'16 सालों से नाक में नली शरीर के अंग जैसा'

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- Author, वंदना
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, इंफाल से
''16 सालों से मेरी नाक में लगी ये नली अब मुझे अपने शरीर का ही एक अंग लगने लगी है."
अस्पताल के वार्ड में इरोम शर्मिला की 16 साल की ज़िंदगी को शायद ये एक वाक्य पूरी तरह से बयां कर देता है.
और इन 16 सालों में इरोम के साथ जिसने सबसे ज़्यादा वक़्त बिताया शायद वो रहे अस्पताल के कर्मचारी.
आख़िर कैसी होगी एक ऐसे व्यक्ति की रोज़मर्रा की ज़िंदगी जिसे अस्पताल में रोज़ नाक में नली के रास्ते खाना दिया जाता है.
इंफ़ाल के जवाहर लाल नेहरू इंस्टीट्यूट ऑफ़ मेडिकल साइंसिस अस्पताल के एक कर्मचारी ने नाम न बताने की शर्त पर बीबीसी को इरोम की दिनचर्या और दवाई के बारे में बताया.
उन्होंने बताया, "पहले कई साल तक तो इरोम को दिन में तीन बार फ़ीड दी जाती थी- सुबह दस बजे, दोपहर 12.30 बजे, शाम को 9.30 बजे.
लेकिन बाद के सालों में इरोम ने तीन फ़ीड लेने से भी मना कर दिया.''

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वो केवल दोपहर को 12.30 बजे और शाम को 9.30 बजे ही फ़ीड लेने लगीं. रविवार को केवल एक बार ही फ़ीड लेती है.
आख़िर उन्हें नाक के ज़रिए क्या-क्या खिलाया जाता रहा है ?
अस्पताल कर्मचारी ने बताया, "सुबह सेरेलेक नुमा पदार्थ के 20 स्कूप 1000 मिलीलिटर पानी में मिलाकर दिए जाते हैं, इसमें आयरन के सिरप, पाचन के लिए दवाई और फल का स्वाद देने के लिए ऐपी मिलाया जाता है."
जबकि रविवार को इरोम केवल शाम को 6.30 बजे नाक से फ़ीड लेती रही हैं और साथ में आठ बजे कैल्शियम सिरप.
नाक में लगाई जाने वाली नली से इन्फ़ेक्शन न हो, इसलिए हर महीने ट्यूब को बदला जाता है और उस पर जेली लगाई जाती है ताकि इरोम को तकलीफ़ न हो.
इस बात का भी ध्यान दिया जाता है कि नली दाईं नथुनी में लगे या बाईं. इसका फ़ैसला ख़ुद इरोम शर्मिला करती हैं.
अस्पताल कर्मचारी के मुताबिक़ इरोम का ब्लड प्रेशर, नब्ज़, ऑक्सिज़न लेवल तक़रीबन सही ही रहे हैं.

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इरोम के भाई भी मानते हैं कि इतने सालों तक खान-पान से दूर रहने के बाद भी इरोम की सेहत कमोबेश अच्छी है.
इरोम सुबह रोज़ाना योगा करती हैं और बिना चप्पल पहने सैर करती हैं.
खाना दोबारा शुरू करने पर इरोम शर्मिला पर क्या असर होगा, इस पर अस्पताल कर्मचारी ने बताया कि ऐसा केस कभी अस्पताल में आया ही नहीं, इसलिए डॉक्टरों के लिए भी ये अनोखा अनुभव है.
शुरू-शुरू में महिला सुरक्षा गार्ड भी इरोम के साथ ही कमरे में रहती थी, खाती पीती थी.
लेकिन फिर सवाल उठा कि एक ऐसे व्यक्ति के सामने खाना-पीना कितना सही जो भूख हड़ताल पर हों.
इसके बाद इरोम को अकेले कमरा दिया गया जहाँ उनके पौधे, दो गिनी पिग, किताबें और ढेर सारी पेंटिग्स मौजूद हैं.
इरोम शर्मिला को स्केचिंग और पेंटिंग का बहुत शौक़ है.
कभी खिड़की से दिखने वाले पेड़ पर बैठे पंछियों की चित्रकारी, कभी लोहे के गेट के छेदों के बीच से दिखने वाली बकरी की फोटो बनाती हैं.

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अस्पताल का एक क़िस्सा सुनाते हुए कर्मचारी ने बताया, "एक बार एक पुरुष अपने बच्चे की लाश लेकर अस्पताल आया. वो उसे सीने से लगाए हुए था, बेबस. इरोम ने उसके दर्द को अपनी पेंटिंग में उकेरा था."
कई साल अस्पताल वार्ड में बिताने के बाद भी इरोम शर्मिला कर्मचारियों से बहुत खुल कर बात नहीं करतीं थीं.
कर्मचारी के मुताबिक़ स्टाफ़ को भी कम राब्ता रखने की हिदायत दी जाती है.
लेकिन एक मरीज़ और अस्पताल कर्मचारी ने सालों साथ में बिताए हों तो बिना कहे सुने भी शायद रिश्ता बन ही जाता है.
16 साल बाद जब अचानक अस्पताल का वो ख़ाली वार्ड कैसे लगेगा?
थोड़े भावुक होते हुए अस्पताल कर्मचारी ने बताया, "वो परिवार का हिस्सा लगने लगी थीं. वहाँ का सूनापन खलेगा."
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