कश्मीर हो या पेशावर, भारत ही निशाने पर

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- Author, अशोक कुमार
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
पाकिस्तानी मीडिया में संयुक्त राष्ट्र महासभा के बहाने कश्मीर को लेकर भारत पर निशाना साधा गया है, वहीं अफ़ग़ानिस्तान में भी उसकी ‘सरगर्मियों’ पर सवाल उठाए गए हैं.
रोज़नामा ‘वक़्त’ लिखता है कि पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ साफ़ कर चुके हैं कि पाक-भारत संबंधों के सिलसिले में कश्मीर एक बुनियादी मुद्दा है और इसे संयुक्त राष्ट्र में उठाया जाएगा.
अख़बार लिखता है कि कश्मीर को लेकर दोनों देशों के बीच तीन लड़ाइयां हो चुकी हैं, इसलिए पाकिस्तान चाहता है कि भारत कश्मीर समेत हर मुद्दे पर बात करे, क्योंकि समस्याएं बातचीत से ही सुलझ सकती हैं, जंगों से नहीं.
अख़बार ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय से कहा है कि वो भारत की आक्रामता पर ध्यान दे और कश्मीर मुद्दे के हल के लिए ‘अपनी क़िस्मत का फैसला ख़ुद करने के कश्मीरियों के हक़’ पर अमल कराए.
कश्मीर में रायशुमारी

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दैनिक ‘जंग’ लिखता है कि संयुक्त राष्ट्र के प्रस्तावों के मुताबिक़ कश्मीर भारत और पाकिस्तान के बीच विवाद वाला इलाक़ा है जहां जनता को रायशुमारी के ज़रिए भारत या पाकिस्तान में शामिल होने का फ़ैसला करना है.
अख़बार लिखता है कि हर साल पाकिस्तान के स्वतंत्रता दिवस 14 अगस्त को घाटी में पाकिस्तानी झंडे लहराए जाने और भारत के स्वतंत्रता दिवस 15 अगस्त को काला दिवस के रूप में मनाए जाने से इस रायशुमारी का नतीजा साफ़ हो जाता है. इसलिए भारत ने इस रायशुमारी से बचने के लिए कश्मीर को अपना अटूट अंग बताया है.
उधर ‘एक्सप्रेस’ लिखता है कि नवाज़ शरीफ़ के कार्यकाल का ये उनका तीसरा भाषण होगा जब वो ये बताने की कोशिश करेंगे कि क्षेत्र में शांति के लिए कश्मीर विवाद हल करना कितना ज़रूरी है.
‘ भारत ने मदद से भरमाया’

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उधर रोज़नामा ‘पाकिस्तान’ ने पाकिस्तानी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार सरताज अज़ीज़ के इस बयान को प्रमुखता दी है कि पेशावर में सैन्य एयर बेस पर हुए हमले के सिलसिले में सबूत जमा करके अफ़ग़ानिस्तान को सौंपे जाएंगे.
अख़बार लिखता है कि ये ज़िम्मेदारी अफ़ग़ानिस्तान की है कि वो पता लगाए कि उसकी सरज़मीन में कहां-कहां पाकिस्तान विरोधी दहशतगर्द छिपे हैं.
अख़बार की टिप्पणी है कि ऐसा महसूस होता है कि भारत ने अफ़ग़ानिस्तान को अपनी मदद में भरमा रखा है और इसलिए वहां उसकी सरगर्मियों पर अफ़ग़ानिस्तान का कोई कंट्रोल नहीं है.
उधर दैनिक ‘दुनिया’ का संपादकीय है - नाराज़ बलोच नेताओं से बातचीत में अहम प्रगति.
अख़बार लिखता है कि नाराज़ बलोच नेताओं को राष्ट्रीय मुख्यधारा में लाने की सरकार की कोशिशों के सकारात्मक परिणाम सामने आने लगे हैं.
इस सिलसिले में अख़बार ने दर्जनों बलोच लड़ाकों के हथियार छोड़ हिंसा से तौबा करने का ज़िक्र किया और लिखता है कि स्वनिर्वासन में रहने वाले बचोल नेता भी समझ रहे हैं कि अब हिंसक मुहिम के लिए हालात ठीक नहीं हैं.
नेपाल के हालात

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रुख़ भारत के उर्दू अख़बरों का करें तो ‘सहाफ़त’ अख़बार ने नेपाल में नया संविधान लागू होने और उसके बाद भारत-नेपाल रिश्तों में आई तल्खी को अपने संपादकीय का विषय बनाया है.
अख़बार कहता है कि काठमांडू में भारतीय दूतवास को पिछले दिनों इस बात का खंडन करना पड़ा कि गृह मंत्री राजनाथ सिंह ने मधेसी लोगों की हिंदुस्तानी होने की हैसियत से रक्षा करने की बात कही है.
अख़बार कहता है कि इस खंडन से इतना तो साफ़ है कि अन्य नेपालियों के मुक़ाबले भारत को मधेसी लोगों की ज़्यादा चिंता है, लेकिन नेपाल साफ़ कर चुका है कि देश में नया संविधान लागू करना उसका अंदरूनी मामला और इसमें कोई बाहरी दख़ल नहीं होना चाहिए.
वहीं ‘जदीद ख़बर’ लिखता है कि नेपाल में शांतिपूर्ण हालात भारत के लिए अहम हैं क्योंकि नेपाल ऐसा सरहदी देश हैं जहां अशांति के आसार ज़्यादा हैं.
अख़बार के मुताबिक़ नेपाल के कुछ गुटों के संबंध पड़ोसी चीन से होना भारत के लिए पहले ही चिंता का विषय है.
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