ऑपरेशन सदभावना की भावना कितनी सच्ची?

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- Author, रियाज़ मसरूर
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, श्रीनगर
सरकारी आंकड़ों के मुताबिक़ भारत प्रशासित कश्मीर में शिक्षित बेरोज़गारों की संख्या छह लाख से ज़्यादा हो गई है.
बढ़ती बेरोज़गारी से परेशान कुछ युवा जहां चरमपंथ का रास्ता अपना लेते हैं, वहीं हज़ारों युवा भारतीय सेना में भी भर्ती हो रहे हैं.
इसके लिए आए दिन घाटी के अलग-अलग क्षेत्रों में सेना भर्ती कैंप लगाती है. भर्ती कैंप में शारीरिक परीक्षण के बाद युवाओं को सेना में भर्ती कर लिया जाता है.
ऐसे ही एक कैंप में पहुंचे एक युवक ने बीबीसी को बताया, "यहां रोज़गार की थोड़ी कमी है, पैसे नहीं हैं. हमारे घरवाले भी परेशान हैं. हम यहां सुबह चार बजे आए हैं."
वहीं एक और युवक का कहना था, "अब ज़्यादातर लोग फौज में आ जाते हैं, पहले दहशतग़र्दी का डर था, अब वह भी ख़त्म हो गई है."

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कश्मीर में कई साल से सेना 'ऑपरेशन सदभावना' नामक एक अभियान चला रही है. इसके अंतर्गत सेना में युवाओं की भर्ती के साथ ही, शिक्षा, स्वास्थ्य और प्रशिक्षण के भी कार्यक्रम चलाए जाते हैं.
ब्रिगेडियर एए महमूद कहते हैं, "ऑपरेशन सदभावना बहुत ही लोकप्रिय हो रहा है. हमारी फौज का यही मक़सद होता है कि जितने भी बच्चे हैं, उनकी जितनी भी मदद हो सके, वो करें. यहां हम ऑपरेशन सदभावना के अधीन कई 'आर्मी गुडविल स्कूल' चला रहे हैं. इसके अलावा जिन स्कूलों को कुछ ज़रूरत होती है, हम पूरी कोशिश करते हैं कि वो चीज़े पहुंचाएं."
कट्टरवादी संगठन दुख्तरान-ए-मिल्लत की आसिया अंद्राबी ने सदभावना ऑपरेशन के विरोध में आंदोलन छेड़ रखा है.

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वह कहती हैं, "ये एक तरह का शोषण है, इसलिए हम इसका विरोध करते हैं और करते रहेंगे. हम अपनी तरफ से लोगों को समझाते हैं कि ऑपरेशन सदभावना का हिस्सा न बनें, यह दुश्मन की एक युद्ध-नीति है. वो बंदूक से नहीं, बल्कि बड़े प्यार से हमारा नैतिक बल कमज़ोर करना चाहते हैं."
उधर, मानवाधिकारों के लिए काम कर रही संस्थाओं का कहना है कि कश्मीर में प्रशासन के कामों में सरकार से ज़्यादा सेना की चलती है.
कोलिशन ऑफ़ सिविल सोसायटीज़ के प्रवक्ता ख़ुर्रम परवेज़ कहते हैं, "कश्मीर में कोई सरकार नहीं रहने पर भी आपको लगेगा कि यहां कोई परेशानी नहीं है, क्योंकि ऐसा यहां के लिए आम बात है. सरकार का काम भी यहां आमतौर पर सेना या पुलिस ही करती है."

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वह कहते हैं, "यहां सदभावना के नाम पर जो सिलाई केंद्र या बाक़ी के कार्यक्रम होते हैं, उसका मक़सद कश्मीर की आवाम की उस गैरत को ख़त्म करना और उसे सवालों के घेरे में लाना है, जिसकी बुनियाद पर वह हिंदुस्तान के ख़िलाफ़ लड़ रहे हैं."
सैन्य अधिकारियों का कहना है कि हाल ही में डेढ़ हज़ार पदों के लिए 20 हज़ार युवाओं ने आवेदन किया था.
कश्मीर की मौजूदा स्थिति पर अलगाववादी ही नहीं, बल्कि भारत का समर्थन करने वाले नेता भी चिंतित हैं.
विधायक इंजीनियर रशीद कहते हैं कि सेना की भूमिका सीमा की सुरक्षा तक सीमित रहनी चाहिए.

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उन्होंने बीबीसी से कहा, "1990 से लेकर 2004 तक, 14 साल तक सेना पूरे इलाक़े को बेगार पर ले जाती थी. हर गांव से 10-15 लोगों को बारी के आधार पर, चौबीस घंटे के बेगार पर जाना पड़ता था. इसमें पांच-छह सौ लोग होते थे. इतना ज़ुल्म तो जर्मनी ने भी नहीं किया होगा, जितना हमारे इलाक़े में हुआ."
उनका कहना है, "ख़ुद मैंने भी चार सौ से ज़्यादा दिन बेगार पर दिए हैं, जहां हमें न कोई मज़दूरी मिली न मुआवज़ा. सदभावना ऑपरेशन एक बहुत बड़ा घोटाला है. मेरे ही इलाक़े के लिए करोड़ों रुपए निकले हैं, लेकिन हमसे ज़बरन काम कराया गया और पैसा सेना ने ले लिया."
वह कहते हैं कि वह सेना के ख़िलाफ़ नहीं हैं, लेकिन, "हक़ीकत यही है कि ऑपरेशन सदभावना पैसा बनाने के लिए हुआ है. मेरी गुजारिश है कि अगर सरहदें सुरक्षित नहीं हैं, तो इन कामों में टांग नहीं अड़ानी चाहिए."

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कश्मीर पुलिस ने हाल ही में दावा किया था कि केवल एक साल में 80 से ज़्यादा युवक चरमपंथी गुटों से जा मिले हैं. लेकिन इसके साथ ही सैकड़ों युवक भारतीय सेना में भर्ती हो रहे हैं.
कश्मीर में हर तीन महीने बाद भर्ती किए गए लोगों की पासिंग आउट परेड भी होती है.
जानकारों का कहना है कि कश्मीर में बेरोज़गारी को ख़त्म करने में सरकार नाकाम रही है. इसकी वजह से कश्मीरी युवाओं के पास केवल दो ही रास्ते बचे हैं, चरमपंथ का या सेना का. और यह एक लोकतांत्रिक समाज के लिए बड़ा ख़तरा है.
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