अस्पतालों के लिए कानून बना, डॉक्टरों को नहीं जमा

इस क्षेत्र में सालों से काम करने वाले सुनील नंदराज
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    • Author, विनीत खरे
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली

क्या आपको भरोसा है कि आप जिस अस्पताल में इलाज के लिए जा रहे हैं वहां सुविधाएं अच्छी होंगी, डॉक्टर अच्छे होंगे, न्यूनतम मापदंडों का पालन होगा और इलाज पर कितना खर्च होगा?

कई बार हम ये सवाल भगवान भरोसे छोड़ देते हैं या फिर उन पर ज़्यादा ध्यान नहीं देते.

आपको जानकर हैरानी होगी कि भारत में ऐसा एक क़ानून है जिसमें अस्पतालों से कहा गया है कि वो अपनी सुविधाओं का स्तर बेहतर बना कर रखें.

लेकिन कुछ मुद्दों पर डॉक्टरों के विरोध के कारण इस क़ानून को लागू कर पाना संभव नहीं हो पाया है.

सरकार ने 2010 में क्लीनिकल इस्टैब्लिशमेंट क़ानून पारित किया था. मक़सद था निजी अस्पतालों, क्लीनिक, डायग्नोस्टिक सेंटरों की जवाबदेही निर्धारित करना और ये सुनिश्चित करना कि वो खुद को रजिस्टर करवाएं, न्यूनतम मापदंडों का पालन करें.

अगर वो ऐसा नहीं करते हैं तो उन पर जुर्माना लगाया जाए.

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इस क़ानून की मदद से अस्पतालों की स्वास्थ्य सुविधाओं के बारे में जानकारी जुटाना आसान हो जाता. इससे देश की स्वास्थ्य सुविधाओं को लेकर योजनाएं बनाने में मदद भी मिलती.

स्वास्थ्य मामलों में सरकारी नीतियों के क्रियान्वयन से जुड़े रहे सुनील नंदराज बताते हैं कि इस क़ानून को अरुणाचल प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, मिज़ोरम और सिक्किम के लिए बनाया गया था.

दूसरे राज्यों के पास विकल्प था कि या तो वो इसे अपने यहां लागू करें या फिर इस विषय पर अपना कोई अलग क़ानून बनाएं.

स्वास्थ्य क्षेत्र में सालों से काम करने वाले एक्टिविस्ट सुनील नंदराज बताते हैं कि पांच राज्य राजस्थान, बिहार, उत्तर प्रदेश, झारखंड, असम और उत्तराखंड ने इस क़ानून को स्वीकार कर लिया लेकिन इसको लागू करने में कई चुनौतियां हैं.

इस क़ानून की मुख्य बातें है:

  • अस्पताल, क्लीनिक खुद को रजिस्टर करवाएं ताकि ये सुनिश्चित किया जा सके कि वो लोगों को न्यूनतम सुविधाएं और सेवाएं दे रहे हैं.
  • ये अस्पताल, मेटर्निटी होम्स, नर्सिंग होम्स, डिसपेंसरी क्लीनिक, आरोग्य निवास आदि के अलावा एलोपैथी, होम्योपैथी, आयुर्वेद, यूनानी दवाओं से जुड़ी स्वास्थ्य सुविधाओं पर भी लागू है.
  • स्वास्थ्य सुविधाएं देने वाले सभी संस्थानों के लिए ज़रूरी है कि मरीज़ों से जुड़े इलेक्ट्रॉनिक हेल्थ और मेडिकल रेकॉर्ड (ईएचआर और ईएमआर) को सुरक्षित रखें.
  • इन संस्थानों का दायित्व था कि अगर कोई रोगी इमर्जेंसी में अस्पताल पहुंचता है तो उसे वो सभी सुविधाएं मुहैया करवाई जाएंगी जिससे रोगी को स्टेबल किया जा सके.
  • संस्थान अपनी सेवाओं की कीमत राज्य सरकारों से बातचीत करके और केंद्र सरकार की सूची में निर्धारित सीमाओं के भीतर तय करें और इन को स्थानीय और अंग्रेज़ी भाषाओं में अस्पताल में प्रदर्शित करें.
  • क़ानून के मुताबिक अगर किसी भी निर्धारित प्रावधान का उल्लंघन होता है तो अस्पताल का रजिस्ट्रेशन रद्द कर दिया जाएगा. रजिस्टर करने वाले अधिकारियों के पास जांच और तहकीकात के अधिकार होंगे. क़ानून में उल्लंघन पर जुर्माने की भी बात की गई है.

