क्या भारतीय संसद 'फेल' हो गई है?

इमेज स्रोत, AP
- Author, बैजयंत 'जय' पांडा
- पदनाम, संसद सदस्य
बहुत से भारतीय मानते हैं कि विधायी गतिरोध और रोज़ के हंगामे की वजह से संसद का औचित्य ही नहीं रह गया है. वह सही हैं, लेकिन आंशिक रूप से ही सही.
संसद के निचले सदन लोक सभा के गठन के लिए अब भी चुनाव महत्वपूर्ण हैं, जो यह तय करता है कि भारत पर शासन कौन करेगा. कोई भी चुनावी प्रक्रिया के औचित्य पर सवाल नहीं उठाता.
करीब सात दशक से भारत का निर्वाचन आयोग स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनाव करवाता रहा है और वास्तव में लगातार इस प्रक्रिया में सुधार करता रहा है.
पिछले साल के आम चुनाव में भारी जीत दर्ज कर नरेंद्र मोदी की भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) पिछले तीन दशक में पूर्ण बहुमत पाने वाली पहली पार्टी तो बन गई लेकिन उनकी सरकार के एजेंडे को लगातार बाधित किया जा रहा है.

इमेज स्रोत, PTI
सरकार की सबसे बड़ी बाधा भारत की द्विसदनीय व्यवस्था में ऊपरी सदन राज्यसभा में बहुमत की कमी है.
इसके एक तिहाई सदस्य हर दो साल बाद चुने जाते हैं- जिन्हें आम जनता नहीं राज्य विधानसभाएं चुनती हैं, जिससे इसे जनता के पहले के मत के अनुसार प्रतिनिधित्व मिलता है.
लेकिन 1911 में सुधार किए जाने से पहले के हाउस ऑफ़ लॉर्ड्स की तरह राज्य सभा लोक सभा के पारित विधेयकों को लटका सकती है और पूरी तरह रोक भी सकती है.
और इस समय ठीक यही हो रहा है, सभी सरकारी विधेयक ऊपरी सदन में अटके हुए हैं. पिछले साल के चुनावों के बाद भले ही कांग्रेस लोक सभा में बित्ता भर रह गई हो लेकिन राज्यसभा में अब भी वह निर्णायक स्थिति में है.
फ़िलहाल तो सरकार 2016 और 2018 में होने वाले राज्यसभा चुनावों का इंतज़ार करने के सिवा बमुश्किल ही कुछ कर सकती है.
लेकिन त्रासदी यह है कि लोक सभा में भी, जहां इसे पूर्ण बहुमत हासिल है, सरकार अक्सर अपने मन की नहीं करवा पाती.

इमेज स्रोत, PTI
वह इसलिए कि पिछले कुछ सालों से विपक्षी दलों का हंगामा करना जैसे मानदंड बन गया है.
बेशक सदन में व्यवस्था बनाए रखने के लिए नियम भी हैं लेकिन उन्हें विरले ही कभी लागू किया जाता है. दरअसल बहुत कम बार जब सदन अध्यक्ष ने हंगामे के लिए सदस्यों को निलंबित किया है तो उन्हें कड़ी आलोचना का सामना करना पड़ा है.
इसका अर्थ यह हुआ कि 543 सदस्यीय लोक सभा में मात्र 45 सीटों वाली कांग्रेस हो-हल्ला मचाकर सदन को चलने नहीं देती, ठीक उसी तरह जैसा कि विपक्ष में रहते हुए भाजपा किया करती थी. अन्य छोटी पार्टियां भी इस मामले में पीछे नहीं हैं.
इस सबकी वजह से बड़े नीतिगत निर्णयों से जुड़ी विधायी प्रक्रिया धीमी हो गई है और संसद में महीनों और कई बार तो सालों तक कटु गतिरोध बना रहता है, जो बमुश्किल ही कभी ख़त्म हो पाता है. इसके दो परिणाम होते हैं.
पहला तो यह कि काम कर रही सरकार को वह निर्णय करने पड़ते हैं जिनके लिए संसद की अनुमति की आवश्यकता नहीं होती.

