'हड़ताल से नुकसान, पर विकल्प क्या है?'

इमेज स्रोत, Bilal Bakshi
- Author, माजिद जहांगीर
- पदनाम, श्रीनगर से, बीबीसी हिन्दी डॉटकॉम के लिए
भारत प्रशासित कश्मीर में भारत विरोधी प्रदर्शनों और आम हड़ताल का सिलसिला बीते 27 वर्षों से जारी है.
घाटी में सक्रिय अलगाववादी गुट आए दिन हड़ताल बुलाते हैं. ये कश्मीर को भारत से आज़ाद कराने का आंदोलन चलाने का दावा करते हैं.
जम्मू-कश्मीर पुलिस के आंकड़ों के मुताबिक़, अलगाववादी गुटों के कहने पर कश्मीर में इस साल जनवरी से अब तक कुल 24 दिन हड़ताल रही है.
कश्मीर चेम्बर ऑफ़ कॉमर्स ने इस मामले पर कुछ आंकड़े भी जुटाए हैं.
कश्मीर चेम्बर ऑफ़ कॉमर्स के प्रमुख मुश्ताक़ अहमद वाणी ने बताया, "वर्ष 2014 में 17 दिन की हड़ताल से कश्मीर के कारोबार को 1800 करोड़ का नुकसान उठाना पड़ा था. बीते दो वर्षों में ये कुल 4500 करोड़ रूपये पहुंच चुका है.''

इमेज स्रोत, Bilal Bakshi
मगर अहमद कहते हैं कि हड़ताल करना हर किसी का हक़ है.
पटरी पर कपड़े बेचने वाले नज़ीर अहमद मीर कहते हैं, "हड़ताल तो हम अपनी मर्ज़ी से करते हैं, कोई ज़ोर-ज़बरदस्ती नहीं करता, लेकिन आज तक हड़ताल से कोई नतीजा सामने नहीं आया और आगे भी कोई रोशन भविष्य नज़र नहीं आ रहा है."
कश्मीर इक्नोमिक अलायंस के अध्यक्ष मोहमद यासीन खान कहते हैं, "इसमें कोई शक नहीं कि रोज़-रोज़ की हड़तालों से कश्मीर की अर्थव्यवस्था को भारी नुक़सान हो रहा है, लेकिन अपना विरोध दर्ज कराने का हमारे पास कोई दूसरा रास्ता भी नहीं है.''

इमेज स्रोत, Bilal Bakshi
राज्य के परिवहन मंत्री अब्दुल गनी कोहली कहते हैं, ''दुनिया के हालात पर नज़र डालें तो आज तक कभी भी हड़ताल से कोई मसला हल नहीं हुआ है. हड़ताल से आम आदमी की रोज़ी-रोटी पर बुरा असर पड़ता है. हड़ताल होती है तो यहां पर्यटक नहीं आते. भारत सरकार को अलगाववादी नेताओं से बात करनी चाहिए.''
वहीं वरिष्ठ पत्रकार शेख़ क़ैयूम कहते हैं, ''हड़ताल आख़िर क्यों होती है. हड़ताल प्रदर्शन का एक तरीक़ा है और जब किसी जगह सेना की इतनी बड़ी तादाद हो तो हड़ताल और प्रदर्शनों के सिवा और कुछ नहीं किया जा सकता.''
वे कहते हैं, ''जब तक बुनियादी मसला हल नहीं होता, तब तक हड़ताल होती रहेगी. कोई अलगाववादी नेता डंडा लेकर किसी के पीछे नहीं जाता कि तुम हड़ताल करो, हर कोई अपनी मर्ज़ी से हड़ताल करता है."
अलगाववादी नेता और जम्मू कश्मीर डेमोक्रेटिक फ्रीडम पार्टी के अध्यक्ष शबीर अहमद शाह का मानना है, ''कश्मीर में लगातार बंद से जो नुकसान आम कश्मीरियों को उठाना पड़ता है, उसका हमें अहसास है लेकिन शांतिप्रिय प्रदर्शन का ये सबसे अच्छा तरीका है क्योंकि सड़कों पर प्रदर्शन की इजाज़त नहीं है.''

इमेज स्रोत, Bilal Bakshi
वहीं 21 वर्षीय छात्रा कोरत कहती हैं, ''इसमें कोई शक नहीं कि हड़ताल से हमें नुकसान होता है. पढ़ाई पर भी असर पड़ता है, लेकिन ये भी ज़रूरी है कि हम जुल्म के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाएं. भारत सरकार बड़े बड़े वादे करती है लेकिन फिर मुकर जाती है. उसे कश्मीर को आज़ाद छोड़ देना चाहिए. जब तक इसका फ़ैसला नहीं हो जाता, ये हड़ताल जारी रहेगी.''
<bold>(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप <link type="page"><caption> यहां क्लिक</caption><url href="https://play.google.com/store/apps/details?id=uk.co.bbc.hindi" platform="highweb"/></link> कर सकते हैं. आप हमें <link type="page"><caption> फ़ेसबुक</caption><url href="https://www.facebook.com/bbchindi" platform="highweb"/></link> और <link type="page"><caption> ट्विटर</caption><url href="https://twitter.com/BBCHindi" platform="highweb"/></link> पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)</bold>












