1965: जनरल जिसने नहीं माना सेनाध्यक्ष का आदेश

जनरल हरबख़्श सिंह

इमेज स्रोत, BBC World Service

    • Author, रेहान फ़ज़ल
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली

जब पाकिस्तान ने छंब सेक्टर में हमला किया तो जनरल चौधरी चाहते थे कि पाकिस्तान का सामना अख़नूर से आगे बढ़ कर किया जाए.

लेकिन जनरल हरबख़्श सिंह ने चौधरी से कहा कि आप सरकार से मुझे अंतरराष्ट्रीय सीमा पार कर लाहौर की तरफ़ बढ़ने की अनुमति दिलवाइए.

MAP40512239जनरल चौधरी और जनरल हरबख़्श सिंह का वो शो डाउनजनरल चौधरी और जनरल हरबख़्श सिंह का वो शो डाउन1965 के भारत पाक यु्द्ध के पचास साल पर रेहान फ़ज़ल की ख़ास पेशकश. आज सुनिए इसकी 16वीं कड़ी.2015-09-16T19:08:58+05:302015-09-16T20:03:34+05:302015-09-16T20:03:34+05:302015-09-16T20:03:34+05:30PUBLISHEDhitopcat2

जनरल चौधरी कुछ हिचकिचा रहे थे. लेकिन जनरल हरबख़्श सिंह ने इस पर ज़ोर देते हुए कहा कि अगर आप सरकार से ये बात नहीं कह सकते तो मुझे प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री से मिलने की अनुमति दीजिए.

अंतत: उन्हें 3 सितंबर को पंजाब में बढ़ने की अनुमति मिली.

हरबख़्श सिंह अपनी आत्मकथा 'इन द लाइन ऑफ़ ड्यूटी' में लिखते हैं, "इस बीच पाकिस्तान को ये आभास देने के लिए कि हम अख़नूर पर उसके हमले का जवाब देने जा रहे हैं, मैंने अपने इंजीनयरों को पठानकोट-अख़नूर सड़क की मरम्मत करने और जम्मू तवी के ऊपर के पुल को और मज़बूत करने के आदेश दिए."

"इसका पाकिस्तान पर क्या असर पड़ा मैं कह नहीं सकता, लेकिन इतना ज़रूर कह सकता हूँ कि तीन दिन बाद जब हमने लाहौर की तरफ़ मार्च शुरू किया तो वो आश्चर्यचकित रह गए."

जर्मन मीज़ल से बचे

जनरल हरबख़्श सिंह अपनी पत्नी के साथ

इमेज स्रोत, BBC World Service

इमेज कैप्शन, जनरल हरबख़्श सिंह अपनी पत्नी के साथ.

जनरल हरबख़्श सिंह आगे लिखते हैं कि लड़ाई से एक दिन पहले वो और उनकी पत्नी शिमला के उनके घर में एक ही कमरे में सो रहे थे.

जैसे ही वो फ़ोन उठाने के लिए उठे उन्हें अपनी पत्नी की दो छीकें सुनाई दीं.

उन्होंने तुरंत उसी समय आधी रात को अपना पलंग दूसरे कमरे में लगवाया. बाद में पता चला कि उनकी पत्नी को जर्मन मीज़ल हो गया था जो कि बहुत छूत की बीमारी होती है.

"मेरे लिए ये बताना बहुत मुश्किल हो जाता कि ऐसे समय जब युद्ध चल रहा है, मैं बीमार क्यों पड़ा हुआ हूँ. लोग तरह तरह की अटकलें लगाते. शुक्र है कि मैंने कमरा बदलने का वो फ़ैसला ले लिया वर्ना मुझे बहुत शर्मसार होना पड़ता."

जनरल चौधरी से उनका शो डाउन

हरबख़्श सिंह की बेटी हरमाला गुप्ता बताती हैं कि वो आर्म्ड चेयर्ड जनरल नहीं थे.

वो कहती हैं, "वो फ़ील्ड कमांडर थे और कहा करते थे कि फ़ील्ड में ही जा कर असलियत पता चलती है, पीछे बैठ कर या रिपोर्ट्स से नहीं. वो ये भी मानते थे कि अगर कमांडर आगे जाएगा तो दूसरे भी उत्साहित होंगे और लड़ाई में ज़रूर सफलता मिलेगी."

