बल्ला नहीं जिता पाता रोटी का खेल

कश्मीर, बैट उद्योग

इमेज स्रोत, Majid Jahangir

    • Author, माजिद जहांगीर
    • पदनाम, कश्मीर से, बीबीसी हिंदी के लिए

फ़िरदौस अहमद बट 15 साल से भारत प्रशासित कश्मीर में क्रिकेट के बल्ले बनाने के कारखाने में काम करते हैं.

कुछ साल पहले तक फ़िरदौस इस काम से महीने भर में 15 हज़ार रुपये तक कमा लेते थे, पर कड़ी मेहनत के बावजूद अब उनके हाथ महीने में मुश्किल से पांच हज़ार रुपये ही आते हैं.

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वे बताते हैं, "जब मैं इस काम में आया था तब अच्छी कमाई थी. अब इससे गुज़ारा करना मुश्किल हो गया है. हमारे परिवार में आठ लोग हैं, जिनके पेट भी पूरी तरह से 5,000 रुपये में नहीं भर पाते."

उनका कहना है, "मैं बल्ले की लकड़ी चीरने से लेकर बल्ले को तैयार करने तक का हर काम करता हूं, लेकिन हासिल कुछ नहीं. पांच हज़ार में आज के ज़माने में क्या मिलता है?"

पिछले कुछ समय से फ़िरदौस यह काम छोड़ने पर विचार कर रहे हैं.

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उन्होंने कहा, "मैं तीन साल से बल्ले बनाने का काम छोड़ने का मन बना रहा हूं. खर्चे बहुत सारे हैं और कमाई ज़रा सी, तो इस काम में बने रहने का फ़ायदा ही क्या है."

फ़िरदौस चाहते थे कि वह अपने दो बच्चों को अंग्रेज़ी स्कूल में पढ़ाएं, लेेकिन यह हो नहीं सका. उन्हें तकलीफ़ है कि उनके छोटे भाइयों की पढ़ाई भी पूरी नहीं हो सकी.

वे बताते हैं, "पिछले साल पैसे की कमी की वजह से उनके एक छोटे भाई को आठवीं में ही पढ़ाई छोड़नी पड़ी. अब वह मज़दूरी कर रहा है."

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फ़िरदौस का कहना है कि जबसे मार्केट में अंग्रेज़ी बल्ले आ गए हैं, तबसे उनका काम ज़्यादा प्रभावित हुआ है. जो बल्ला वे पांच साल पहले 5,000 रुपये में बेचते थे, अब वह 2,000 रुपये में भी नहीं बिकता. इसका सीधा असर कारखानों में काम करने वालों पर पड़ रहा है.

अनंतनाग के इस इलाक़े में बल्ले बनाने के क़रीब 100 कारखाने हैं, जहां हज़ारों लोग इस कारोबार से जुड़े हैं.

कारखानों के मालिक सरकार की ओर से किसी तरह की मदद न मिलने की शिकायत करते हैं.

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स्पोर्ट्स एसोसिएशन संगम के प्रमुख गुलाम हसन बट बताते हैं, "सरकार लंबे समय से कह रही है कि बल्ले के कारखानों को उद्योग का दर्जा मिलेगा, पर आज तक कुछ नहीं हुआ. हमारे कारखानों के लिए 24 घंटे बिजली का इंतज़ाम नहीं है. सफ़ेदे के पेड़ लगाने पर सरकार ने प्रतिबंध लगा दिया, जो हमारे काम के लिए एक बड़ा नुक़सान है."

वह बताते हैं, "बल्ले बनाने का सामान बहुत महंगा हो गया है. बाढ़ आई तो सरकार ने कोई मदद नहीं की."

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पिछले साल बाढ़ की वजह से गुलाम हसन बट के कारखाने में 25 लाख रुपये का नुक़सान हुआ था.

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