तो क्या इरोम शर्मिला हार गईं?

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- Author, वंदना
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, मणिपुर के इंफ़ाल से
वो नौ अगस्त का दिन था. स्वतंत्रता दिवस के ठीक छह दिन पहले. उसी दिन इरोम शर्मिला को अपनी भूख हड़ताल तोड़नी थी. हर बार की तरह उन्हें सुबह कोर्ट लाया गया.
बाहर वीडियो कैमरे में उन्हें क़ैद करने का लालच छोड़ मैं अंदर कोर्टरूम में आकर बैठ गई.
पूरे समय मेरी नज़र इरोम पर थीं. स्लेटी रंग की मणिपुरी फेकन, पैरों में मामूली चप्पल, बड़े-बड़े नाखून जो वो अब काटती नहीं हैं..
धीमी आवाज़ में जज से बोली - "मैं आज़ाद होना चाहती हूँ. क्यों लोग मुझे आम इंसान की तरह नहीं देख सकते."
कोर्ट की कार्रवाई अपनी गति से चलती रही. इरोम की बेसब्री साफ़ झलक रही थी.

वो अपनी सीट से उठीं और बोली- क्या हम और तेज़ी से काम कर सकते हैं? दूसरे पक्ष के वकील ने कहा आप चाहें तो दूसरी तारीख़ ले सकती हैं.
पर 15 साल और 9 महीनों, 4 दिन की भूख हड़ताल के बाद अब वो और इंतज़ार करने के मू़ड में नहीं थी.
मुझे थोड़ी भूख सी लगने लगी तो एहसास हुआ कि दोपहर हो चुकी थी. तुरंत दिमाग़ में ख़्याल आया -भूख तो इरोम को भी लगती होगी.
भूख लगना और खाना खाना इतनी स्वाभाविक प्रक्रिया है कि इससे पहले मैंने खाने को इस नज़रिए से कभी देखा ही नहीं.

शायद कुछ दिन मुझे खाना खाते वक़्त हमेशा इरोम की बातें याद आएँगी. कुछ दिन इसलिए क्योंकि हमें चीज़ों को जल्द ही भूल जाने की आदत है.
सोचती हूँ क्या शर्मिला को भी यूँ ही भुला दिया जाएगा. इंफ़ाल में मीडियावालों का इतना जमावड़ा शायद इससे पहले कभी नहीं हुआ. सबने ख़बर की और फिर चले भी गए.
पर इरोम शर्मिला एक ख़बर भर से कहीं ज़्यादा है.

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अस्पताल के उनके कमरे में इरोम शर्मिला से मैंने पूछा था कि भूख हड़ताल तोड़ने के बाद अब वो कहाँ रहेंगी. इस सवाल के जवाब ने मुझे गहरे तक हिला दिया था.
इरोम का जवाब था, “सुना है कि कोई संस्था है जिसने मुझे पनाह देने का प्रस्ताव रखा है".
अफ़्स्पा क़ानून के ख़िलाफ़ जिसके साए तले पिछले 16 सालों में एक पूरे राज्य के लोगों ने शरण ले रखी थी, आज अपने सर पर एक छत के लिए पनाह की ज़रूरत है.
इरोम के इर्द-गिर्द जितनी परतों को मैं खोलती चली गई, वो गुत्थी मुझे उतनी ही उलझी हुई सी नज़र आती है.
एक हस्ती जिसने जीवन के 16 साल सिर्फ़ और सिर्फ़ एक क़ानून के नाम कर दिए..

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और फिर बिना वो मक़सद पूरा हुए उन्होंने हड़ताल तोड़ दी.
तो क्या ये इरोम की हार है? अगर नहीं तो क्या उस समाज ने इरोम को धोखा दिया है जिसके लिए इरोम लड़ रही थीं?
वो महिलाएँ जो ख़ुद को सेना की कथित ज़्यादती का शिकार मानती हैं, जो लड़ते-लड़ते ख़ुद बूढ़ी हो गई, जो कदम-कदम पर इरोम के साथ रहीं, जिन्हें इरोम ने अपने नए फ़ैसले के बारे में पहले से कुछ नहीं बताया- क्या उनका इरोम पर ग़ुस्सा जायज़ है ?
लेकिन 16 साल पहले हड़ताल पर जाने से पहले भी तो इरोम ने किसी ने इजाज़त नहीं ली थी.

क्या ये लोग इसलिए नाराज़ हैं कि इरोम ने भूख हड़ताल तोड़ दी? या इसलिए कि अब कोई ऐसा नहीं है जिसके कंधों पर उम्मीदों का बोझ डालकर लोग अपनी रोज़र्मरा की ज़िंदगी बिताते रहें ?
इरोम ने कोर्ट में बार-बार कहा था, "मुझे आज़ादी चाहिए, 16 सालों में मेरी ज़मीर को एक तरह से क़ैद करके रख लिया गया है." इरोम को ज़मानत तो मिल गई है पर क्या वो वाकई आज़ाद हो पाईं हैं?
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