहीं छात्रवृति मुद्दे पर श्याम रजक का कहना है कि सरकारी संस्थाओं में पढ़ने वाले छात्रों को अब भी हम पूरी मदद कर रहे हैं. केवल निजी संस्थानों में दाखिला लेने वाले छात्रों के लिए नए मापदंड तय किए गए हैं.
नुमाइंदगी और छात्रवृति के मुद्दे से इतर प्रोन्नति में आरक्षण पर रोक मामले में भी सरकार निशाने पर है. लगभग दो साल की कानूनी लड़ाई के बाद इस साल पटना हाईकोर्ट की डबल बेंच ने राज्य सरकार की नौकरियों में प्रोन्नति में आरक्षण पर रोक लगा दिया.
विपक्ष और कर्मचारी संगठनों का आरोप है कि ऐसा इस कारण हुआ क्यूंकि सरकार ने हाईकोर्ट में मज़बूती से अपना पक्ष नहीं रखा.
जैसा कि जीतन राम मांझी का आरोप है, ‘‘बहुत से राज्यों में प्रोन्नति में आरक्षण है. लेकिन बिहार सरकार के मन में इस मामले में कहीं-न-कहीं खोट है.’’
इस मामले में श्याम रजक का कहना है कि नीतीश सरकार ने इस मामले में पूरे तथ्यों और आंकड़ों के साथ अपनी बात हाई कोर्ट में रखी. और अब वह सुप्रीम कोर्ट में भी ऐसा ही करेगी.

इमेज स्रोत, biharpicture.com
लगे हाथ वे प्रोन्नति में आरक्षण देने की जिम्मेवारी केंद्र सरकार पर भी डालते हैं. रजक सवाल करते हैं, ‘‘इस संबंध में एक विधेयक राज्य सभा से पास होना बाक़ी है. जब केंद्र सरकार दूसरे कई विधेयकों को पारित कराने को अपनी प्रतिष्ठा का विषय बना रही है तो इस मामले में ऐसा क्यूं नहीं कर रही?’’
अभी भारत के अलग-अलग हिस्सों में हुई दलित उत्पीडन की कथित घटनाएं लगातार चर्चा में हैं. इस मोर्चे पर भी बिहार की स्थिति चिंताजनक है.
बीते एक महीने में दलितों को कथित रुप से पेशाब पिलाए जाने, दलित छात्रा के कथित गैंग रेप के बाद हत्या जैसी कुछ बड़ी घटनाएं बिहार में भी सामने आई हैं.
बिहार पुलिस के बीते पांच साल के आंकड़े भी यह बताते हैं कि इस दौरान दलित उत्पीड़न की घटनाएं तेजी से बढ़ी हैं. 2011 में जहां अनुसूचित जाति और जनजाति के खिलाफ अपराध के 3438 मामले दर्ज हुए थे वहीं 2013 में यह संख्या बढ़कर 6359 हो गई.
बीते दो वर्षों 2014 और 2015 के दौरान भी ऐसे अपराधों की संख्या छह हजार से अधिक ही दर्ज की गई है.
दलित चिंतक रमाशंकर आर्य पटना यूनिवर्सिटी में सीनियर प्रोफेसर हैं. वे दलितों की उपेक्षा और उत्पीड़न की वजह बताते हुए कहते हैं, ‘‘लगभग सभी पार्टियों का नेतृत्व दलित समाज से ऐसे लोगों को प्रतिनिधित्व का मौका दे रहा है जो उनके ‘यस मैन’ हों. दलित अधिकारों के प्रति सजग रहने और समझ रखने वालों को किनारे रखा जा रहा है.’’

इमेज स्रोत, Amat Azad
रमाशंकर आर्य के मुताबिक ऐसे में दलितों को पूरा राजनीतिक अधिकार और संवैधानिक हक नहीं मिल पा रहा. ऐसा लंबे समय से चल रहा है.
हालांकि इसके खिलाफ दलित सड़कों पर भी उतरने की तैयारी में हैं. छात्रवृति के सवाल पर इंडियन स्टुडेंट्स वेलफ़ेयर एसोसियेशन ने जहां तीन अगस्त को विधानसभा मार्च आयोजित किया है तो वहीं अधिवक्ता जन कल्याण समिति भी राजभवन मार्च की योजना बना रहा है.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप <link type="page"><caption> यहां क्लिक</caption><url href="https://play.google.com/store/apps/details?id=uk.co.bbc.hindi" platform="highweb"/></link> कर सकते हैं. आप हमें <link type="page"><caption> फ़ेसबुक</caption><url href="https://www.facebook.com/bbchindi" platform="highweb"/></link> और <link type="page"><caption> ट्विटर</caption><url href="https://twitter.com/BBCHindi" platform="highweb"/></link> पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)












