कश्मीर: 'कर्फ़्यू से घरों में दुबकने को मज़बूर हैं बच्चे'

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- Author, निदा नवाज़
- पदनाम, लेखक और पत्रकार, श्रीनगर से बीबीसी हिंदी के लिए
इंसान बुरे दिनों को अच्छे दिनों की यादों के सहारे जीता है. मैं भी आज सवेरे जब दिलो दिमाग में ज़हर घोलते कश्मीर घाटी के वर्तमान पर सोच रहा था तो अच्छे दिनों को भी याद करने लगा.
डर और अनिश्चिता की लपेट में आई मेरी कश्मीर घाटी की इन सड़कों पर सवेरे-सवेरे कितनी रौनक होती थी. नन्हे मुन्हे बच्चे अपनी छोटी छोटी गोल गोल आँखों में आकाश को छूने के बड़े बड़े सपने लिए स्कूलों की और निकलते थे.
उनके टिफिन में उनकी माँएं खाने के साथ साथ भविष्य के लिए ढेर सारी उम्मीदें भी रखती थीं. सुबह 8 बजे और 9 बजे के बीच मेरे शहर के मर्कज़ी चौक पर अपनी अपनी स्कूली गाड़ियों के इन्तज़ार में ये बच्चे ऐसा दृश्य पैदा कर देते थे जैसे विभिन्न रंगों की तितिलियों का पर्व लगा हो.
फिर अचानक जैसे किसी ज़िद्दी शरीर बड़े ने बच्चों की इस सुंदर पेंटिंग पर सियाही उड़ेल दी हो. स्कूल बन्द हुए, कालेज बन्द हुए, यूनिवर्सिटियां और अन्य सभी प्रोफेशनल इंस्टीट्यूशंस बन्द हुए और हड़तालों और कर्फ़्यू ने वह कोहराम मचा दिया कि ये बच्चे, हमारे उज्जवल भविष्य की यह बुनियादी उम्मीदें, घरों में दुबकने पर मजबूर हो गए. गली कूचों में बिखरने पर मजबूर हुए.

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मुझे परसों शहर की अंदरुनी गलियों में टहलने का अवसर मिला. कर्फ़्यू में आजकल जिस तरह चौराहों और सड़कों पर सुरक्षाकर्मियों और कंटीली तारों का क़ब्ज़ा होता है उसी तरह शहर की अंदरुनी उबड़-खाबड़ गलियों पर मुहल्ले के युवाओं और छोटे छोटे बच्चों का क़ब्ज़ा रहता है.
मैंने शहर भर की अंदरुनी तंग और बारीक गलियों में छोटे छोटे बच्चों की टोलियां देखीं. कुछ बच्चों ने सड़कों के बीच पत्थर रखकर जैसे चेक पोस्टस बना दिए हैं. वे हर आने जाने वालों को रोकते हैं और पूछताछ करते हैं. मुझे भी एक ऐसे ही चेक पोस्ट पर रोका गया.
एक छोटा बच्चा मेरे सामने खड़ा होकर अपनी तोतली जुबान में पूछने लगा, “हे टुम कहाँ जा रहे हो, टुम्हें नहीं मालूम कि हड़ताल की काल दी गई है.”

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मैं उत्तर देने ही वाला था कि एक बड़े से पत्थर पर लगभग सात आठ वर्ष का एक और बच्चा मुझे बुलाने लगा, “हे यहाँ आओ. हम जाने नहीं देंगे, तुम देख नहीं रहे हो हमने सड़क बंद कर दी है. अभी एक गाड़ी वाला आया था उसको हमने सबक सिखाया है, यह देखो यह शीशों की किर्चियाँ उसी की गाड़ी की हैं. दूर एक दूकान के छज्जे पर बैठे चंद लोग उनका मनोबल बढ़ा रहे थे.”
मैं सोच रहा हूँ कि हमारे जिन नन्हे मुन्हे बच्चों को इस समय स्कूल की कक्षाओं में होना चाहिए था, जिन युवाओं को कॉलजों, यूनिवर्सिटियों, कारखानों और दफ़्तरों में होना चाहिए था, उन्हें कौन इस्तेमाल कर रहा है, उनके सुनहरे सपने हड़तालों, पत्थरबाज़ियों, कर्फ़्यू, पैलट गनों और इस शहर पर बिछी रेज़र वायर में रक्तरंजित क्यों हो रहे हैं?
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