'संघ में बौद्धिकता का अकाल है'

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- Author, नीलांजन मुखोपाध्याय
- पदनाम, 'नरेंद्र मोदीः दि मैन, दि टाइम' किताब के लेखक
बीते साल सितंबर के शुरू में मैं जब लोकसभा टेलीविज़न पर ‘अ पेज फ़्रॉम हिस्ट्री’ की एंकरिंग कर रहा था, मैंने दीनदयाल उपाध्याय पर एक एपिसोड करने का फ़ैसला किया.
ऐतिहासिक बहसों, घटनाओं और हस्तियों को टेलीविज़न पर दिखाने वाला यह देश का अकेला कार्यक्रम था.
मेरे फ़ैसले के पीछे दो वजहें थीं. पहला यह कि लोकसभा टीवी जैसे चैनलों से दोनों पक्षों को रख सकने की उम्मीद की जाती थी.

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जब कांग्रेस से जुड़े महात्मा गांधी, जवाहर लाल नेहरू, मौलाना आज़ाद और मदन मोहन मालवीय पर कार्यक्रम हो सकता था तो मौजूदा सत्ता के बड़े नेता पर क्यों नहीं?
दीन दयाल जन्मशती

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दूसरी बात यह थी कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने ऐलान कर दिया था कि उपाध्याय की जन्मशती के कार्यक्रम की शुरूआत जल्द ही की जाएगी.
अमूमन हमें तीन ग़ैर-राजनीतिक विशेषज्ञों की ज़रूरत होती थी. ऐसे लोग जिन्हें विषय की जानकारी हो और जो उपाध्याय के राजनीतिक और आर्थिक विचारों पर बोल सकते हों.
कार्यक्रम का चरित्र द्वीपक्षीय रखने के लिए अलग-अलग तरह के विचार रखने वालों की ज़रूरत होती थी, ऐसे जो उपाध्याय के प्रति सहानुभूति रखते हों और ऐसे भी जो संघ परिवार के इस नेता के आलोचक नहीं तो कम से कम निष्पक्ष ज़रूर हों.
बौद्धिकता की कमी

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निष्पक्ष राजनीतिक विशेषज्ञ खोजना कोई कठिन काम नहीं था. पर ऐसे विशेषज्ञ को ढूंढना मुश्किल ज़रूर था जो उपाध्याय के विचारों, ख़ास कर भारतीय राजनीति में उनके सबसे महत्वपूर्ण देन-एकात्म मानववाद को अच्छी तरह जानता हो.
मैंने कुछ वरिष्ठ नेताओं से भी बात की. उन्होंने माना कि संघ परिवार में बौद्धिकता की काफ़ी कमी है.
ख़ैर, कार्यक्रम की रिकार्डिंग हो गई. लेकिन एक विशेषज्ञ हिंदी में बोले. इससे मुझे कोई दिक़्क़त नहीं हुई, क्योंकि मैं दोनों भाषाएं जानता हूँ. पर इससे संघ परिवार में मौजूद कमी साफ़ हो गई.
बाद में ‘अ पेज फ़्रॉम हिस्ट्री’ कार्यक्रम को बंद कर दिया गया.
आरएसएस में विमर्श नहीं

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आरएसएस (राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ) की स्थापना के 90 साल हो रहे हैं. पर नौ दशक में संघ परिवार या आरएसएस में बौद्धिक बहस सीमित रही है. जब कभी दूसरे विचारधाराओं के लोगों को अपनी ओर लाने की कोशिश होती, इसकी मुद्रा आक्रामक हो जाती है.
यह ऊंचे स्तर के वक्ताओं के साथ-साथ निचले स्तर के वक्ताओं पर समान रूप से लागू होता है. इसे इंटरनेट पर बयानों के नमूनों से समझा जा सकता है.
ये बयान उन लोगों के हैं, जो गाली-गलौच को लेकर काफ़ी उदार हैं, पर बौद्धिक बहस में कुछ नहीं जोड़ते.
साल 2014 में चुनाव के प्रचार की तैयारी करते हुए भारतीय जनता पार्टी ने बड़ी तादाद में ऐसे लोगों का समर्थन हासिल कर लिया था, जो शेख़ी बघारने वाले कट्टरपंथी नहीं थे. वे मोदी से प्रभावित थे.

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इसकी वजह यह थी कि वे अच्छी तरह जानते थे कि हिंदुत्व तो मोदी का बस एक रणनीतिक कार्ड है जिसका इस्तेमाल उन्होंने 2002 में किया था.
उनका मानना था कि मोदी दरअसल एक उदार नेता हैं जो विकास के एजेंडे को लेकर गंभीर हैं.
बुद्धिजीवियों का समर्थन

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बुद्धिजीवियों के साथ-साथ मध्यम वर्ग और कामगार तबक़े का समर्थन भी मोदी को समान रूप से हासिल था.
मोदी सरकार के लिए राय बनाने वालों के उत्साह में बीते कुछ महीनों में काफ़ी कमी आई है. निष्पक्ष स्तंभकारों के अलावा सहानुभूति रखने वाले थिंक टैंक से जुड़े लोगों में यह समान रूप से देखा जा रहा है.

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यह समस्या उन लोगों में ज़्यादा नहीं है जो मोदी और आरएसएस से उनके बेहतर दिनों में जुड़े हैं.
इसी तरह ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो समय के साथ-साथ अपना रवैया बदलते रहते हैं क्योंकि वे ‘सिस्टम’ से मिलने वाले फ़ायदे पर निर्भर रहते हैं.
हर निज़ाम इस तरह के लोगों को जगह देता है, इसलिए ऐसे लोग आसानी से अपनी स्थिति बदलते रहते हैं.
ऐसे लोगों की कमी नहीं है जो यूपीए सरकार के गुण गाते थे और अब आरएसएस के सिद्धांतों और भाजपा नेताओं को सलाह देने वाले नेताओं की भी तारीफ़ करते हैं.
आरएसएस बना शक्ति केंद्र

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आरएसएस अब किसी कोठरी में बंद पड़ा संगठन नहीं रहा. अब यह भारत की पहली ग़ैर-कांग्रेसी बहुमत वाली सरकार को पीछे से चलाने वाला शक्ति का केंद्र है.
मोदी सरकार को इन लोगों से यह उम्मीद नहीं करनी चाहिए कि वे आसानी से सरकार की हर बात को मान लेंगे. उन्हें बुद्धिजीवियों के साथ विचार-विमर्श करना चाहिए.

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सरकार और संघ परिवार को यह समझना चाहिए कि वे भले ही सत्ता में हों, बौद्धिक मुख्यधारा में आने के लिए उन्हें बहस मुबाहिसे को बढ़ावा देना होगा.
जिन लोगों ने मोदी शिविर को छोड़ दिया है, उनमें वैसे लोगों की तादाद ज़्यादा है जो वहां किसी भी तरह की विमर्श की कमी और अलग-अलग विचारों का गला घोंटने की प्रवृत्ति से पूरी तरह निराश हैं.
इस रवैया से सरकार और संघ परिवार को नुक़सान ही होगा.
(ये लेखक के निजी विचार हैं. इस बहस का दूसरा पक्ष अगली कड़ी में.)
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