वो गांव जहां से इरोम ने भूख हड़ताल शुरु की

    • Author, वंदना
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, मालोम, मणिपुर

मणिपुर की 64 साल की चंद्रजीनी के घर पर हर साल एक सरकारी चिट्ठी आती है ये पूछने के लिए वो चार साल का बच्चा जीवन में क्या कर रहा है जिसे 1988 में राजीव गांधी ने वीरता के लिए राष्ट्रीय पुरस्कार दिया था.

लेकिन चंद्रजीनी के पास इस सवाल का कोई जवाब नहीं, मालोम गाँव का वो चार साल का बच्चा सन् 2010 में दुनिया को अलविदा कह चुका है.

इमेज स्रोत, Ian Thomas Jansen Lonnquist

सन् 2010 में सेना पर आरोप लगा था कि उन्होंने यहाँ 10 लोगों को कथित तौर पर मार दिया था.

मणिपुर में राजधानी इंफ़ाल से 7-8 किलोमीटर की दूरी पर बसा है मालोम गाँव.

तंग, सकरी सड़कें, चारों तरफ़ हरियाली... दिखने में मामूली सा लगता मालोम गाँव. .लेकिन तभी तक जब तक आपकी नज़र वहाँ के बस स्टैंड पर नहीं पड़ती और बस स्टैंड के पास बने एक स्मारक पर.

स्मारक का नाम है 10 इनोसेंट्स मेमोरियल. स्थानीय लोगों ने इसे उन 10 लोगों की याद में बनाया है जो साल 2000 में मारे गए थे.

पेड़ के हरे पत्तों ने स्मारक पर लिखे शब्दों को ढक रखा है, पुरानी यादों की तरह.

लेकिन 16 साल पहले के उस दिन की यादें लोगों के ज़ेहन में आज भी ज़िंदा हैं. इसी घटना के बाद ही इरोम शर्मिला ने मालोम गाँव में अपनी भूख हड़ताल शुरु की थी.

वहां हमारी मुलाक़ात 64 साल की चंद्रजीनी से हुई जिन्होंने 2 नंवबर को दो बेटों और अपनी बड़ी बहन को गंवाया था.

उन्होंने बताया, "नंबवर 2, सन 2000 को दोपहर सवा तीन की बात होगी. बड़ा बेटा मेरी बहन को छोड़ने बस स्टैंड के लिए निकला तो 17 साल का छोटा बेटा ट्यूशन पढ़ने के लिए. अचानक बम फटने की आवाज़ आई, और फिर गोलीबारी की."

"चीख पुकार की आवाज़ें आ रही थीं. पूरा गाँव खाली करवा लिया गया. रात को अंधेरे में मैं थकी हारी सड़क पर ही बैठ गई तो मेरे पैरों में कुछ चिपक गया...किसी का जमा ख़ून था वो. सुबह पता चला दोनों बेटे मारे गए हैं. जब मैंने दिन में लोगों की चीखें सुनी थीं तो उनमें से एक चीख मेरे बेटे की भी रही होगी. 17 साल का वो बेटा भी जिसे बचपन में राजीव गांधी ने राष्ट्रीय वीरता पुरस्कार दिया था."

बताते बताते चंद्रजीनी का गला रुँध जाता है. लेकिन पुरानी यादों को चंद्रजीनी ने धुँधला नहीं होने दिया है.

बेटे की यादें पॉलिथन से ढकी एलबम में सेहजकर रखी हैं - टाई लगाए, गले में मेडल लटकाए स्कूल की यूनिफॉर्म में बेटा चंद्रमणि

चंद्रजीनी ने बेटे को वो फ़ोटो भी दिखाई उसमें उस वक्त वो चार-पाँच साल का था और राजीव गांधी के हाथों उसे राष्ट्रीय वीरता सम्मान मिला था.

इसी गाँव में आकर इरोम शर्मिला ने सशस्त्र सेना बल विशेषाधिकार क़ानून के खिलाफ़ लड़ाई छेड़ी थी.

हर साल जब इरोम शर्मिला 24 घंटों के लिए रिहा होती थी, तो चंद्रजीनी इंफ़ाल जाकर उनसे मिलती थी.

लेकिन अब इरोम शर्मिला अपनी भूख हड़ताल ख़त्म कर चुकी हैं.

इरोम ने भूख हड़ताल तोड़ने के साथ-साथ राजनीति में उतरने का फ़ैसला भी कर लिया है.उन्हें पिछले 15-20 साल से जानने वाले मानवाधिकार कार्यकर्ता बबलू कहते हैं कि इरोम पहले जैसी नहीं रही.

वो कहते हैं, "15 साल के अनशन में इरोम शर्मिला बहुत बदल गई हैं. जेल में उन्होंने बहुत पढ़ाई की -गीता, क़ुरान, बाइबल. पहले तो इरोम हम लोगों से सलाह लिया करती थीं. मुझे याद है 5 नंवबर 2000 का दिन जब बहुत कमज़ोर सी दिखने वाली इरोम साइकिल पर मेरे घर आई और कहा ब्रदर मैं आफ़्सपा के खिलाफ़ भूख हड़ताल करूगीं. लेकिन अब वो बहुत इंडिपेनडेंट हो गई हैं."

"भूख हड़ताल ख़त्म करने वाले फ़ैसले पर उन्होंने हमसे कुछ नहीं पूछा. लेकिन हम अपना रास्ता बदलने के उनके फ़ैसले का सम्मान करते हैं."

इरोम की मुख्य लड़ाई अफ़्सपा क़ानून के ख़िलाफ़ है और उनकी इस मांग में मणिपुर के लोग उनके साथ हैं.

इंफ़ाल की छात्रा गांगसंग शकीला कहती हैं, "हम भी भारत की ही प्रजा है, चंडीगढ़, दिल्ली की जैसे. हमारे साथ सौतेल बर्ताव क्यों? मैं चाहती हूँ कि अफ़्सपा मणिपुर से ही नहीं है बाकी पूरे देश से भी हटें."

अफ़्सपा पर लोगों को इरोम का साथ चाहिए लेकिन भूख हड़ताल के मुद्दे पर सब लोग अब भी इरोम के फ़ैसले को मानने के लिए तैयार नहीं दिखते.

इन विरोधी स्वरों के बीच चंद्रजीनी की बात मेरी कानों में गूँज रही है जिसने दो बेटे गंवाए हैं.

चंद्रजीनी ने मुझसे जाते जाते कहा, "ग़म में डूबी माँ होने के नाते मैं दो दिन भी भूखे नहीं रह सकी थी. इरोम 16 साल भूखी रह गई."

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