1965 के युद्ध में कई मामलों में उनके सेनाध्यक्ष जनरल चौधरी से मतभेद थे.

तत्कालीन सेनाध्यक्ष जनरल चौधरी

इमेज स्रोत, bharat rakshak.com

इमेज कैप्शन, तत्कालीन सेनाध्यक्ष जनरल चौधरी मोर्चे पर भारतीय सैनिकों के साथ बातचीत करते हुए.

अपनी आत्मकथा 'इन द लाइन ऑफ़ ड्यूटी' में हरबख़्श सिंह लिखते हैं, "नौ सितंबर की रात ढाई बजे सेनाध्यक्ष ने मुझे फ़ोन मिलाया. उनका कहना था कि भारतीय सेना को पाकिस्तानी हमले से अलग-थलग होने से बचाने के लिए मुझे अपनी सेना को ब्यास नदी के पीछे ले आना चाहिए."

"इसका मतलब था पंजाब के बहुत बड़े भूभाग, जिसमें अमृतसर और गुरदासपुर के ज़िले थे, ख़ाली कर देना. मेरी नज़र में भारतीय सेना के लिए ये 1962 के चीन हमले से भी बुरा झटका होता."

जनरल हरबख़्श सिंह ने ये आदेश मांगने से इंकार कर दिया.

वो अपनी आत्मकथा में लिखते हैं, "मैंने जनरल चौधरी से कहा कि चूँकि ये एक रणनीतिक आदेश है, इसलिए उन्हें इसे युद्ध भूमि में ही आ कर देना होगा, वर्ना आप मुझे लिखित आदेश दीजिए. तय हुआ कि वो मुझसे अंबाला में मिलेंगे. मुझे ये देख कर आश्चर्य हुआ कि जनरल चौधरी के जहाज़ के साथ एक एस्कॉर्ट जहाज़ भी था."

"मैंने स्टेशन कमांडर से उसी समय कहा कि सीमा पर लड़ रहे हमारे सैनिकों को रोज़ इस तरह के विमानों की दरकार होती है. मैं और चीफ़ सीधे ऑपरेशन रूम में गए जहाँ हम दोनों के बीच काफ़ी गर्मागर्मी हुई."

क्रिकेट खेलते जनरल हरबख़्श सिंह

इमेज स्रोत, BBC World Service

इमेज कैप्शन, जनरल हरबख़्श सिंह को खेलों का बहुत शौक था और वो क्रिकेट और हॉकी के अच्छे खिलाड़ी भी थे.

"एक समय वो इतने उत्तेजित हो गए कि मुझे कहना पड़ा कि आपके लिए मेस से बियर मंगवाऊँ? लेकिन मैंने उन्हें ये स्पष्ट कर दिया कि अगर वो कोई रणनीतिक आदेश देना चाहते हैं तो उन्हें मेरे साथ फ़्रंट पर आना होगा और तब मैं तय करूंगा कि मैं उस आदेश का पालन करूँगा या नहीं."

मेजर जनरल पलित भी लिखते हैं, "हरबख़्श सिंह ने जनरल चौधरी से कहा कि वो इतने महत्वपूर्ण मसले पर मौखिक आदेश का पालन नहीं करेंगे. इसके लिए आपको मुझे लिखित आदेश देने होंगे. लिखित आदेश कभी नहीं आए. कुछ ही घंटों में हालात बदल गए जब खेमकरण में भारत के सेंचूरियन टैंकों ने अपने से कहीं बेहतर पैटन टैंकों को धूल चटा दी."

सामरिक मामलों के एक और विशेषज्ञ के सुब्रमण्यम ने भी लिखा है कि जनरल चौधरी ने प्रधानमंत्री शास्त्री से भी ब्यास नदी के पीछे हटने की अनुमति माँगी थी, लेकिन उन्होंने इसकी इजाज़त नहीं दी.

टीकाकार इंदर मल्होत्रा और कुलदीप नैयर ने भी बीबीसी को बताया कि अगर चौधरी की चली होती तो भारत को बहुत बड़े हिस्से से पीछे हटना पड़ता.

