पंचायत चुनावों में रसूख़दारों का दबदबा क़ायम

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- Author, बद्री नारायण
- पदनाम, समाजशास्त्री, बीबीसी हिंदी के लिए
उत्तर प्रदेश में पंचायत चुनाव के नतीजे आ गए हैं. इस चुनाव में अधिकतर उन लोगों की जीत हुई है जिनके पास ताक़त है जो सत्ता में पहले से बने हुए हैं. विजयी लोगों में ज़्यादातर मंत्रियों-विधायकों के रिश्तेदार और रसूखदार लोग हैं.
साल 1992 में जब पंचायती राज एक्ट बना था तो माना गया था कि सत्ता का प्रसार कमजोरों और निर्बलों तक होगा, जनतंत्र में निर्बलों की सहभागिता बढ़ेगी. लेकिन शक्तिशाली, रसूखदार और बड़े लोगों ने राज्य के देहातों में भी स्थानीय सत्ता के तमाम रास्तों पर कब्ज़ा कर लिया है.
दरअसल पंचायती राज एक्ट ने पंचायतों को बड़ी ताकत दी है. सरकार अपने पैसे के एक बड़े भाग का वितरण ज़मीन पर पंचायत प्रधानों के ज़रिए करती है.
छोटी से छोटी ग्राम सभाओं में भी कम से कम 20 लाख से ज़्यादा रुपया ख़र्च करने के लिए आता है. यह रकम बड़ी ग्राम सभाओं में 50 लाख तक भी हो जाती है. यह पैसा प्रधान के खाते में सीधे आता है.

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ग्राम प्रधान के तीन खाते होते हैं - एक कच्ची सड़क और ग्रामीण इंफ्रास्ट्रक्चर के खर्च का, दूसरा मनरेगा का, तीसरा प्राइमरी स्कूल के मेंटेनेंस और मिड डे मील आदि का.
स्थानीय प्रशासन की हनक, छोटी बड़ी अनेक औपचारिक-अनौपचारिक सुविधाओं और विकास कार्यो में प्रभावकारी हस्तक्षेप के साथ, विकास के लिए सीधी आने वाली यह राशि प्रधान पद पर बड़े और रसूखदार लोगों को ललचाती है.
प्रधान के पास सीधा आने वाला पैसा और इसे कैश में ख़र्च करने की छूट भ्रष्टाचार को बढ़ावा देता है. ग्राम सभाओं के माध्यम से भ्रष्टाचार का खुला खेल उत्तर प्रदेश के ग्राम पंचायत चुनाव में दिखाई पड़ा है.

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इस पंचायत चुनाव में प्रधान पद के प्रत्याशियों ने 5-5 लाख तक की राशि बहाई है. हमारे अपने सर्वेक्षण, मीडिया रिपोर्ट आदि से ज़ाहिर होता है कि प्रत्येक मत के लिए 500 से 1500 रुपये तक खर्च किए गए. चांदी के सिक्के, मीट की दुकान से फ्री मीट और शराब जमकर बंटे.
ऐसे में इन पंचायत चुनावों से कुछ निष्कर्ष निकाले जा सकते हैं.
एक तो वे सब जिनके पास धन बल, बाहुबल नहीं था, वे सब हाशिये पर थे. पंचायत चुनाव में जिनके पास ऐसी क्षमता विकसित नहीं हो पाई है, वे इसमें भागीदार नहीं हो सकते.
इस ग्रामीण अभिजात्य तबके का एक बड़ा भाग ‘एबसेंटी लैंडलॉर्ड’ की तरह शहरों में रहता है और कभी-कभी गाँव आता है.
ऐसे में उसका अपने क्षेत्रों में विकास से कोई मतलब नहीं होता. सत्ता से आने वाले इस धन को हड़पने की बढ़ती होड़ ने इस बार पंचायत चुनाव में बड़े पैमाने पर हिंसा को जन्म दिया है.

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हत्या, अपहरण, धमकी, बूथ कब्जा अनेक तरह से शक्तियों के विकेंद्रीकरण की प्रक्रिया का अपहरण कर लिया गया है. हमारे यहाँ राज्य और जनतंत्र के प्रसार का इतिहास हमें बताता है कि भ्रष्टाचार एवं हिंसा का चोली दामन का संबंध है.
इस चुनाव ने हमें यह भी बताया है कि जनतंत्र अपने साथ ताक़त और साधनों के प्रसारण की प्रक्रिया के साथ भ्रष्टाचार और हिंसा का प्रसार भी करता है.
यहाँ एक नैतिक प्रश्न भी खड़ा होता है कि जो लोग जनता के इस धन पर बुरी नज़र के साथ ही चुनाव में आ रहे हैं, वे इसका सही इस्तेमाल करेंगे कैसे?
मांस वितरण करने के लिए अगर गिद्ध को दे दिया जाए तो क्या वह लोगों तक पहुँच पाएगा? गिद्ध माँस को खुद ही खा जाएगा.
संभव है इन चुने गए पंचायत प्रधानों का एक वर्ग विकास को ज़मीन तक ले जाना चाहता हो, लेकिन फिर भी यह शंका बनी हुई है कि जनतंत्र के प्रसार की इस प्रक्रिया में हम अब तक कितना जनतांत्रिक बन पाए हैं.
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