'251 रुपए में तो मेमोरी कार्ड भी नहीं आएगा'

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- Author, प्रशांतो कुमार रॉय
- पदनाम, वरिष्ठ टेक्नोलॉजी लेखक
बुधवार को भारत की एक अनजान सी कंपनी ने नई दिल्ली में 'दुनिया का सबसे सस्ता स्मार्टफ़ोन' लॉंच किया. इसका नाम है फ़्रीडम 251. इसकी क़ीमत है 251 रुपए.
दिल्ली के नज़दीक नोएडा में स्थित रिंगिंग बेल्स नाम की एक साल से भी पुरानी कंपनी के इस 3जी हैंडसेट की कीमत के फ़ीचर्स इससे 15 गुना महंगे किसी फ़ोन जैसे हैं.
गुरुवार को इसकी वेबसाइट (फ़्रीडम251 डॉट कॉम) एडवांस के साथ बुकिंग के लिए खुली (फ़ोन पांच दिन तक ऑनलाइन बेचा जाएगा). लेकिन एकसाथ इस वेबसाइट पर इतने लोग पहुंचे कि वह क्रैश हो गई.
इसके बाद वेबसाइट पर एक नोटिस चस्पा की गई, इसमें लिखा था छह लाख हिट्स प्रति सेकेंड के भारी उत्साह की वजह से बुकिंग को एक दिन के लिए रोक दिया गया है.
फ़ोन की डिलीवरी जून तक की जाएगी. कंपनी के ऑफ़िस पर भी हज़ारों संभावित ख़रीदार पहुंच गए.

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कंपनी के संस्थापक मोहिल गिल ने कहा है कि मोदी सरकार की महत्वाकांक्षी 'मेक इन इंडिया' योजना के तहत इस फ़ोन को यहीं बनाया जाएगा.
फ़्रीडम 251 को भाजपा के वरिष्ठ नेता और सांसद मुरली मनोहर जोशी ने लॉंच किया, हालांकि रक्षा मंत्री को भी इस कार्यक्रम में शामिल होना था. लेकिन वो हुए नहीं.
मीडिया को जो प्रोटोटाइप दिखाए गए वह एक चीन में बने फ़ोन के थे. उसके ब्रांडनेम एडकॉम को सफ़ेद रंग से पेंट कर दिया गया था. चार इंच के डिस्प्ले वाला एंड्रॉएड फ़ोन एेपल के आईफ़ोन 4 की तरह दिख रहा था, जिसके होम बटन और आइकंस पूरी तरह आईफ़ोन जैसे थे.
एडकॉम तकनीकी सामान आयात करने वाली एक कंपनी है. इसका आइकन 4 फ़ोन ई-कॉमर्स वेबसाइट फ़्लिककार्ट पर उपलब्ध है. इस फ़ोन के फ़ीचर्स बिल्कुल फ़्रीडम 251 जैसे हैं. हालांकि 'हिंदुस्तान टाइम्स' अख़बार के अनुसार एडकॉम के मार्केटिंग हेड ने फ़्रीडम 251 हैंडसेट के साथ किसी तरह के सहयोग की जानकारी से इनकार किया है.

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जिन विशेषज्ञों ने फ्रीडम 251 के सैंपल को परखा है, उनका कहना है कि 480×800 डिस्प्ले समेत इसका प्रदर्शन करीब साढ़े तीन हज़ार रुपए के एंट्री लेवल फ़ोन जैसा है. भारत में बिकने वाले मध्यम क़ीमत वाले फ़ोनों की तरह इसमें भी दो सिम कार्ड और मेमोरी कार्ड के लिए स्लॉट दिया गया है.
साफ़ है कि इतने कम दाम के लिए फ़्रीडम 251 को सब्सिडी दी जा रही है. कंपनी किसी तरह की सरकारी सब्सिडी से इनकार करती है. उसका कहना है कि बड़े पैमाने पर उत्पादन अंततः कम दाम को बराबर कर देगा.
हालांकि टेलीकॉम के उत्पादन उद्योग के विशेषज्ञ इससे सहमत नहीं हैं.
यूपीए सरकार के कार्यकाल में भारत सरकार को सस्ते टैबलेट आकाश की आपूर्ति करने वाले डाटाविंड के सीईओ सुनीत सिंह तुली कहते हैं कि फ़ोन के सामान की लागत ही इसके दाम की आठ गुना तक होगी.

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वो कहते हैं, "मेमोरी कार्ड जैसे सामान की कीमत अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में 251 रुपए से ज़्यादा है. इसलिए बड़े पैमाने पर उत्पादन कभी भी 251 तक नहीं पहुंच सकता."
बिना बाहरी सब्सिडी के रिंगिंग बेल्स कंपनी चलेगी कैसे? विशेषज्ञों का कहना है कि हो सकता है कि बाद में यह कुछ ऐसे हैंडसेट लॉंच करे जिनकी कीमत ज़्यादा हो, ताकि घाटे को पूरा किया जा सके.
इसके अलावा महत्वपूर्ण बात यह है कि कंपनी एडवांस बुकिंग से बड़ी मात्रा में नक़द जुटा लेगी, जिसके लिए उसे चार महीने बाद डिलीवरी करनी है.
एनेलिस्ट फ़र्म साइबर मीडिया रिसर्च (सीएमआर) के मुताबिक़ 2015 में भारत में बिकने वाले 94 फ़ीसदी फ़ीचर फ़ोन दो हज़ार रुपए से कम के थे. साफ़ है कि भारत में सस्ते फ़ीचरफ़ोन के लिए बड़ा बाज़ार है.
दूसरी ओर स्मार्टफ़ोन की कीमतों में बड़ा अंतर आया है. लेकिन सबसे ज़्यादा बिके चार से छह हज़ार रुपए की क़ीमत वाले फ़ोन. साल 2015 में भारत में बिके स्मार्टफ़ोन में इनका हिस्सा 22 फ़ीसद का है.

