एसिड अटैक की शिकार औरतों के लिए नई उम्मीद

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    • Author, जस्टिन रॉलट
    • पदनाम, दक्षिण एशिया संवाददाता

क्या आप भी एक ही तरह की बोरियत से भरी हुई छुट्टियों के दिन से थक गए हैं और कुछ रचनात्मक करना चाहते हैं.

तो एसिड हमले के शिकार लोगों के जीवन को फिर से सजाने-संवारने की कोशिश करना कैसा रहेगा?

ब्रिटेन और डेनमार्क की मेडिकल प्रोफेशनल्स की एक टीम यही काम करती है.

इस दल के सदस्य अपनी छुट्टियों का इस्तेमाल दुनिया भर में घूमकर एसिड हमले के शिकार ग़रीब लोगों का मुफ्त में प्लास्टिक सर्जरी करने में करते हैं.

यह दल ब्रितानी चैरिटी संस्था इंटरप्लास्ट यूके का हिस्सा है. इस दल में सर्जन, डॉक्टर, नर्स, एक फिजियोथेरेपिस्ट और एक फर्मासिस्ट भी शामिल हैं.

ये अपनी हवाई यात्रा और रहने सहने का खर्च ख़ुद ही उठाते हैं. ये लोग किसी भी जगह पर मौजूद स्थानीय अस्पताल में एक कैंप लगाते हैं फिर मैराथन तरीके से लोगों का दो हफ्तों तक इलाज करते हैं.

इस दल से मेरी मुलाकात भारत की राजधानी दिल्ली में हुई जहां दो हफ्तों से भी कम समय में इस टीम ने 100 लोगों की सर्जरी कर डाली है.

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उन्होंने यहां ऐसे बहुत सारे बच्चों को देखा जिनकी तालू फटी हुई थी. उन्होंने आग से जले हुए लोगों के कई मामले भी देखे लेकिन एक चौथाई मामले एसिड हमले के शिकार लोगों के थे.

भारत में अक्सर एसिड हमलों के मामले देखने को मिलते हैं, लेकिन इससे जुड़ा कोई विश्वसनीय आंकड़ा मौजूद नहीं है.

सरकारी आंकड़ों के मुताबिक़ एक साल में शायद ऐसे 1,000 मामले सामने आते हैं. समाजिक कार्यकर्ता इसे एक हास्यपद आंकड़ा बताते हैं. उनका कहना है कि वास्तविक आंकड़ा इससे कई गुना ज़्यादा का है.

आप कल्पना कर सकते हैं कि इस पीड़ा से गुज़रने वाले लोगों का इलाज करना कितना चुनौतीपूर्ण काम होगा.

ब्रिटेन की स्वास्थ्य सेवा एनएचएस के रिटायर प्लास्टिक सर्जन चार्ल्स वाइवा चार दशकों से भी अधिक वक्त से विकासशील देशों में इस तरह से घूमकर लोगों का इलाज कर रहे हैं.

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उनका कहना है कि मरीजों का साहस देखकर उन्हें हिम्मत मिलती है.

अनुपमा बिहार से एक हज़ार किलोमीटर से अधिक की दूरी तय करके दिल्ली आई हैं अपना इलाज कराने के लिए.

ऑपरेशन थियेटर में जाने से पहले अनुपमा ने वाइवा को अपनी सबसे बड़ी क़ीमती चीज़ दिखाई.

ये था तस्वीरों का वो अलबम जो हमले से पहले की उनकी तस्वीरों का था.

उन्होंने एक तस्वीर अपने हाथ में थाम रखी थी जिसमें वे बिस्तर पर लाल और सुनहरी साड़ी में लिपटी हुई बैठी हुई थी और कैमरे की ओर सिर उठा कर देख रही थी.

उन्होंने मुझे बताया, "यह तस्वीर हमलाे से तीन महीने पहले लिया गया था."

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बीस साल बाद अनुपमा अभी भी एक खुश और स्वाभिमानी महिला है लेकिन उनका भविष्य बर्बाद हो चुका है.

एसिड हमले के मामले में अधिकतर औरतें शिकार हुई हैं और इन हमलों को अंजाम देने वाले अधिकतर पुरुष हैं जो अक्सर बदले की कार्रवाई के तहत इन हमलों को अंजाम देते हैं.

