सौ साल में पहली बार बाघों की संख्या बढ़ी

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इस साल जंगलों से एक ख़ुशख़बरी आई है. पिछले 100 साल में पहली बार दुनिया भर में बाघों की तादाद में उछाल नज़र आ रहा है.
2010 में दुनिया भर में 3200 बाघ थे. अप्रैल 2016 की गिनती में ये संख्या 3890 पाई गई.
बाघों की आबादी बढ़ने की कई वजहें हैं. लेकिन जो सबसे बड़ी वजह है वो ये कि स्थानीय लोग अब इन जंगली, ख़तरनाक जानवरों के साथ रहने की आदत डाल रहे हैं.
दुनिया में पाए जाने बाघों में से आधे भारत में रहते हैं. भारत के कई इलाक़ों में आदिवासी लोग जंगलों में बाघों की मौजूदगी के साथ ही रह रहे हैं.
ये चौंकाने वाली बात है. क्योंकि बाघ कई बार इंसानों पर हमला बोलकर उन्हें मार डालते हैं. ऐसे में कौन ख़ूनी पड़ोसी के साथ रहना चाहेगा?
फिर भी, कई इलाक़ों में आदिवासी, बाघों के इलाक़े में रह रहे हैं. इस वजह से कई बार आदिवासी, बाघों की मदद भी कर रहे हैं.
ग़ैरसरकारी संस्था, 'सरवाइवल इंटरनेशनल' का कहना है कि आदिवासी लोग, क़ुदरत के सबसे अच्छे पहरेदार हैं.

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संस्था के पास इस दावे को सही ठहराने के लिए कई सबूत भी हैं.
संस्था ने पिछले साल दिसंबर में पश्चिमी घाट में स्थित बीआरटी वाइल्ड लाइफ सैंक्चुअरी के आंकड़े जारी किए थे, जहां 2010 से 2014 के बीच बाघों की आबादी दोगुनी हो गई.
ये भारत में जनसंख्या बढ़ने की तेज़ रफ़्तार से भी काफ़ी बेहतर है. पश्चिमी घाटों में बाघ, जंगलों में सोलिगा नाम के आदिवासियों के साथ इलाक़ा साझा करते हैं.
सोलिगा आदिवासी, बाघ को देवता मानते हैं. वो उनकी पूजा करते हैं. वो कभी भी बाघों से छेड़खानी नहीं करते, उनके साथ हिंसा तो दूर की बात है. आज बाघों और इंसानों के साथ रहने की और भी मिसालें देखने को मिलती हैं.
अभी पिछले महीने ही महाराष्ट्र की बोर वाइल्डलाइफ़ सैंक्चुअरी के बारे में एक रिसर्च सामने आई. वहां रहने वाले लोग बाघों से बिल्कुल परेशान नहीं थे.
शायद उन लोगों का खान-पान इसकी बड़ी वजह है. ज़्यादातर स्थानीय लोग शाकाहारी हैं. तो वो खाने के लिए जानवरों का शिकार नहीं करते. इसलिए बाघों को अपने शिकार करने के लिए तमाम जानवर मिल जाते हैं.

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ये स्थानीय लोग खेती करते हैं. बाघों के आस-पास होने की वजह से जानवरों से इनकी फ़सल की सुरक्षा की भी गारंटी मिलती है.
सोलिगा आदिवासियों के मुक़ाबले, बोर सैंक्चुअरी के पास रह रहे लोगों का बाघों से कई बार सामना हुआ. झगड़ा भी हुआ. कुछ जानवर और कुछ लोग मारे भी गए.
फिर भी स्थानीय लोग, बाघों को ख़राब नहीं मानते. उनके साथ ज़िंदगी बसर करने को तैयार हैं.
इसकी बड़ी वजह ये है कि सभी स्थानीय लोग हिंदू धर्म को मानने वाले हैं. जो ये समझते हैं कि बाघ, उनकी देवी दुर्गा का वाहन है. इसलिए भी वो बाघों को मारने से परहेज़ करते हैं.
जंगली जानवरों को बचाने में अहम रोल के बावजूद भारत में कई जगहों से आदिवासियों को हटाया जा रहा है.
बाघों के रहने वाले इलाक़ों में इंसानों को रहने दिया जाए या नहीं, ये सवाल काफ़ी पुराना है.
1980 के दशक में बाघों की रिहाइश वाले इलाक़ों में रहने वाले गुज्जर समुदाय के लोगों को हटाकर दूसरी जगह बसाया गया था.

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इनमें से ज़्यादातर को जंगल छोड़कर दूसरी जगह बसने पर कोई ऐतराज़ नहीं था. जो लोग पहले जंगली इलाक़ों से बाहर जाकर बसे थे.
उनकी ज़िन्दगियां बेहतर हुई थीं. उन्हें देखकर, जो बचे-खुचे लोग थे, वो भी जंगल छोड़कर जाने को राज़ी थे.
देश के दूसरे हिस्सों में ये फॉर्मूला कामयाब होगा या नहीं, कहना मुश्किल है.
गुज्जरों को तो पता था कि उन्होंने क़ुदरती संसाधनों का भरपूर इस्तेमाल कर लिया है. अब वहां से हटना ही बेहतर होगा.
फिर जंगल से बाहर आने पर उन्हें पढ़ाई के और रोज़गार के अच्छे साधन भी मिलेंगे.
अगर वो जंगलों में रहने के लिए छोड़ दिए जाएंगे, तो, हो सकता है कि आगे चलकर वो जंगली जानवरों का शिकार करने लगें.
ऐसी कई घटनाएं सामने आई हैं, जब गुज्जरों ने भैंसे या दूसरे जानवरों की लाशों में ज़हर डाल दिया. जिससे जब बाघों ने उनका मांस खाया तो वो भी मारे गए.
इन बाघों की खाल और हड्डियों को अच्छी क़ीमत पर बेचने की ख़बरें भी आईं. गुज्जर अक्सर अपने पालतू जानवरों को भी ज़हर खिलाकर मार डालते हैं. ताकि बाघों का शिकार करने में वो जानवर काम आएं.
'सरवाइवल इंटरनेशनल' की सोफी ग्रिग कहती हैं कि ये सब बातें बहुत बढ़ा-चढ़ाकर पेश की जाती हैं. उन्हें पता है कि आदिवासी, बहुत ज़्यादा, जंगली जानवरों का शिकार नहीं करते.
हां, खाल और हड्डियां बेचने के लिए कई लोग बाघों को मार डालते हैं. लेकिन अक्सर ऐसा गुरबत की वजह से होता है.
इंसानों पर हमला करने, उन्हें मारकर खाने वाले जीवों के बीच रहना बेहद मुश्किल काम है.
लेकिन, अगर हम स्थानीय लोगों को, आदिवासियों को क़ुदरती संसाधानों के इस्तेमाल और रखरखाव की ज़िम्मेदारी दे दें, तो जंगली जानवरों की तादाद घटने से रोका जा सकता है.
(अंग्रेज़ी में मूल लेख पढ़ने के लिए <link type="page"><caption> यहां क्लिक करें</caption><url href="http://www.bbc.com/earth/story/20160607-there-are-people-in-india-happily-living-with-wild-tigers" platform="highweb"/></link>, जो <link type="page"><caption> बीबीसी अर्थ </caption><url href="http://www.bbc.com/earth/uk" platform="highweb"/></link>पर उपलब्ध है.)
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