इस क़ानून के कई प्रावधानों से डॉक्टर नाराज़ हैं.

  • डॉक्टरों की सबसे ज़्यादा नाराज़गी सेक्शन 12(2) से है. इस सेक्शन के मुताबिक अगर कोई रोगी इमर्जेंसी में अस्पताल पहुंचता है तो उसे वो सभी सुविधाएं मुहैया करवाई जाएंगी जिससे रोगी को स्टेबल किया जा सके. वकील और डॉक्टर एमसी गुप्ता कहते हैं, “क़ानून में कोई ज़िक्र नहीं है कि इलाज का खर्च कौन उठाएगा. अगर किसी व्यक्ति के साथ दुर्घटना हो जाती है और उसे क्लीनिक और अस्पताल लाया जाता है तो उसका खर्च कौन देगा?”
  • अगस्त 2006 में जस्टिस जगन्नधा राव की अध्यक्षता में लॉ कमीशन की रिपोर्ट आई. इस रिपोर्ट में डॉक्टरों के ऊपर ज़िम्मेदारी डाली गई कि वो किसी भी अवस्था में इमर्जेंसी में आए किसी भी रोगी को बिना इलाज के वापस नहीं लौटाएंगे. खर्च की समस्या से निपटने के लिए इस रिपोर्ट में दुर्घटना के शिकार लोगों, प्रसव पीड़ा से गुज़र रही महिलाओं के साथ साथ उन लोगों को जिन्हें आपातकाल मेडिकल सुविधाओं की ज़रूरत है, मेडिकल सर्विसेज़ फ़ंड बनाने का सुझाव दिया गया था. बीबीसी से बातचीत में जस्टिस राव ने बताया कि इस फंड की स्थापना राज्यों को करनी थी लेकिन उनकी रिपोर्ट पर सरकारों ने क्या कार्रवाई की, ये उन्हें मालूम नहीं.
  • डॉक्टरों पर आरोप है कि वो किसी तरह की जवाबदेही से बचना चाहते थे, इसलिए उन्होंने इस क़ानून का विरोध किया. लेकिन डॉक्टरों का दावा है कि इस क़ानून में अधिकारियों को अनियंत्रित अधिकार दिए गए हैं और वो अपने अधिकारों का अस्पतालों के खिलाफ़ अकारण इस्तेमाल कर सकते हैं. डॉक्टरों का दावा है इससे भ्रष्टाचार बढ़ेगा, इंस्पेक्टर राज को बढ़ावा मिलेगा और डॉक्टरों को परेशान किया जाएगा.
  • ऐसी शिकायतें आम हैं कि अस्पतालों में फ़ीस, सर्जरी, ऑपरेशन आदि पर खर्च को लेकर डॉक्टरों, अस्पतालों की कोई जवाबदेही नहीं होती जिससे सारा भार रोगी और उसके परिवार पर पड़ता है लेकिन डॉक्टरों का कहना है कि विभिन्न सेवाओं के लिए उनकी फ़ीस क्या होगी, इसे सरकारें नियंत्रित नहीं कर सकतीं.
  • डॉक्टरों को रोगियों की ईएचआर और ईएमआर रखने में भी आपत्ति है क्योंकि उनका कहना है कि इससे उनका खर्च बढ़ेगा.

किसी अस्पताल, मेडिकल क्लीनिक में घुसते वक्त ये विश्वास कि आप सही व्यक्ति के पास जा रहे हैं, अस्पताल रजिस्टर्ड है, सुविधाएं अच्छे स्तर की हैं, बेहद ज़रूरी है. सुनील नंदराज के अनुसार क़ानून के बेहतर क्रियान्वयन पर काम चल रहा है लेकिन इसकी गति बेहद धीमी है.

वो कहते हैं, “अगर आप गाड़ी चलाना चाहते हैं तो आपको गाड़ी रजिस्टर करवानी होगी लेकिन अगर आप दिल्ली में एक डायग्नोस्टिक सेंटर खोलना चाहते हैं तो आपको लाइसेंस लेने की ज़रूरत नहीं है. तमिलनाडु जैसे तरक्कीपसंद राज्य में भी यही स्थिति है.”

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