घड़ी बम क्या तोप भी बरामद हो जाती: पाक मीडिया

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- Author, अशोक कुमार
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
पेशावर के एयरबेस पर हुए हमले और भारत-पाक तल्ख़ी के अलावा अमरीकी बच्चे अहमद की पाकिस्तानी उर्दू मीडिया में बीते हफ़्ते ख़ासी चर्चा रही.
‘एक्सप्रेस’ अख़बार का संपादकीय है, 'अमरीका में एक मुसलमान लड़के की वाहवाही.'
अख़बार लिखता है कि 14 वर्षीय अहमद ने तो अपनी बनाई घड़ी ये सोचकर टीचर को दिखाई कि शाबाशी मिलेगी, लेकिन गोरे टीचर ने उसे बम समझकर अहमद को पुलिस के हवाले कर दिया.
अख़बार के मुताबिक़, जब जांच में पता चला कि वो बम नहीं, बल्कि नए तरीक़े की डिजिटल घड़ी है तो सोशल मीडिया पर अहमद की शोहरत हर तरफ़ फैल गई.
अख़बार लिखता है कि अब अहमद को व्हाइट हाउस से लेकर नासा और फ़ेसबुक तक की तरफ़ से अपनी नायाब घड़ी के साथ आने के न्यौते मिल रहे हैं.
शोहरत की बुलंदियों पर

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रोज़नामा ‘पाकिस्तान’ ने इस सिलसिले में पाकिस्तानी जांच एजेंसियों के तौर तरीक़ों पर सवाल उठाया है.
अख़बार लिखता है कि अगर अहमद को पाकिस्तान में इस संदेह में गिरफ़्तार किया जाता तो घड़ी बम तो छोड़ो एक तरफ़, उससे तोप भी बरामद कर ली जाती.
अख़बार ने इस मामले को मिसाल बताते हुए पाकिस्तानी जांच एजेंसियों को इससे सबक़ लेने की नसीहत दी है.
वहीं ‘उम्मत’ ने अहमद को नासा की तरफ़ से स्कॉलरशिप दिए जाने की ख़बर को प्रमुखता से छापा है.
अख़बार लिखता है कि अमरीकी टीचरों के नस्लवाद और नफ़रत भरे सलूक ने अहमद को शोहरत की बुलंदियों पर पहुंचा दिया है.
बातचीत की बात

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‘नवा-ए-वक़्त’ ने पाकिस्तानी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार सरताज अज़ीज़ के इस बयान को तवज्जो दी है कि न्यूयॉर्क में पाकिस्तान और भारत के प्रधानमंत्रियों की मुलाक़ात तभी हो सकती है, जब भारत इसके लिए दरख़्वास्त करेगा.
रोज़नामा ‘इंसाफ़’ कहता है कि अगर भारत मुलाक़ात की बात करता है तो पाकिस्तान को कश्मीर पर बातचीत की शर्त रखनी चाहिए क्योंकि इसी तरह पाकिस्तान अपनी पक्ष को सही और मज़बूती से रख सकता है.
दोनों देशों के बीच तनाव पर ‘जसारत’ लिखता है कि जब से भारत में मोदी सरकार बनी है, उसकी पहली प्राथमिकता यही दिखती कि कश्मीर समस्या को ख़त्म कर दिया जाए और नियंत्रण रेखा को ही अंतरराष्ट्रीय सीमा बना दिया जाए.
दूसरी तरफ़, पिछले दिनों पाकिस्तानी वायुसेना के एक ठिकाने पर हुए हमले पर ‘मशरिक़’ का संपादकीय है, 'पेशावर पर ख़ौफ़ के साए.'
अख़बार लिखता है कि पोलियो की दवा पिलाने वाली टीमों पर हमले तो आम बात बन गए हैं, बावजूद इसके सैन्य बेस पर हमला बताता है कि जब तक रणनीति आला दर्जे की नहीं होगी, तब तक कुछ नहीं, भले ही सड़कों पर कितने भी पुतले खड़ कर लिए जाएं.
चुनावी तस्वीर पर नज़रें

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रुख़ भारत का करें तो बिहार के आगामी चुनाव पर ‘जदीद ख़बर’ का संपादकीय है, 'कांटे की टक्कर.'
अख़बार लिखता है कि चुनावी लड़ाई में आरजेडी और कांग्रेस को साथ लेकर नीतीश कुमार ने बीजेपी के कैंप में सनसनी फैला दी और इसीलिए प्रधानमंत्री को बिहार के लिए बड़े पैकेज का एलान करना पड़ा.
अख़बार की टिप्पणी है कि ‘सबका साथ सबका विकास’ का नारा देने वाले मोदी की छवि अब सिर्फ़ बात करने वाले प्रधानमंत्री की रह गई है.
अख़बार लिखता है कि शुरुआती सर्वेक्षणों में तो नीतीश को बीजेपी से आगे दिखाया जा रहा है, लेकिन देखना है कि आगे आगे बिहार में कैसी चुनावी तस्वीर उभरती है.
वहीं ‘क़ौमी तंज़ीम’ ने बिहार के चुनाव को कांग्रेस का इम्तिहान बताया है.
अख़बार ने आंकड़ों के साथ राज्य में कांग्रेस की घटती ताक़त का ब्यौरा देते हुए लिखा है कि इसके बाद या तो ख़ात्मे का सफ़र होगा या वापसी का.
‘छोटी सोच’

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‘हमारा समाज’ ने मराठी बोलने वालों को ही ऑटो रिक्शा का लाइसेंस देने के महाराष्ट्र सरकार के फ़ैसले की ओलचना की है.
अख़बार ने इसे छोटी सोच बताते हुए लिखा है कि इसका मक़सद यही है कि राज्य में मराठी न बोलने वालों को काम न मिले.
अख़बार कहता है कि ये फ़ैसला संविधान की उस व्याख्या के विपरीत है जो लोगों को देश में कहीं भी जाकर बसने और काम करने का हक़ देती है.
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