1965: जब पाकिस्तान ने युद्ध के बीच जनरल को हटाया

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- Author, रेहान फ़ज़ल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
एक सितंबर को सुबह साढ़े तीन बजे छंब के भारतीय ठिकानों पर पाकिस्तानी गोलाबारी इतनी तेज़ थी कि भारतीय सैनिक हतप्रभ उसे देखते भर रह गए. डेढ़ घंटे बाद जब पाकिस्तानी सैनिकों ने भयानक गोलाबारी के बीच आगे बढ़ना शुरू किया तो उन्हें ख़ास प्रतिरोध का सामना नहीं करना पड़ा.
दोपहर तक पाकिस्तानी टैंकों ने भारत की पहली रक्षण पंक्ति को तहस-नहस करते हुए छंब को घेरने की तैयारी शुरू कर दी थी. पाकिस्तानी सैनिक भारतीय सैनिकों के इतने नज़दीक पहुंच गए कि जब भारतीय सैनिकों की संकट पुकार पर भारतीय वायु सेना ने बढ़ती पाकिस्तानी सेना पर बमबारी शुरू की तो उसके कुछ बम भारतीय ठिकानों पर भी गिरे.
बुरी तरह से घिरे भारतीय सैनिकों ने पाकिस्तानी टैंकों के सामने अपने पुराने सेंचुरियन टैंकों को आगे लाना चाहा लेकिन एक तो सेंचुरियंस का पैटन टैंकों से कोई मुकाबला नहीं था और दूसरे उन्हें वैसे भी आगे नहीं भेजा सकता था क्योंकि अख़नूर का पुल उनके बोझ को सहने में सक्षम नहीं था.
जनरल मलिक हटाए गए
इस पाकिस्तानी हमले ने भारतीय रक्षण पंक्ति में इतना बड़ा छेद किया कि ये बिल्कुल तय लगने लगा कि अगले 24 घंटों में अख़नूर भी पाकिस्तान की झोली में चला जाएगा. पाकिस्तानियों को जब तक ये जानकारी नहीं मिल पाई थी कि भारत की 191 ब्रिगेड ने रातों रात छंब से पीछे हट कर तवी नदी के पूर्व में अख़नूर की तरफ़ पोज़ीशन ले ली थी.

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इसी बीच पाकिस्तान के तत्कालीन सेनाध्यक्ष जनरल मूसा मेजर जनरल याहिया ख़ाँ की 7 डिवीज़न के मुख्यालय पर हेलिकॉप्टर से पहुंचे और अख़नूर पर हमला कर रही डिवीजन के प्रमुख मेजर जनरल अख़्तर हुसैन मलिक को भी वहाँ बुलवा भेजा.
मूसा ने तुरंत प्रभाव से याहिया को मलिक की कमान लेने के लिए कहा और इससे भी नाटकीय स्थिति तब पैदा हो गई जब मूसा ने मलिक को अपने हेलिकॉप्टर में रावलपिंडी चलने के लिए कहा. जनरल मलिक ने इस बात को सार्वजनिक कभी नहीं किया कि ऐसे समय जब वो अख़नूर पर कब्ज़ा करने के इतने निकट थे, उन्हें कमान से क्यों हटाया गया?
बाद में उन्होंने अपने भाई को एक पत्र ज़रूर लिखा जिसको गुलज़ार अहमद ने अपनी पुस्तक पाकिस्तान मीट इंडियन चैलेंज में इस तरह से लिखा-
"छंब पर कब्ज़ा होने के एक दिन बाद ही कमान का नेतृत्व बदल दिया गया. मुझे आधिकारिक तौर पर इसकी सूचना मिलने से पहले 10 ब्रिगेड के कमांडर ब्रिगेडियर अज़मत हयात ने मुझसे वायरलेस संपर्क तोड़ लिया. अगले दिन जब मैंने उनसे इसका कारण पूछा तो उन्होंने शर्मसार होते हुए झिझकते हुए मुझे सूचित किया कि वो अब याहिया के ब्रिगेडियर हैं. मुझे कोई शक नहीं कि याहिया ने उनसे एक दिन पहले ही संपर्क कर कह दिया था कि अब वो मुझसे कोई आदेश न लें. ये मेरे साथ बहुत बड़ा धोखा था जिसके कई आयाम थे."
फ़ैसला पहले हो चुका था

