तमिलनाडुः भ्रष्टाचार पर भारी शराब बंदी मुद्दा

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- Author, इमरान क़ुरैशी
- पदनाम, बेंगलुरू से, बीबीसी हिंदी डॉट कॉम के लिए
तमिलनाडु में शराब बंदी का मुद्दा ज़ोर पकड़ता जा रहा है और लगता है कि अगले साल मई में होने वाले राज्य विधानसभा चुनावों में भ्रष्टाचार का मुद्दा पीछे चला जाएगा.
एआईएडीएमके की प्रतिद्वंद्वी पार्टियां और गैर सरकारी संस्थाएं जिस तरह से शराब बंदी को लेकर राज्य भर में लगातार अभियान चला रही हैं, उससे इसकी संभावना बढ़ गई है.
आम तौर पर राज्य में भ्रष्टाचार और श्रीलंकाई तमिलों का भावनात्मक मुद्दा बाकी सभी मुद्दों पर हावी रहा है.
मुख्यमंत्री जयराम जयललिता के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट में चलने वाला आय से अधिक संपत्ति का मामला विवाद का मुख्य विषय बना रहा है.
वरिष्ठ राजनीतिक वरिश्लेषक भगवान सिंह ने बीबीसी से बातचीत में कहा, “प्रतिबंध लगाने की मांग सबसे बड़ा मुद्दा बनेगा क्योंकि तमिलनाडु में कोई और मुद्दा है ही नहीं.”
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हालांकि कुछ महीने पहले तक पूरे राज्य के स्तर पर पाबंदी का मुद्दा दूर दूर तक नहीं था.
स्कूलों और धर्मस्थलों के पास शराब की सरकारी खुदरा दुकानों के खोले जाने का विरोध आम तौर पर स्थानीय स्तर तक सीमित था.
लेकिन नाबालिग बच्चों के शराब पीने से संबंधित दो वीडियो सामने आने के बाद राज्य में एक किस्म का आक्रोश पैदा हो गया है.
पहले वीडियो में किशोरों का समूह एक चार साल के बच्चे को जबरदस्ती शराब पिलाता दिखाई देता है.
दूसरे वीडियो में हाईस्कूल की दो छात्राएं नशे में सड़क किनारे बेसुध दिखाई देती हैं.
अन्य राज्यों से उलट तमिलनाडु में शराब पीने को लेकर राज्य स्तर पर कोई वैज्ञानिक अध्ययन भी नहीं है.
शराब और आत्महत्या

अगर कुछ अध्ययन हुए हैं तो वो चेन्नई और वेल्लूर तक सीमित हैं और यहां भी इसे आत्महत्या और दिल की बीमारियों के नज़रिए से ही देखा गया है.
आदमियों में शराब पीने की लत और महिलाओं में निराशा और आत्महत्या की प्रवृत्ति को लेकर चेन्नई में आद्या गुप्ता और अन्य द्वारा अध्ययन किया गया.
अध्ययन में शामिल 15 साल या इससे ऊपर के 62 प्रतिशत पुरुषों ने शराब पीने की बात स्वीकारी.
इनमें 28 प्रतिशत लोगों ने सप्ताह में दो बार शराब पीने की बात मानी जबकि 43 प्रतिशत लोगों में नुक़सान और लत लगने की हद तक शराब पीने की प्रवृत्ति पाई गई.
अध्ययन के नतीजे में कहा गया, “आदमियों में शराब की लत और पत्नियों में आत्महत्या की प्रवृत्ति एक दूसरे से जुड़े हुए दिखते हैं.”
लेकिन अब इस मुद्दे पर राजनीतिक तेज हो गई है.
पिछले अगस्त में एक शराब की दुकान के ख़िलाफ प्रदर्शन के दौरान शराब बंदी का अभियान चलाने वाले ससी पेरुमल की विवादित मौत ने राजनीतिक पार्टियों को इस मुद्दे पर ध्यान देने के लिए मज़बूर कर दिया.
एआईडीएमके को घेरने की कोशिश

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पीएमके के नेता डॉ. अंबुमनि रामदास कहते हैं, “यह बहुत ख़तरनाक़ स्थिति है. बच्चों का वीडियो ये दिखाता है कि तमिलनाडु में यह पीढ़ी पूरी तरह बर्बाद हो गई है. केवल शराब पर पूर्ण प्रतिबंध ही कुछ मदद कर सकता है. केरल की तरह सॉफ़्ट अल्कोहल की इजाज़त देने से काम नहीं चलेगा क्योंकि यह ख़तरे के निशान तक पहुंच गया है.”
डॉ. अंबुमनि ही वो व्यक्ति हैं, जिन्होंने केंद्र में एनडीए की सरकार में मंत्री रहते सार्वजनिक जगहों पर धूम्रपान को ग़ैरक़ानूनी बनाने में अहम भूमिका निभाई थी.
राजनीतिक विश्लेषक भी मान रहे हैं कि अन्य बड़ी द्रविड़ पार्टियों के मुक़ाबले पीएमके पाबंदी को लेकर लगातार अभियान चलाती रही है.
अतीत में भी एआईएडीएमके और डीएमके ने शराब बंदी पर प्रतिबंध का वादा किया लेकिन जब वो सत्ता में आए तो अपने वादे से धीरे धीरे पीछे हट गए.
अगर एआईएडीएमके की प्रतिद्वंद्वी सभी पार्टियां शराब बंदी के अभियान में शामिल हो गई हैं तो इसकी बेहद सामान्य वजह है.
महिलाओं के बीच एआईएडीएमके की सबसे अधिक वोट साझेदारी है.
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