'राजनीतिक दल आरटीआई के दायरे में नहीं होने चाहिए'

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भाजपा के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार राजनीतिक दलों को सूचना के अधिकार (आरटीआई) कानून के दायरे में लाने के ख़िलाफ़ है.
एक जनहित याचिका की सुनवाई कर रहे सुप्रीम कोर्ट को सरकार ने बताया कि 'सार्वजनिक संस्थान' के नाम पर राजनीतिक दलों को आरटीआई के दायरे में लाने से उनके सहज संचालन पर असर पड़ेगा.
समाचार एजेंसी पीटीआई के मुताबिक सरकार का कहना है कि इतना ही नहीं, इससे राजनीतिक विरोधियों को बुरे इरादों के साथ जानकारियां हासिल करने का हथियार भी मिल जाएगा.
सोमवार को सुप्रीम कोर्ट में दिए गए हलफ़नामे में कार्मिक और प्रशिक्षण विभाग (डीओपीटी) ने कहा कि जब आरटीआई कानून लागू हुआ था तो यह नहीं सोचा गया था कि राजनीतिक दलों को पारदर्शिता लाने वाले इस कानून के तहत लाया जाएगा.
'भ्रामक निष्कर्ष'

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हलफ़नामे में कहा गया है कि जन प्रतिनधित्व कानून (आरपीए) 1951 और आयकर अधिनियम में राजनीतिक दलों के वित्तीय मामलों में पारदर्शिता लाने के लिए ज़रूरी प्रावधान हैं.
सरकार ने यह हलफ़नामा अदालत के नोटिस के जवाब में दिया, जो एक जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान जारी किया गया था.
इस याचिका में भाजपा, कांग्रेस, वाम दलों समेत सभी राष्ट्रीय, क्षेत्रीय राजनीतिक दलों को 'सार्वजनिक संस्था' घोषित करते हुए उन्हें आरटीआई कानून के दायरे में लाने की मांग की गई थी.
सरकार ने कहा है कि केंद्रीय सूचना आयुक्त (सीआईसी) ने आरटीआई कानून की धारा 2 (एच) की 'काफ़ी उदार व्याख्या' की है जिससे यह 'भ्रामक' निष्कर्ष निकला कि राजनीतिक दल सार्वजनिक संस्थाएं हैं.
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