कश्मीर में हिंदी का अकेला अख़बार

'कश्मीर प्रभात' अख़बार

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    • Author, माजिद जहांगीर
    • पदनाम, श्रीनगर से, बीबीसी हिन्दी डॉटकॉम के लिए

पांच साल पहले रफ़ी रज़ाक़ी ने ठान लिया था कि वह पत्रकारिता की दुनिया में कुछ ऐसा करेंगे जो कश्मीर में पहले किसी ने नहीं किया हो.

उन्होंने उर्दू-अंग्रेजी अख़बार को छोड़ कश्मीर से हिंदी अख़बार को बाज़ार में लाना चाहा.

कुछ दिन की दौड़-धूप के बाद आख़िरकार रफ़ी ने 'कश्मीर प्रभात' के नाम से साप्ताहिक हिंदी अख़बार निकालना शुरू किया जो अभी तक ब्लैक एंड व्हाईट में छप रहा है.

कश्मीर प्रभात का दफ़्तर श्रीनगर के बाल गार्डन इलाक़े में है.

बिना सरकारी मदद

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हालाँकि अभी तक अख़बार के ख़रीदारों की तादाद बहुत नहीं है, तो भी रफ़ी इस बात पर खुश हैं कि उनके अख़बार की तादाद 1,000 तक हो गई है, जिसकी उनको उम्मीद नहीं थी.

अपने अख़बार को रफ़ी कश्मीर से बाहर भारत के दूसरे शहरों तक भी पहुंचाते हैं.

रजिस्ट्रार न्यूज़पेपर्स ऑफ़ इंडिया के आंकड़ों के मुताबिक़, जम्मू कश्मीर में 114 हिंदी अख़बारों का रजिस्ट्रेशन हैं जिनमें से कश्मीर में सिर्फ़ एक हिंदी अख़बार निकलता है, जबकि बाक़ी अख़बार या पत्रिका जम्मू से छपते हैं, या जिनका सिर्फ़ रजिस्ट्रेशन ही है, प्रकाशन नहीं.

रफ़ी का कहना है कि सरकार ने आज तक उनके अख़बार को एक पैसे की मदद नहीं की.

रग-रग में हिंदी

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ये जानते हुए कि कश्मीर में हिंदी पढ़ने वालों की संख्या बहुत ही कम है, यहां से हिंदी अख़बार शुरू करने की क्या वजह है?

वो कहते हैं, "पहली बात ये है कि मैंने स्कूल के समय में हिंदी पढ़ी थी जिसकी मोहब्बत आज भी मेरे रग-रग में है. दूसरी वजह ये रही कि मैं पत्रकारिता की दुनिया में हट कर कुछ करना चाहता था. कश्मीर में उर्दू और अंग्रेज़ी अख़बारों की भरमार है, तो मैंने सोचा कि मैं हिंदी अख़बार शुरू करूँ, जिसकी मुझे कमी महसूस हो रही थी."

रफ़ी ने हिंदी की शिक्षा कश्मीरी पंडित शिक्षकों से हासिल की है. 1990 में हथियारबंद आंदोलन शुरू होने के साथ ही कश्मीर से लाखों की तादाद में पंडित चले गए.

हिंदी को सिर्फ़ एक भाषा मानने पर ज़ोर देते हुए रफ़ी का कहना है कि भाषा को सिर्फ भाषा समझना चाहिए, ना कि उसे किसी जात या धर्म से जोड़ना चाहिए.

नहीं था आसान

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कश्मीर से हिंदी का अख़बार निकालना रफ़ी के लिए कोई आसान काम नहीं था.

वो कहते हैं, "आप शायद यक़ीन नहीं करेंगे कि जब मैं पहली बार कश्मीर के सूचना दफ़्तर में हिंदी का अख़बार लेकर गया, तो वहाँ अख़बार फेंक दिया गया."

रफ़ी को अब कुछ तसल्ली है कि जो लोग उनके अख़बार को फेंकते थे, वे अब उनके अख़बार को ढूँढ़ते हैं.

रफ़ी अपनी जेब से अख़बार का खर्च चलाते हैं. अभी तक उनको किसी भी सरकारी दफ्तर से विज्ञापन नहीं मिला है.

वे बताते हैं, "मेरी कोशिश हमेशा यह रहती है कि मैं ऐसी ख़बरों को सामने लाऊँ जो विकास से जुड़ी हों, जो विवाद से अलग हों. राजनीतिक ख़बरों को भी मैं जगह देता हूं. तब भी यही कोशिश रहती है कि मैं कश्मीर की सकारात्मक ख़बरों को सामने लाऊँ, कश्मीर में अच्छी चीज़ें भी होती हैं."

चुनौती

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वरिष्ठ पत्रकार नवीन नवाज़ कश्मीर में हिंदी पत्रकारिता करने को एक चुनौती मानते हैं.

वो कहते हैं, "सबसे बड़ी चुनौती कश्मीर में हिंदी पत्रकारिता के लिए यह है कि कश्मीर में ज्यों ही हिंदी अख़बार दिखता है तो ये समझा जाता है कि ये भारत का अख़बार है और शायद ये कश्मीर में भारत का मिशन चला रहा है."

नवीन बताते हैं, "दूसरी चुनौती यह है कि सरकार भी हिंदी अख़बारों के लिए कश्मीर में कुछ नहीं करती."

इसके बावजूद नवीन नवाज़ मानते हैं कि कश्मीर में 'कश्मीर प्रभात' का शुरू होना एक अच्छा क़दम है.

वे आगे बताते हैं, "ऐसा नहीं है कि कश्मीर में हर कोई हिंदी से दूर भागता है. लोग चाहते हैं कि हिंदी अख़बार भी उनकी ख़बर को जगह दे. यहाँ के लोग बॉलीवुड की फिल्में देखते हैं, उसी तरह वो हिंदी अख़बारों में अपनी ख़बर देखना चाहते हैं."

"शर्त सिर्फ़ ये है कि हिंदी अख़बार उनकी ख़बरों को सही अंदाज़ में पेश करें. ऐसा हो तो हिंदी के लिए कश्मीर में एक माहौल बन सकता है."

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