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यह 3,000 रुपए से नीचे के सबसे सस्ते फ़ोनों के मुकाबले ज़्यादा बिके. इसलिए स्मार्टफ़ोन के बाज़ार में सबसे सस्ता, सबसे ज़्यादा नहीं बिकता.
लेकिन बाजार का अर्थशास्त्र कहता है कि सामान्य कीमत में 'आप जितना पैसा देते हैं, वैसा माल मिलता है'. यह बात बहुत ज़्यादा सब्सिडी वाले मॉडलों के मामले में अलग हो सकती है. अगर ख़रीदार देखेंगे कि 4,000 रुपए के मॉडल पर 90 फ़ीसद सब्सिडी मिल रही है तो वह इस पर टूट पड़ेंगे.
सीएमआर के विश्लेषक फ़ैसल कावूसा कहते हैं, "ऐसे में कंपनी के सामने सबसे बड़ी चुनौती बड़े पैमाने पर उत्पादन का प्रबंधन करने की होगी. यह नई कंपनी है जिसका इलेक्ट्रॉनिक सामान के उत्पादन का कोई इतिहास नहीं है. ऐसे में यह उसके लिए आसान नहीं होगा."
कावूसा कहते हैं कि कंपनी के पास संभवतः भारत में फ़ोन बेचने के लिए ज़रूरी पंजीकरण भी नहीं है. हालांकि भारत सरकार की वेबसाइट में चीनी कंपनी, शेनज़ेन एचएसईएम, में बने 'फ़्रीडम' फ़ोन को बेचने के लिए पंजीकरण नज़र आता है.
फ़्रीडम 251 के विक्रेता कम से कम तीन उत्पादों को देखकर कुछ सबक़ ले सकते हैं.

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दुनिया की सबसे सस्ती कार टाटा की नैनो जब 2009 में एक लाख रुपए में लॉंच हुई थी, तो पूरी दुनिया में तहलका मच गया था. लेकिन बाज़ार की प्रतिक्रिया उतनी उत्साहजनक नहीं रही. आज सात साल बाद नैनो भारत में सबसे ज़्यादा बिकने वाली दस गाड़ियों में भी नहीं हैं.
विश्वसनीयता और आपूर्ति के अलावा यह भी दिक्क़त रही कि लॉंच के बाद से इसकी क़ीमत दो गुने से भी अधिक हो गई. भारत की सबसे ज़्यादा बिकने वाली दस गाड़ियों में से केवल तीन ही सस्ती, एंट्री लेवल गाड़ियां थीं.
दूसरा है ऐपल सबसे महंगे आईफ़ोन के भारत में न बिकने की वजह से इसने सस्ते दाम पर पुराने आईफ़ोन बेचने की रणनीति अपनाई. इसने पांच साल पुराने आईफ़ोन 4एस क़रीब 10 हज़ार रुपए में बेचने शुरु किए.

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लेकिन यह रणनीति नाकाम हो गई. भारतीय ख़रीदारों ने 'पुराने सस्ते फ़ोन' की रणनीति को ख़ारिज कर दिया. इस वजह से ऐपल भारत में स्मार्टफ़ोन बाज़ार के केवल एक फ़ीसद हिस्से पर ही कब्ज़ा कर पाया.
और अंततः दुनिया के सबसे सस्ते टैबलेट कंप्यूटर कहे गए आकाश की बात, जिसे यूपीए सरकार ने पूरा समर्थन दिया था.
शुरुआत में इसके कमज़ोर फ़ीचर्स के लिए इसकी भारी आलोचना की गई. जब 2012 में इसका अपग्रेडेड वर्ज़न आकाश 2 आया तो इसे कॉलेज के विद्यार्थियों को मात्र 1,130 रुपए में बेचा गया. यक़ीनन इसमें कर माफ़ी और 50 फ़ीसद सब्सिडी का योगदान था.
लेकिन सरकारों के बीच अंतर, फ़ैसले लेने में देरी, आपूर्ति की समस्याओं और अंततः 2014 में सरकार बदलने से यह परियोजना रद्द हो गई. हालांकि इसके आपूर्तिकर्ता ने इस टैबलेट को अपने ब्रांड नाम यूबीस्लेट ब्रांड के नाम से करीब साढ़े पांच हज़ार रुपए में लॉंच किया.

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ख़रीदारों की रुचि की वजह से यह भारत के सबसे ज़्यादा बिकने वाले पांच टैबलेट में शामिल हो गया, जिसमें सिर्फ़ एक ही गैर-भारतीय ब्रांड सैमसंग शामिल था (एेपल का बाज़ार हिस्सा भारत में बहुत कम है).
डाटाविंट अब यूबीस्लेट डॉट कॉम के ज़रिए टैबलेट के 15 मॉडल बेचता है जिनकी कीमत सवा तीन से सवा दस हज़ार रुपए तक है. कंपनी का कहना है कि उसने 2012 से अब तक 25 लाख यूनिट बेचे हैं.
तुली कहते हैं, "2011 में भारत के टैबलेट बाज़ार में केवल ढाई लाख टैबलेट ही बेचे जाते थे. एक किफ़ायती उत्पाद की वजह से बाज़ार 20 गुना बड़ा हो गया."
मज़ेदार बात यह है कि आकाश टैबलेट के रूप में सरकार की सब्सिडी वाली योजना तो नाकाम हो गई. लेकिन बग़ैर सब्सिडी वाला मॉडल चल निकला.
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