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फ़ारूख़ बाजवा अपनी किताब फ़्रॉम कच्छ टू ताशकंद में लिखते हैं, "इस तरह का बड़ा फ़ैसला मूसा सिर्फ़ अपने बल पर नहीं ले सकते थे. उन्होंने हमेशा अयूब के संदेश वाहक की तरह काम किया. फ़ैसला अयूब ने किया था जिसे अमली जामा मूसा ने पहनाया."
हालांकि मूसा ने बाद में अपनी आत्मकथा माई वर्जन में लिखा, "छंब में कमान के बदलाव की बात पहले ही तय हो गई थी. फ़ैसला बाद में नहीं हुआ. आज़ाद कश्मीर में कमांडर होने के नाते मलिक को इलाके और दुश्मन के ठिकानों की जानकारी थी. हम आज़ाद कश्मीर से भारत पर जवाबी हमला करना चाह रहे थे और हम चाहते थे कि जनरल मलिक उसकी कमान संभालें."
मूसा आगे लिखते हैं कि मलिक को आगे लड़ते रहने देने की अनुमति देना इसलिए भी ग़लत होता क्योंकि वो अपने मुख्यालय से काफ़ी दूर हो जाते. अयूब के जीवनीकार अल्ताफ़ गौहर का मानना है कि अयूब ने ये फ़ैसला इसलिए किया क्योंकि वो भारत के ख़िलाफ़ अभियान को यहीं रोक देना चाहते थे. इसकी ज़िम्मेदारी उन्होंने जनरल याहिया ख़ाँ को सौंपी जो तब तक बेइंतहा शराब पीने लगे थे क्योंकि उन्हें तब तक युद्ध में कोई बड़ी भूमिका नहीं मिली थी. गौहर की किताब में मूसा की थ्योरी का कोई ज़िक्र नहीं है.
मूसा का फ़ैसला

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पाकिस्तान के एक और सैन्य इतिहासकार शौकत कादिर अपने लेख ‘1965 वार - कॉमेडी ऑफ़ एरर्स’ में लिखते हैं, "बीच मँझधार में कमान बदलने का फ़ैसला जनरल मूसा का था और उन्होंने इस बारे में जनरल हेडक्वार्टर्स से सिग्नल भेज कर इसकी पुष्टि भी की थी. मूसा इस बात से ख़फा थे कि मलिक ने उन्हें ऑपरेशन जिब्राल्टर के बारे में लूप में नहीं रखा था और वो सीधे जनरल अयूब से संपर्क में थे. बहरहाल इस सब का नतीजा ये हुआ कि बहुत कीमती समय ज़ाया हो गया और जनरल याहिया को चीज़ों को समझने में समय लगा और तब तक भारत ने अख़नूर में अपनी स्थिति मज़बूत कर ली."
ऑपरेशन ग्रैंड स्लैम एक सितंबर को शुरू हुआ था और अगले 24 घंटे में ही उसने अपने सभी लक्ष्य पूरे कर लिए थे. उसने भारतीय सेना के मनोबल को गहरा धक्का पहुंचाया था और भारतीय सूत्र भी स्वीकार करते हैं कि पाकिस्तान उस समय अख़नूर पर कब्ज़ा करने के कगार पर था. सवाल उठता है कि ऐसे समय में जनरल मलिक को क्यों बदला गया और कमान जनरल याहिया को क्यों दी गई जिनकी छवि उस समय पाकिस्तानी सेना में एक ’शराबी’ की थी.
मातहत बन कर लड़ने के लिए तैयार
पाकिस्तान के उस समय के निदेशक मिलिट्री ऑपरेशन, जनरल गुल हसन अपनी आत्मकथा में लिखते हैं, "मैं इस फ़ैसले से भौंचक्का रह गया. कुछ ही देर पहले मलिक ने मुझे फ़ोन पर बताया था कि वो अगले 72 घंटों में अख़नूर पर कब्ज़ा कर लेंगे."
गुल हसन ये भी लिखते हैं कि वो मलिक को जितना जानते हैं, उसके आधार पर कह सकते हैं कि अगर उन्हें पहले से बताया गया होता कि उन्हें सिर्फ़ तवी नदी तक ऑपरेशन का नेतृत्व करना है तो उन्होंने इसकी ज़िम्मेदारी लेने से साफ़ इनकार कर दिया होता.