इमेज स्रोत, AFP
इससे भी महत्वपूर्ण यह होता कि यह शासन में एक रिक्तता पैदा कर देता है जिसे सक्रिय न्यायालय भरता है.
और तो और हाउसिंग कॉलोनियों में सफ़ाई और कूड़े के निस्तारण, पार्किंग की दरें तय करने और त्यौहारों के दौरान लाउडस्पीकर और पटाखों के इस्तेमाल पर प्रतिबंध जैसे छोटे-छोटे प्रबंधन के कामों में भी उच्चतम न्यायालय को हस्तक्षेप करना पड़ता है.
जो सही मायनों में विधायिका की भूमिका है उसके ज़ब्त हो जाने से इसके और संविधान के अन्य स्तंभों के बीच शक्ति संतुलन गड़बड़ा जाता है. इसलिए यह अचरज की बात नहीं कि बहुत से लोग खुलकर संसद के औचित्य पर आश्चर्य जताने लगे हैं.

इमेज स्रोत, AFP
इस तरह की बुदबुदाहट मुख्यतः दो तरह के भारतीय करते हैं: एक तो व्यावसायिक समुदाय है और दूसरा लगातार महत्वाकांक्षी होता जा रहा मध्य वर्ग.
पहला तो चीन की निर्णय क्षमता से रश्क करता है, जिसकी जो अर्थव्यवस्था कभी भारत के बराबर हुआ करती थी वह अब कुछ ही दशक में पांच गुना बड़ी हो गई है.
हालांकि अब भारत की अर्थव्यवस्था चीन के बजाय सबसे तेज़ी से बढ़ती अर्थव्यवस्था हो गई है लेकिन यहां व्यवसाय करना अब भी घरेलू और विदेशी दोनों निवेशकों के लिए मुश्किल है.
इसी तरह मध्यवर्ग है जो लेखक और पूर्व संपादक टीएन निनाम के अनुमान के अनुसार चीन के अलावा किसी भी अन्य देश की आबादी से अधिक है. इसकी भी उम्मीदें और सूचना तक पहुंच अब वैश्विक हो गई है.

इमेज स्रोत, AFP
इसे हताशा होती है जब यह भारत को अपनी असीम क्षमताओं और इस तरह इसकी संभावनाओं को खुद ही कमज़ोर करता है. वह भी एक अधिक निर्णायक सरकार के लिए तड़प रहा है और देख रहा है कि संसद इसमें बाधा बन रही है.
हालांकि बड़ा भले ही हो भारत का मध्यवर्ग आबादी का एक चौथाई से कुछ ही अधिक है. अलबत्ता चुनाव के दौरान गरीब भारतीयों के मुकाबले इसका मत प्रतिशत बहुत कम रहता है.
लेकिन अब यह बदल रहा है. मध्यवर्ग तेज़ी से बढ़ रहा है और भ्रष्टाचार और अन्य मुद्दों पर बढ़ते आंदोलनों ने राजनीतिक मुद्दों पर इसकी भागीदारी को पुनर्जीवित किया है.
जल्द ही यह पर्याप्त लोक सभा सीटों पर इतनी मजबूत स्थिति में आ जाएगा कि सांसदों को इसकी उम्मीदों और संवेदनाओं के अनुरूप काम करना पड़ेगा.
इससे पहले विवाद सार्वजनिक स्तर तक सीमित रहते थे और निजी स्तर पर सौहार्द रहता था लेकिन अब हम देख रहे हैं कि विरोधात्मक संबंधों में निजी कड़वाकट भी घुल रही है.

इमेज स्रोत, PTI
इससे पार पाना बहुत मुश्किल भी नहीं है जैसा कि पिछले हफ़्ते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने पूर्ववर्तियों के पास जाकर दिखाया. ऐसा लगता है कि इस वजह से संसद उम्मीद के मुकाबले बेहतर ढंग से चली है.
लेकिन गहराई में जाएं तो संसद के औचित्य के पुनर्निर्माण की व्यवस्थागत बाधाएं अधिक जटिल हैं और इन्हें दूर करने में लंबा समय लगेगा.
अन्य लोकतंत्रों में राजनीतिक सुधारों के लिए बरसों सार्वजनिक बहस और आंदोलन हुए हैं और भारत भी कुछ अलग नहीं है.
(बैजयंत 'जय' पांडा बीजू जनता दल के सांसद हैं)
<bold>(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए <link type="page"><caption> आप यहां क्लिक</caption><url href="https://play.google.com/store/apps/details?id=uk.co.bbc.hindi" platform="highweb"/></link> कर सकते हैं. आप हमें <link type="page"><caption> फ़ेसबुक</caption><url href="https://www.facebook.com/bbchindi" platform="highweb"/></link> और <link type="page"><caption> ट्विटर</caption><url href="https://twitter.com/BBCHindi" platform="highweb"/></link> पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)</bold>












