कश्मीर, कर्फ़्यू और बूढ़ी खदीजा का बेटा बशीर

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    • Author, निदा नवाज़
    • पदनाम, लेखक और पत्रकार, श्रीनगर से बीबीसी हिंदी के लिए

कश्मीर घाटी की कल्पना करते ही सफ़ेद बर्फ़ीली टोपियां पहने पहाड़, आकाश से बातें करते देवदार के पेड़, दूधिया पानी की तरंगों पर मचलते झरने और घास से हरे-भरे विशाल मैदान आँखों के सामने आने लगते हैं.

डल झील के पानी पर थिरकते हाउस बोटों और कश्तियों से नए नवेले जोड़ों की सरगोशियाँ जैसे कानों में रस घोलने लगती हैं. लेकिन यह केवल काल्पनिक उड़ानें हैं और आजकल की कश्मीर घाटी के यथार्थ से कोसों दूर है.

कश्मीर घाटी पिछले लगभग पांच हफ्तों से कर्फ़्यू की काली ख़ामोश चादर में लिपटी हुई है.

कर्फ़्यू की इस डरावनी चादर में लिपटी हैं उन हज़ारों मज़दूरों, कामगारों, रेहड़ीवालों, क़ालीन बाफों, नमदा साज़ों, सफ़ाई कर्मचारियों आदि की सहमी सिसकियाँ और लरज़ती आहें भी, जो दिन को मज़दूरी करके ही अपने परिवारों के लिए रात के खाने का प्रबंध किया करते हैं.

मुझे आज सवेरे अपने कर्फ़्यू से ग्रस्त शहर के बीच बसेरा करने वाले एक परिवार से मिलने का मौका मिला. सड़कों और चौराहों पर सुरक्षाकर्मी तैनात हैं और वहां कोई परिंदा भी पर नहीं मार सकता है.

लेकिन शहर के अंदरूनी गली-कूचों से कुछ लोग जान हथेली पर लेकर एक जगह से दूसरी जगह जा रहे हैं. मैं पिछले कुछ दिनों से बशीर अहमद के परिवार को लेकर कुछ ज़्यादा ही चिंतित था.

बशीर अहमद मज़दूरी करके अपने परिवार को पालते हैं. जब भी हमारे घर पर कोई काम होता है हम बशीर अहमद को ही बुलाते हैं.

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शैतान की आंत की तरह टेढ़ी-मेढ़ी गलियों से गुज़र कर मैं लगभग आधा घंटा चलने के बाद बशीर अहमद के घर पहुंच ही गया.

इन तंग और अंधेरी गलियों में दिन होते हुए भी रात की सी डरावनी ख़ामोशी छाई रहती है. दो कमरों का एक छोटा सा कच्ची ईंटों का घर जिसका छत कोलतार के ज़ंग लगे कनस्तरों को काट कर बनाया गया है.

बशीर के घर के अंदर प्रवेश करके मेरे सामने एक दर्दनाक दृश्य था. कमरे के एक कोने में मैले कचीले बिस्तर पर लेटी बशीर की बूढी माँ ख़दीजा बीबी. बूढ़ी खदीजा पिछले पांच वर्षों से टीबी की मरीज़ हैं. पिछले बीस दिनों से उसके पास दवाई नहीं है.

दवाई की दुकानें कर्फ़्यू की वजह से बंद पड़ी हैं. अब कहीं से अगर दवाइयों का प्रबंध हो भी जाता तो बशीर के पास पैसे नहीं हैं. कर्फ़्यू की वजह से उन्हें कोई काम नहीं मिल पा रहा है.

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बशीर की छोटी बेटी एनीमिक पेशेंट है. पूरा परिवार बूढ़ी खदीजा बीबी के इर्द-गिर्द सिमट गया है. यह परिवार भी न जाने कितने परिवारों की ही तरह पिछले लगभग एक महीने से केवल एक ही वक़्त का ख़ाना खाकर बसेरा करता है.

इस घर में पिछले लगभग 20 दिनों से एक प्याली चाय का इंतज़ाम तक नहीं हो सका है. बूढ़ी खदीजा बीबी की मुसलसल खांसी और कराहने की आवाज़ों के बीच मैं सोचने लगता हूँ कि इसी तरह कश्मीर घाटी में कर्फ़्यू की काली चादर ओढ़े न जाने कितने परिवार बेबसी और भूख के आंसू बहाते होंगे.

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