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लेफ़्टिनेंट जनरल महमूद अहमद अपनी किताब हिस्ट्री ऑफ़ इंडो-पाक वार 1965 में लिखते हैं कि याहिया ने उन्हें खुद बताया था, "मुझे वास्तव में अख़नूर पर कब्ज़े के बाद कमान संभालनी थी. नेतृत्व में बदलाव अख़नूर पर कब्ज़े के बाद होना चाहिए था. लेकिन जनरल मलिक 2 सितंबर की दोपहर तक तवी नदी नहीं पार कर पाए. शायद इस वजह से जनरल मूसा नाराज़ हो गए. वो ख़ुद मौके पर आए और उन्होंने मुझसे तुरंत कमान संभालने के लिए कहा."
जनरल मलिक अपने भाई को लिखे पत्र में कहते हैं, "अयूब, मूसा और याहिया ने उन्हें कभी भी कमान से हटाए जाने का कारण नहीं बताया. मैंने तो याहिया से यहाँ तक कहा कि अगर आप इस जीत का श्रेय लेना चाहते हैं तो मुझे अपना मातहत बन कर अख़नूर जाने की अनुमति दीजिए लेकिन याहिया ने मेरी बात मानने से इनकार कर दिया."
‘अख़नूर लेने के लिए कहा ही नहीं’

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फ़ारूख बाजवा ने बीबीसी को बताया कि शायद इसका ये कारण भी हो सकता है कि अयूब याहिया के नज़दीकी दोस्त थे और मलिक के ज़्यादा करीब नहीं थे. अख़नूर पर कब्ज़ा क़रीब क़रीब निश्चित था. या तो याहिया ने अयूब पर दबाव डाला कि उन्हें ग्रैंड स्लैम की कमान दी जाए या अयूब ने अपने पुराने दोस्त को यश कमाने में मदद करने का फ़ैसला किया.
अख़नूर पर पाकिस्तान का कभी कब्ज़ा नहीं हो पाया. लड़ाई के बाद ब्रिगेडियर एए के चौधरी ने याहिया ख़ाँ से पूछा भी कि आपने अख़नूर पर क्यों नहीं कब़्ज़ा किया जबकि आपके पास ऐसा करने के पूरे मौके थे. याहिया का जवाब था, "मुझसे अख़नूर लेने के लिए कभी कहा ही नहीं गया."
मलिक को इसके बाद नॉन ऑपरेशनल कमान संभालने के लिए पहले काकूल की पाकिस्तान मिलिट्री अकादमी में भेजा गया और फिर तुर्की में पाकिस्तानी दूतावास में मिलिट्री अटाशे बना दिया गया. जनरल अयूब के बेटे और उनके एडीसी रहे गौहर अयूब खाँ ने बीबीसी को बताया कि 6 सितंबर को जब वो विदेश मंत्री भुट्टो से मिलने उनके घर पहुंचे तो उन्होंने बाथरूम जाने की इच्छा प्रकट की.

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उन्हें एक कमरे में ले जाया गया जहाँ एक पलंग पर शराब में धुत्त जनरल अख़्तर हुसैन मलिक पड़े हुए थे. उन्होंने बताया, "मैं जब कमरे में घुसा तो उन्होंने बिस्तर से उठने की कोशिश भी नहीं की. हमारी एक दूसरे से सलाम दुआ ज़रूर हुई लेकिन शायद उन्होंने मुझे पहचाना नहीं. जब मैंने भुट्टो से पूछा कि मेजर जनरल मलिक अपने मुख्यालय मरी में न हो कर आपके यहाँ क्यों पड़े हुए हैं तो उन्होंने सिर्फ़ अपने कंधे उचका दिए."
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