'सुखबीर के लिए अब वोट बांट पाना मुश्किल'

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- Author, संजय शर्मा
- पदनाम, बीबीसी हिन्दी डॉटकॉम के लिए
"अगर आपके पास बड़े आइडियाज़ हैं तो खूब पैसे कमाएंगे." ऐसा न स्टीव जॉब्स कह रहे हैं न अंबानी या कोई बिज़नेस गुरु.
यह कहना है भारत की दूसरी सबसे पुरानी पार्टी अकाली दल के अध्यक्ष और पंजाब के उप मुख्यमंत्री सुखबीर सिंह बादल का.
यह सुखबीर बादल के लिए जीत दिलाने का फ़ॉर्मूला भी है और अभिशाप भी.
साल 2012 में इस फ़ॉर्मूले की बदौलत सुखबीर सिंह बादल ने पंजाब विधानसभा का चुनाव जीतकर सबको चौंका दिया था. उनके 89 वर्षीय पिता प्रकाश सिंह बादल एक बार फिर मुख्यमंत्री बने थे.

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इससे जनता के बीच सुखबीर बादल की छवि को नुकसान भी पहुँचा क्योंकि बादल परिवार के अलावा किसी और के व्यापार को कुछ खास फ़ायदा नहीं मिल रहा था.
सुखबीर पर इस बात के आरोप लगने लगे कि वे राज्य में ट्रांसपोर्ट और सेवा के क्षेत्र की सिर्फ़ अपनी कंपनियों को बढ़ावा रहे हैं.
सुखबीर लगातार बड़े आइडियाज़ देते रहे, लेकिन निवेशकों ने इसे हमेशा ख़ारिज किया और पंजाब एक मध्यम रफ़्तार से प्रगति करने वाला राज्य बना रहा.
ऐसा लगता है कि पार्टी के पास चुनाव प्रबंध के लिए काफी सारा फ़ंड है.
पंजाब की राजनीति में इसे लेकर चर्चा होती रही है कि सुखबीर बादल दूसरी पार्टियों के विद्रोहियों के मार्फ़त वोट में सेंध लगाते रहे हैं.
उन्हें सबसे बड़ा फ़ायदा इसका मिलता है कि वे अपनी पार्टी के अकेले कमांडर हैं जबकि दूसरी पार्टियों में कोई फ़ैसला लेना इतना आसान नहीं होता.

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वे किसी बिज़नेस टाइकून की तरह ताक़त को केंद्रीकृत करके रखना चाहते हैं.
उन्होंने अमरीका में बिज़नेस मैनेजमेंट और पंजाब यूनिवर्सिटी से इकॉनमिक्स की पढ़ाई की है. राजनीति में उन्हें अचानक उस वक़्त आना पड़ा जब उन्होंने देखा कि उनके पिता की विरासत दूर जा रही है.
उन्होंने 1990 के दशक के मध्य में राजनीति में क़दम रखा.
उनके पास ढेर सारे आइडियाज़ होते हैं, जिसमें से कुछ पहली नज़र में मूर्खतापूर्ण लगते हैं.
सुखबीर बादल ने हाल ही में एक हास्यास्पद घोषणा की थी कि वे ऐसे बस चलाएंगे जो सतलज नदी पर तैरते हुए जाएंगे. विपक्ष ने इसका खूब मज़ाक उड़ाया था.
उन्होंने इस घोषणा को एक चुनौती के रूप में लिया और हरीक पक्षी अभयारण्य में चलाने के लिए यूरोप से ऐसी दो बसें लाने के लिए ठेका जारी किया.
उन्होंने मुंहतोड़ जवाब देते हुए व्यंग्य में कहा, "मैं कांग्रेस के लोगों को इस बस में तैरने के लिए निमंत्रित करूंगा और बीच में ही उन्हें डूबो दूंगा."

वो अपने परिवार का काफ़ी ख्याल रखते हैं. उनकी पत्नी हरसिमरत कौर मोदी के कैबिनेट में मंत्री हैं.
वहीं हरसिमरत के भाई बिक्रम मजीठिया पंजाब सरकार कैबिनेट में सुखबीर के साथ मंत्री हैं. सुखबीर की बहन के पति आदेश प्रताप भी कैबिनेट में हैं.
उनकी पत्नी ने एक इंटरव्यू में कहा कि जब सुखबीर घर पर होते हैं, तो बच्चों के साथ खेलते हैं, फ़िल्में देखते हैं और उनके लिए खाना भी बनाते हैं.

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लेकिन शक्ति के केंद्रीकरण को लेकर वो काफ़ी गंभीर रहते हैं. उन्होंने अपने चचेरे भाई मनप्रीत बादल को पार्टी में हाशिए पर धकेल दिया था.
खुद को अपने चाचा प्रकाश सिंह बादल के उत्तराधिकारी के तौर पर पेश करने वाले मनप्रीत बादल अब कांग्रेस से जुड़े हैं.
सुखबीर कभी हार नहीं मानते. ऐसा दिखता है कि वे राज्य सरकार के लिए मुसीबतें मोल लेते हैं लेकिन वे इससे उबरने के लिए अपनी भरसक कोशिश करते हैं.
वो अपने पिता के उलट न समय के पाबंद हैं, न जोड़तोड़ करने वाले हैं और न नियमित हैं.
उनसे मिलने वाले कभी-कभी अपने आप को अपमानित महसूस करते हैं क्योंकि वे समय का ख्याल नहीं रखते.
उन्हें घंटों इंतज़ार करना पड़ सकता है और इसके बावजूद भी वे अपने पिता की तरह अकेले में नहीं मिलते लेकिन वे ज़्यादातर समय नए और प्रभावकारी आइडियाज़ खोजने में लगाते हैं.

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सुखबीर सिंह बादल के व्यक्तित्व का एक नायाब पहलू यह है कि वे नए साल की शाम स्वर्ण मंदिर जाते हैं. वे विदेशों में भी रहते हैं इस मौक़े पर अमृतसर लौट आते हैं.
आने वाले चुनाव में उनकी ज़िंदगी की सबसे कठिन परीक्षा होने जा रही है. उनके सामने एक ऐसा प्रतिद्वंदी है, जिसके बारे में उन्हें ज़्यादा कुछ पता नहीं है.
मुमकिन है कि आम आदमी पार्टी के कारण सुखबीर के लिए वोट बांटना मुश्किल हो जाए. वे योजना बना रहे हैं कि कैसे अकाली विरोधी वोटों को बांटा जाए ताकि कोई उनके उम्मीदवारों को चुनौती न दे पाए.
लेकिन 'आप' उन बिखरे हुए वोटों को इकट्ठा करने को लेकर आशंकित है, जिसका समीकरण किसी भी निर्वाचन क्षेत्र में फ़िट नहीं बैठता है.
सुखबीर, अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार में 1998 और 1999 में उद्योग राज्य मंत्री थे. वे 2008 में पार्टी के अध्यक्ष बने और 2009 में उप मुख्यमंत्री.
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