आरटीआई: कमज़ोरों का सबसे ताक़तवर हथियार?

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- Author, अरुणा रॉय, निखिल डे
- पदनाम, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
आज से ठीक दस साल पहले 12 अक्तूबर 2005 को भारत में सूचना का अधिकार यानी आरटीआई लागू हुआ.
आरटीआई के इस्तेमाल से नागरिकों को जानकारी के आधार पर फ़ैसले करने का मौक़ा मिला. लोकतंत्र की जड़ें और गहरी हुईं.
आम जनता ने अपनी सार्वभौमिकता का प्रयोग पांच साल में एक बार वोट डाल कर ही नहीं, बल्कि मनमर्ज़ी की सत्ता पर सवालिया निशाना लगा कर भी किया.
इच्छा के मुताबिक़ सत्ता का इस्तेमाल करने वालों से परेशान लोग अब बात-बात में कहते है, 'आरटीआई लगा देंगे'.
अनुमान है कि हर साल लगभग 50-80 लाख आरटीआई अर्ज़ियां डाली जाती हैं. इससे इस क़ानून की लोकप्रियता साबित होती है.
पारदर्शिता का ख़तरा किसको?

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निहित स्वार्थों को पारदर्शिता से कितना ख़तरा है, यह इससे साबित होता है कि आारटीआई का इस्तेमाल करने वाले 45 से ज़्यादा लोगों की हत्या हो चुकी है.
भारत में शासन का स्वरूप इससे आंका जाएगा कि आरटीआई के पहले और इसके बाद क्या स्थिति थी.
साधारण भारतीयों ने यह अधिकार पाने के लिए वर्षो संघर्ष किया, उनका इसमें कितना योगदान है, यह समझना महत्वपूर्ण है.
सूचना की मांग अपनी सादगी की वजह से बेजोड़ थी.
सूचना के अधिकार के लिए संघर्ष कर रहे लोगों ने सबसे पहले 1990 के दशक में राजस्थान में सड़क पर होने वाले ख़र्च का ब्योरा मांगा.
उन्होंने अस्पतालों में जीवन रक्षक दवाओं और ग़ायब हो रहे राशन के बारे में भी जवाब मांगा. इससे सत्ता को ज़बरदस्त झटका महसूस हुआ.
पंचायत से संसद तक

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आरटीआई का असर पंचायत से लेकर संसद तक साबित हो गया. इससे लाल फ़ीताशाही दूर करने और अफ़सरशाही की टालमटोल के रवैए को दूर करने में मदद मिली.
इसने नीतियां तय करने और उन्हें लागू करने में गहरी पैठ बना चुके निहित स्वार्थो की भूमिका को उजागर कर दिया. इसने बड़े पैमाने पर होने वाले भ्रष्टाचार को चालू रखने में उनकी कोशिशों को भी कमज़ोर कर दिया.
आरटीआई आंदोलन ने एक प्रभावी और लोकप्रिय बहस छेड़ दी, जिसमें अपनी बात लोगों तक पंहुचाने के लिए गीतों और नारों का सहारा लिया गया.
"हमारा पैसा, हमारा हिसाब" और "हम जानेंगे, हम जिएंगे" जैसे नारों ने जीने के मौलिक हक़ और सूचना के अधिकार के बीच के जोड़ को और मज़बूत किया.
आरटीआई चीज़ों को बदलने वाले अधिकार के रूप में देखा गया.
आरटीआई को लागू करने से अधिकारों से जुड़े दूसरे क़ानूनों की मांग भी की जाने लगी. इससे लोगों के अंदर ही पारदर्शिता और उत्तरदायित्व भी बढ़ा. सार्वजनिक ऑडिट यानी जन सुनवाई से उपजा सामाजिक ऑ़डिट लोकतांत्रिक शासन का हिस्सा बनता जा रहा है.
सोशल ऑडिट

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नियंत्रक और महालेखाकार (सीएजी) ने इस साल ऐलान कर दिया कि सोशल ऑडिट औपचारिक ऑडिट का हिस्सा बनेगा. दुनिया के दूसरे हिस्सों में भी सोशल ऑडिट फैल रहा है.
आरटीआई "कमज़ोरों का सबसे ताक़तवर हथियार" बन गया है. इसने विधायिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका पर सवाल उठाने के लिए हर जगह नागरिकों को ताक़त दी है.
इसने सरकारों के हर तरह के बुरे कामों को उजागर किया है. इससे बुनियादी सेवाओं, ज़मीन, खनन और 2-जी और कोयला ब्लॉक बांटने जैसे घोटालों को सबके सामने लाने में मदद मिली है.
पर अधिकार आधारित क़ानूनों पर हो रहे हमले को देखते हुए आने वाला समय कठिन है. इस क़ानून को बदनाम करने के लिए ब्लैकमेल करने वालों और कुछ सनकी लोगों के कामों को बढ़ा-चढ़ा कर पेश किया जा रहा है.
यूपीए और एनडीए, दोनों सरकारों ने ही आरटीआई को कमज़ोर करने की कोशिशें कीं. उन्होंने संशोधन लाने में देर कर या सूचना आयुक्त की नियुक्ति में मनमर्ज़ी कर इसे कमज़ोर किया है.
नरेंद्र मोदी सरकार ने मुख्य सूचना आयुक्त के पद को आठ महीने तक ख़ाली छोड़ दिया. सूचना आयुक्त के आदेशों की अनदेखी कर सभी राजनीतिक दलों ने आरटीआई की अवहेलना की है.
अदालत की हिचक

अदालत की तरह ही आयोगों में भी कई साल तक देर होती है. अदालत ने भी यह दिखाया है कि वे अपने बारे में जानकारी देने में कितना हिचकते हैं. जजों की जायदाद का ऐलान करने के बारे में सुप्रीम कोर्ट ने ख़ुद ही अपील कर दी है.
उम्मीद है कि आरटीआई को लागू करने में आ रही तमाम दिक़्क़तों के बावजूद पारदर्शिता का युग बना रहेगा. अब लड़ाई शिकायत दूर करने से जुड़े क़ानून, व्हिसलब्लोअर क़ानून और लोकपाल क़ानून को पारित करने और उन्हें लागू करने को लेकर है.
आरटीआई के तहत ख़ुद डिसक्लोज़र करने और विधेयक पेश करने से पहले इसकी प्रक्रिया में लोगों को शामिल करने का मामला अभी भी तय नहीं हुआ है.
बहुत कुछ इस बात पर निर्भर करता है कि लोग कितने जागरुक और मुखर हैं. बीते दस साल के अनुभव से ये तो साफ़ हो गया है कि भारतीय नागरिक चौंकन्ने, सक्रिय और बोलने वाले हैं. उनकी आवाज़ को और मज़बूत किया जाना चाहिए क्योंकि सच्ची साझेदारी वाले लोकतंत्र बनाने के लिए यही हमारी बुनियादी उम्मीद है.
(अरुणा राय और निखिल डे सामाजिक कार्यकर्ता हैं. वे एमकेएसएस और एनसीपीआरआई के संस्थापक सदस्य हैं.)
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