अनुपमा की भी एक ऐसी ही दर्दभरी कहानी है.

वो और उनकी बहन पड़ोस में रहने वाले एक परिवार के हाथों यौन उत्पीड़िन का शिकार हो रही थी.

पड़ोस के परिवार के दो बेटे और एक बेटी उनके सामने यौन प्रस्ताव रखते थे और उनपर भद्दी-भद्दी टिप्पणियां करते थे.

वे उन्हें अपने घर में लाने के लिए लालच देते थे. जब उनके पिता ने उनके ख़िलाफ़ शिकायत की तो वे गुस्सा हो गए.

शिकायत करने के कुछ दिनों के बाद वे अनुपमा के घर में आए और अनुपमा और उनकी बहन पर सोते हुए में एसिड फेंककर भाग गए.

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उनकी बहन को तो ज्यादा नुकसान नहीं हुआ लेकिन अनुपमा नहीं बच पाईं.

उनके चेहरे का निचला हिस्सा इस हमले में बुरी तरह से झुलस गया. उनका होंठ नीचे की ओर लटक गया और उनके गर्दन और छाती पर भयानक दाग पड़ गए.

ऐसा माना जाता है कि एसिड हमले के शिकार लोगों का मुफ्त में इलाज होता है लेकिन अक्सर ये सर्जरी घटिया स्तर की होती है.

अनुपमा की कई बार सर्जरी हुई और उनका कहना है कि हर बार उन्हें कहा गया कि उनका सबसे निम्न दर्जे का इलाज किया गया है.

अनुपमा और उनका परिवार इतना गरीब था कि वे लोग निजी चिकित्सा सेवा नहीं ले सकते थे.

तभी उन्हें वाइवा के नेतृत्व में एक ऊंचे दर्जे की सर्जरी सेवा मुफ्त में मिली.

आश्चर्यजनक रूप से एक छोटे से ही ऑपेरेशन में वाइवा और उनकी टीम ने उनके चेहरे को एक नया रूप दिया.

दो घंटे के बाद ही वे चाय और बिस्कुट खा रही थी.

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उनका कहना है कि वे आगे देखेंगी कि सर्जरी का क्या असर हुआ है. जब दाग मिट जाएंगे तो वे अपने लिए एक नौकरी चाहती हैं ताकि वो खुद का देखभाल कर सकें.

वाइवा के दल में बेहोश करने वाले डॉक्टर ग़ालिब मुआदम ने बताया कि इसतरह से छुट्टियां बिताना कितना सुकूनदायक है.

उन्होंने कहा, "कभी-कभी ब्रिटेन में काम करते हुए मैंने महसूस किया कि जब मैं नहीं होता हूं तो कोई दूसरा मेरा काम कर देता है. कोई फर्क नहीं पड़ता लेकिन यहां महसूस होता है कि आप वाकई में कुछ ऐसा कर रहे जिससे फर्क पड़ता है. "

कुछ सालों तक उन्होंने अपनी सारी छुट्टियों में इंटरप्लास्ट यूके के लिए ही काम किया है.

वे इसे एक त्याग की तरह नहीं देखते हैं.

वो कहते हैं, "आप ऐसे दौरों से बहुत कुछ पाते हैं. मैं खुद को देखता हूं और सोचता हूं कि अगर मेरे साथ जलने की ऐसी घटना होती है तो मैं क्या करूंगा. मैं नहीं जानता कि मैं इतना हिम्मत रख पाऊंगा कि नहीं. ऐसे हालात में वे लोग बहुत प्रेरणा देने वाले हैं क्योंकि वे लोग जीवन से हार नहीं माने हैं."

अब जब अनुपमा वापस अपने घर जाने की तैयारी कर रही हैं तो मैं डॉक्टर ग़ालिब मुआदम की बात समझ सकता हूं कि उनके बोलने का क्या मतलब है.

हममें से बहुत सारे लोग जब छुट्टियों पर जाते हैं तो थोड़े दिनों के लिए अपनी ज़िंदगी बदलना चाहते हैं लेकिन दूसरों की ज़िंदगी बदलना ज्यादा बड़ा काम है.

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