'सिद्धू ने एक बार फिर मारा है छक्का'

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- Author, जी कुमार
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए चंडीगढ़ से
कपिल शर्मा के पिछले ही शो में नवजोत सिंह सिद्धू ने ख़ुद पर व्यंग्य करते हुए कहा था, ''मैं छक्के मारने से बाज़ नहीं आ सकता.'' सोमवार को उन्होंने एक बार फिर छक्का मारकर अपनी बात को साबित कर दिया है.
उन्होंने पंजाब के सियासी मैदान पर छक्का मारकर राज्यसभा की सदस्यता से इस्तीफ़ा दे दिया है. इस बात की संभावना है कि वे आम आदमी पार्टी (आप) के साथ जा सकते हैं. इस बार उनका छक्का पंजाब में अकालियों के साथ-साथ कांग्रेस को भी मैदान से बाहर कर सकता है.
क्रिकेट कमेंटरी से लेकर कॉमेडी शोज़ और राजनीति में भी लगातार सक्रिय सिद्धू के आप की सदस्यता लेने की चर्चा ज़ोरों पर है.
ऐसी अटकलें भी लगाई जा रही हैं कि आप सिद्धू को मुख्यमंत्री पद का दावेदार भी घोषित कर दे. दरअसल पंजाब में 'आप' बीते कई महीनों से एक अदद मुख्यमंत्री पद के दावेदार की तलाश में है. आप पंजाब में अपने संगठन में कोई ऐसा चेहरा तलाश नहीं पा रही है, जिसे वह मुख्यमंत्री पद के दावेदार के तौर पर आगे कर सके.

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भगवंत मान का नाम काफ़ी समय तक चला पर पारिवारिक विवाद और अपनी ख़ास आदतों के कारण उनका ग्राफ़ नीचे चला गया.
पार्टी बुरी तरह से सिद्धू जैसे चेहरे की तलाश में जुटी रही. सिद्धू के पार्टी में आने की बात कई बार चली, पर मामला सिरे नहीं चढ़ पाया. उनकी पत्नी नवजोत कौर सिद्धू लगातार अकाली और भाजपा की आलोचना करती रहीं, लेकिन कभी आप को नहीं कोसा.
तभी से साफ़ हो चला था कि कुछ तो है, जिसकी पर्दादारी है. सोमवार को वह पर्दा एक बार उठा, लेकिन जल्द गिर गया. पंजाब और चंडीगढ़ में ख़बर फैल गई थी कि सिद्धू आप में शामिल हो गए हैं. लेकिन उनकी तरफ़ से फ़िलहाल स्थिति स्पष्ट नहीं की गई है.
कभी स्टेट बैंक ऑफ पटियाला में अफ़सर रहे सिद्धू अमृतसर से 2004 से 2014 के बीच लगातार सांसद रहे. वे भाजपा के धमाकेदार सांसद रहे हैं, जो अपने बयानों और जुमलों के कारण हमेशा विरोधियों पर भारी पड़ते रहे हैं. अमृतसर में कांग्रेस ने उन्हें बाहरी कहा तो पटियाला के मूल निवासी सिद्धू ने पटियाला न जाने की सौंगध उठा ली. उसके बाद वो पटियाला में दिखे भी नहीं.

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अब तो घर भी अमृतसर में ही बना लिया है. उसके बाद पत्नी भी अमृतसर से ही पंजाब विधानसभा की विधायक चुनी गईं, लेकिन यहीं से उनका अकाली दल से विवाद शुरू हो गया, क्योंकि स्थानीय स्तर पर अकाली नेता नवजोत कौर से खुश नहीं थे. सिद्धू परिवार और भाजपा के बीच यहीं से दरार बढ़नी शुरू हुई.
2014 के आम चुनाव में भाजपा ने मोदी के दुलारे समझे जाने वाले सिद्धू का टिकट अमृतसर से काटकर अरुण जेटली को दे दिया. सिद्धू ने कभी अपना मुँह नहीं खोला, लेकिन साफ़ दिखा कि वे खुश नहीं थे. वे जेटली के चुनाव प्रचार से ग़ायब रहे.
कांग्रेस अपने हैवीवेट कैप्टन अमरिंदर सिंह को ले आई और जेटली चुनाव बुरी तरह हार गए. सिद्धू ने उसके बाद भी अमृतसर में अधिक दिलचस्पी नहीं ली. लेकिन उनकी हमनाम पत्नी नवजोत कौर ने अकाली सरकार के ख़िलाफ़ मोर्चा खोले रखा है.
काफ़ी सोच-विचार और नवजोत सिद्धू की नाराज़गी दूर करने के लिए भाजपा ने तीन महीने पहले ही उन्हें राज्यसभा भेजा था. बीते दिनों केंद्रीय मंत्रीमंडल में बदलाव के समय भी उन्हें उम्मीद थी कि मंत्री पद मिलेगा. इसी उम्मीद में उन्होंने बीते दो सालों में अपने साथ हुए हर व्यवहार को नज़रअंदाज़ किया और कभी उफ़ तक नहीं की.

जब मंत्री पद की उम्मीद भी टूट गई, तो उन्होंने पार्टी से किनारा करना ही उचित समझा. उनके क़रीबियों का कहना है कि वे राज्यसभा में भाजपा का सजावटी सामान बनकर सजे नहीं रहना चाहते थे. आप के दरवाज़े पर उनके लिए दो साल से वंदनवार लगे हुए हैं.
क्रिकेट से संन्यास लेने के बाद उन्होंने सबसे पहले दूरदर्शन के लिए कॉमेंट्री करनी शुरू की थी. लेकिन जल्द ही राजनीति से भी जुड़ गए. मगर उनका प्रमुख प्रोफ़ेशन क्रिकेट एक्सपर्ट के तौर पर कॉमेंट्री ही रहा.
सिद्धूइज़्म की भी चर्चा रही. टीवी शो बिग बॉस में गए और अपनी एक अलग पहचान बनाई. वहीं कपिल शर्मा के साथ कॉमेडी शो में भी सफल जोड़ी बनाए हुए हैं.
इतनी सफलताओं के साथ ही सिद्धू एक क़त्ल के मामले में दोषी भी हैं. अदालत ने उन्हें तीन साल की सज़ा भी सुनाई. उन्होंने सांसद पद से इस्तीफ़ा देकर सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की. सुप्रीम कोर्ट में निचली अदालत की सज़ा पर रोक लगने के बाद उन्होंने अमृतसर से फिर चुनाव लड़ा और कांग्रेस उम्मीदवार को भारी अंतर से हराया.
नेतागीरी हो या क्रिकेट, सिद्धू खुले हाथ से खेलने के लिए जाने जाते हैं. इस बार भी उन्होंने गेंद पर खींचकर मारा है, पर गेंद हवा में है. अब छक्का लगेगा या वो कैच आउट होंगे यह देखना दिलचस्प होगा.
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