कमाडरों को बर्ख़ास्त करने से नहीं हिचके

जनरल हरबख़्श सिंह

इमेज स्रोत, BBC World Service

जनरल हरबख़्श सिंह की बेटी हरमाला गुप्ता याद करती हैं कि लड़ाई के दौरान उन्होंने उन्हें घर पर बहुत कम देखा. वो आते भी थे तो हमेशा अपने कमरे में अपने कमांडरों के साथ टेलीफ़ोन पर बात करते रहते थे ये जानने के लिए कि युद्ध में क्या हो रहा है.

कभी कभी कमरे से बाहर निकलते थे लेकिन हमें कुछ भी नही बताते थे कि लड़ाई में क्या हो रहा है. हम बस अनुमान लगा सकते थे कि सब कुछ ठीक ही चल रहा है.

उनके एडीसी रहे कैप्टेन अमरेंदर सिंह कहते हैं कि वो बहादुरी के हर काम को सराहते थे, लेकिन पेशेवर ग़लती को वो कभी भी माफ़ नहीं करते थे.

1965 में भी जब मेजर जनरल निरंजन प्रसाद आशानुरूप काम नहीं कर पाए तो बीच लड़ाई में भी वो उनको हटाने से नहीं हिचके. उसी तरह जब मेजर जनरल चोपड़ा ने अख़नूर के मोर्चे पर अकुशलता दिखाई तो उन्हें भी हटाने में उन्हें कोई संकोच नहीं हुआ.

पीछे हटने में यकीन नहीं

पूर्व थलसेना अध्यक्ष जनरल वीएन शर्मा
इमेज कैप्शन, पूर्व थलसेना अध्यक्ष जनरल वीएन शर्मा.

उस ज़माने में जनरल चौधरी के स्पेशल असिस्टेंट रहे और बाद में भारत के सेनाध्यक्ष बने जनरल वीएन शर्मा कहते हैं, "जनरल हरबख़्श सिंह बहुत आला अफ़सर थे. लड़ाई के दौरान एक अफ़सर का डट कर खड़ा होना और अपनी कमांड चलाना जैसा वो चाहे, बड़ी ख़ूबी की बात बात होती है. उनका मानना था कि अगर आप दूसरे देश में लड़ रहे हैं तो ज़रूरत पड़ने पर आप अपने सैनिकों को पीछे ले जा सकते हैं."

"लेकिन अगर आप अपने ही देश में लड़ रहे हैं तो पीछे जाने का विकल्प आपके पास है ही नहीं, क्योंकि वो हमारी ज़मीन है, हमारा घर है. हम अपने लोगों को दुश्मन के हवाले कैसे कर सकते हैं. उनके इस रवैये ने देश के नेतृत्व को काफ़ी आत्मविश्वास दिया."

खाना बरबाद करना पसंद नहीं

बीबीसी स्टूडियो में रेहान फ़ज़ल के साथ हरमाला गुप्ता.
इमेज कैप्शन, बीबीसी स्टूडियो में रेहान फ़ज़ल के साथ हरमाला गुप्ता.

हरमाला गुप्ता कहती हैं कि उनका पहला परिवार भारतीय सेना थी. हम दूसरे नंबर पर आते थे. उनको संगीत का काफ़ी शौक था.

पुराने गाने उन्हें बहुत पसंद थे. कभी कभी वो ख़ुद भी गाने की कोशिश करते थे.

उन्हें 'चौदवीं का चाँद' और 'प्यासा' के गाने बहुत पसंद थे और वो अक्सर 'प्यार मांगा लेकिन काँटों का हार मिला' गाना गुनगुनाया करते थे.

वो अक्सर अपनी गाड़ी ख़ुद ड्राइव करते थे और बहुत रैश ड्राइवर थे. उस ज़माने में उनके साथ पायलट जीप चला करती थी और वो अक्सर अपनी पायलट जीप से आगे निकल जाते थे.

हरबख़्श सिंह अपने परिवार के साथ

इमेज स्रोत, HARMALA GUPTA

इमेज कैप्शन, हरबख़्श सिंह अपने परिवार के साथ (दाएं से दूसरे).

