कश्मीर में स्मार्टफ़ोन दे रहा है आक्रोश को हवा?

इमेज स्रोत, BBC World Service
- Author, जस्टिन रॉलैट
- पदनाम, दक्षिण एशिया संवाददाता, बीबीसी न्यूज़
भारत प्रशासित कश्मीर में हुई हालिया हिंसा को ये कहते हुए ख़ारिज करना बड़ा आसान है कि वहां वर्ष 1947 से ही हिंसा की ऐसी लहरें आती रही हैं.
लेकिन घाटी में कुछ नया भी हो रहा है जिसने इलाके में होने वाले प्रदर्शनों की प्रकृति को बदल दिया है जिसकी अनदेखी नहीं की जा सकती है.
बीते शुक्रवार हिज़्बुल मुजाहिदीन के युवा कमांडर बुरहान वानी की सुरक्षाबलों के साथ मुठभेड़ में मौत के बाद हिंसा भड़की जिस पर क़ाबू पाने के लिए प्रशासन ने मोबाइल पर इंटरनेट सेवा दोनों को बंद कर दिया.
इसकी वजह समझना आसान है. सारी दुनिया स्मार्टफोन क्रांति के दौर से गुजर रही है.

इमेज स्रोत, AFP
भारत भी इस क्रांति से अछूता नहीं है जहां पिछले साल 10 करोड़ स्मार्टफोन ख़रीदे गए हैं. भारत में स्मार्टफोन की बिक्री बढ़ती ही जा रही है.
भारत प्रशासित कश्मीर इस मामले में काफ़ी तेज़ रहा है जहां एक ख़बर के मुताबिक उग्रवाद को बढ़ावा देने में सोशल मीडिया ने ख़ासी भूमिका अदा की है.
इस बारे में सोमवार को टेलीग्राफ़ अख़बार ने एक एक्सक्लूसिव ख़बर छापी जिसमें कश्मीर में चरमपंथ के बारे में एक वरिष्ठ अधिकारी की जांच रिपोर्ट का ज़िक्र किया गया.
गृह मंत्रालय के अधिकारियों को सौंपी गई इस रिपोर्ट के मुताबिक भारत प्रशासित कश्मीर में वर्ष 2010 तक केवल एक चौथाई लोग ही सोशल मीडिया का इस्तेमाल कर रहे थे.
लेकिन वर्ष 2014 में ये आंकड़ा बढ़कर कश्मीर की जनसंख्या का एक तिहाई हो गया. ये भी कहा गया है कि वर्ष 2015 के आख़िर तक घाटी की 70 प्रतिशत आबादी सोशल मीडिया पर सक्रिय हो चुकी थी.

कश्मीर के कई चरमपंथियों की तरह बुरहान वानी भी तकनीक के इस्तेमाल में माहिर था.
स्मार्टफोन के बढ़ते चलन से पहले इंटरनेट और सोशल मीडिया के लिए लोगों को साइबर कैफे जाना पड़ता था.
लेकिन स्मार्टफोन की दुनिया में क्रांति होने के बाद लोगों को फेसबुक पर अपडेट मिलने लगे और साइबर कैफे जाने की ज़रूरत नहीं रही.
इसलिए किसी को इस बात पर हैरानी नहीं होनी चाहिए कि भारत प्रशासित कश्मीर में बुरहान वानी को पढ़ने-सुनने-देखने वालों की तादाद बहुत अधिक थी.
वर्ष 2010 में कश्मीर घाटी में बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन हुए थे.

इमेज स्रोत, AP
मैंने भारत की कश्मीर नीति की समीक्षा करने के लिए 2010 में केंद्र सरकार की ओर से बनाई गई समिति के एक सदस्य एमएम अंसारी से इस बारे में बात की.
उन्होंने कहा, ''इस बार चरमपंथ देश के भीतर ही पनपा है. अधिकतर चरमपंथियों को अंदर से ही प्रेरणा मिल रही है. सभी सोशल मीडिया का इस्तेमाल कर रहे हैं. पहले ये सब पाकिस्तान की तरफ़ से होता था.''
उनका मानना है कि ताज़ा घटना कोई अच्छी ख़बर नहीं है. एमएम अंसारी कहते हैं कि 'ये दुर्भाग्यपूर्ण है कि इस तरह की घटनाओं में इज़ाफ़ा होने की संभावना नज़र आ रही है.'
दुनिया में अन्य जगहों की ही तरह, कश्मीर में भी संघर्ष का दायरा टेक्नोलॉजी के कारण बढ़ रहा है.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए <link type="page"><caption> यहां क्लिक</caption><url href="https://play.google.com/store/apps/details?id=uk.co.bbc.hindi" platform="highweb"/></link> करें. आप हमें <link type="page"><caption> फ़ेसबुक</caption><url href="https://www.facebook.com/bbchindi" platform="highweb"/></link> और<link type="page"><caption> ट्विटर</caption><url href="https://twitter.com/BBCHindi" platform="highweb"/></link> पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)