हरमाला कहती हैं, "अनुशासन का उनके जीवन में बहुत महत्व था. हमें नाश्ते और दिन के खाने के बीच कुछ भी खाने की मनाही थी."

वो बताती हैं, "कोका कोला भी हमारे लिए मना था. वो जापान में युद्धबंदी भी रह चुके थे, इसलिए उन्हें खाने की अहमियत मालूम थी."

"उनको दो साल तक खाना नहीं मिला, इसलिए वो हमेशा ज़ोर देते थे कि खाना बरबाद नहीं होना चाहिए. जब हम ये कहते थे कि हमें ये नहीं खाना तो उनको ये बात बहुत नागवार गुज़रती थी."

हर पाकिस्तानी सैनिकों का सम्मान

जनरल हरबख़्श सिंह और बख्तियार राना के साथ

इमेज स्रोत, HARMALA GUPTA

इमेज कैप्शन, जनरल हरबख़्श सिंह अपने समकक्ष पाकिस्तानी जनरल बख़्तियार राना के साथ.

हरमाला बताती हैं, "उन्होंने पाकिस्तान में युद्ध मे जीती गई हर मस्जिद की मरम्मत करवा कर उसे वापस किया. इसके अलावा उन्हें जिस भी पाकिस्तानी सैनिक का शव मिला, उसे उन्होंने पूरे सैनिक सम्मान के साथ दफ़नवाया."

"मैं ये भी बताना चाहूँगी कि पाकिस्तानी की तरफ़ से उनके काउंटरपार्ट जनरल बख़्तियार राना उनके दोस्त और बैचमेट थे. वो लाहौर गवर्नमेंट कॉलेज में साथ साथ पढ़े थे. मुझे याद है कि जब युद्ध विराम के बाद भारत और पाकिस्तान में बातचीत हो रही थी तो संयुक्त राष्ट्र से भेजे गए चिली के जनरल मरंबियो ने पाकिस्तान का टेंट एक तरफ़ रखा और भारत का दूसरी तरफ़."

"जब मेरे पिता वहाँ पहुंचे तो उन्होंने कहा कहाँ हैं जनरल राना. मैं उनसे मिलना चाहता हूँ. कितने साल हो गए हैं उनसे मिले हुए. उन्होंने जैसे ही जनरल राना को देखा अपनी बाँहों में भर लिया. अश्चर्यचकित जनरल मरंबियों ने कहा कि मुझे तो समझ में ही नहीं आ रहा कि तुम लोग लड़ क्यों रहे हो आपस में. लड़ाई किस बात पर है?"

शास्त्री ने तलवार भेंट की

तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री, जनरल हरबख़्श सिंह को तलवार भेंट करते हुए.

इमेज स्रोत, BBC World Service

इमेज कैप्शन, तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री, जनरल हरबख़्श सिंह को तलवार भेंट करते हुए.

1965 के युद्ध के बाद दिल्ली के सिख समुदाय ने बंगलासाहब गुरुद्वारे में प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री और जनरल हरबख़्श सिंह को सरोपा दे कर सम्मानित किया.

उन्होंने लाल बहादुर शास्त्री को एक तलवार भेंट की जिसका क़द उनसे भी बड़ा था. शास्त्री ने अपने बगल में बैठे जनरल हरबख़्श सिंह को हाथ पकड़ उठाया और वो तलवार उन्हें भेंट कर दी.

शास्त्री बोले, "मैं तो धोती प्रसाद हूँ, पर मेरे जनरल धोती प्रसाद नहीं हैं." वो तलवार आज भी जनरल हरबख़्श सिंह के परिवार के पास है.

<bold>(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए <link type="page"><caption> यहां क्लिक</caption><url href="https://play.google.com/store/apps/details?id=uk.co.bbc.hindi" platform="highweb"/></link> करें. आप हमें <link type="page"><caption> फ़ेसबुक</caption><url href="https://www.facebook.com/bbchindi" platform="highweb"/></link> और <link type="page"><caption> ट्विटर</caption><url href="https://twitter.com/BBCHindi" platform="highweb"/></link> पर भी फ़ॉलो कर सकते हैं.)</bold>