1965: एक सड़क की वजह से शुरू हुई थी लड़ाई

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    • Author, रेहान फ़ज़ल
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली

बहुत कम लोगों को पता है कि 1965 के भारत पाकिस्तान युद्ध की नींव कच्छ के लगभग अनजान और बियाबान इलाके में हुई सीमित मुठभेड़ से रखी गई थी.

ये पूरा इलाका एक तरह का रेगिस्तान था जहाँ कुछ चरवाहे कभी-कभार अपने गधों को चराने जाया करते थे या भूले-भटके कभी पुलिस वालों का दल गश्त लगा लिया करता था.

STY400913651965: एक सड़क की वजह से शुरू हुई थी लड़ाई1965: एक सड़क की वजह से शुरू हुई थी लड़ाईकच्छ के रण में पाकिस्तानी सेना ने कच्ची सड़क बनाई थी जो भारत के साथ युद्ध का कारण बनी. 2015-08-16T20:33:32+05:302015-09-02T17:41:37+05:302015-09-02T19:35:15+05:302015-09-25T15:55:29+05:30PUBLISHEDhitopcat2

सामरिक रूप से यहाँ पाकिस्तान बहुत फ़ायदे में था क्योंकि उस इलाके से 26 मील की दूरी पर उनका रेलवे स्टेशन बादीन था जहाँ से कराची की रेल से दूरी मात्र 113 मील थी. पाकिस्तान की 8वीं डिवीजन का मुख्यालय यहीं पर था.

दूसरी तरफ़ भारत की ओर से कच्छ के रण में पहुंचने के सभी रास्ते बहुत दुर्गम थे. सबसे नज़दीक 31वीं ब्रिगेड अहमदाबाद में थी जो वहाँ के सबसे नज़दीक रेलवे स्टेशन भुज से 180 किलोमीटर दूर में था. भुज यूँ तो रण का एक छोटा शहर था लेकिन विवादित भारत पाकिस्तान सीमा से 110 मील दूर था.

सड़क थी लड़ाई की जड़

1965 के युद्ध में पाकिस्तानी जनरल टिक्का ख़ान की अहम भूमिका रही थी.

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इमेज कैप्शन, 1965 के युद्ध में पाकिस्तानी जनरल टिक्का ख़ान की अहम भूमिका रही थी.

झगड़े की शुरुआत तब हुई जब भारतीय सुरक्षा बलों को पता चला कि पाकिस्तान ने डींग और सुराई को जोड़ने के लिए 18 मील लंबी एक कच्ची सड़क बना ली है. ये सड़क कई जगहों पर भारतीय सीमा के डेढ़ मील अंदर तक जाती थी. भारत ने स्थानीय और कूटनीतिक स्तर पर विरोध जताया था.

पाकिस्तान ने इसके जवाब में 51वीं ब्रिगेड के कमांडर ब्रिगेडियर अज़हर को इस इलाके की और आक्रामक गश्त लगाने के आदेश दिए थे. उधर मार्च आते-आते भारत ने कंजरकोट के करीब आधा किलोमीटर दक्षिण में सरदार चौकी बना ली.

पाकिस्तान के कमांडर मेजर जनरल टिक्का खाँ ने ब्रिगेडियर अज़हर को आदेश दिया कि हमला कर भारत की नई बनी सरदार चौकी को तहस-नहस कर दिया जाए.

दोनों तरफ़ से ग़लत फ़ैसले

कच्छ में सरदार चौकी पर पाकिस्तानी सैनिकों की गतिविधियों की निगरानी करते हुए भारतीय सैनिक.

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9 अप्रैल की सुबह दो बजे पाकिस्तानी हमला शुरू हुआ. उन्हें सरदार चौकी, जंगल और शालीमार नाम की दो और भारतीय चौकियों पर कब्ज़ा करने का हुक्म दिया गया.

शालीमार चौकी पर तैनात स्पेशल रिज़र्व पुलिस के जवान, मशीन गन और मोर्टर फ़ायर के कवर में आगे बढ़ते हुए पाकिस्तानी सैनिकों का मुकाबला नहीं कर पाए, हालांकि सरदार चौकी पर तैनात पुलिसकर्मियों ने कड़ा प्रतिरोध किया. 14 घंटे चले आक्रमण के बाद ब्रिगेडियर अज़हर ने गोलाबारी रोकने के आदेश दिए.

इस बीच सरदार चौकी की हिफ़ाज़त में लगे पुलिसकर्मी दो मील पीछे विजियोकोट चौकी पर चले आए. पाकिस्तानियों को इसका पता नहीं चला और उन्होंने भी अपने सैनिकों को वापस उस स्थान पर लौटने का आदेश दिया जहाँ से उन्होंने सुबह हमला शुरू किया था. शाम को पीछे आ चुके एसआरपी के जवानों को आभास हुआ कि सरदार चौकी पर कोई भी पाकिस्तानी सैनिक नहीं है.

1965 के युद्ध के दौरान भारतीय वायुसेना के प्रमुख अर्जन सिंह और पाकिस्तान वायुसेना के प्रमुख नूर ख़ान.

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उन्होंने शाम होते-होते बिना लड़े दोबारा उस चौकी पर नियंत्रण कर लिया. बीसी चक्रवर्ती ने अपनी किताब हिस्ट्री ऑफ़ इंडो-पाक वार, 1965 में टिप्पणी की है, "पाकिस्तान की 51वीं ब्रिगेड के कमांडर ने उतने ही अनाड़ीपन से ऑपरेशन को हैंडल किया जितना भारत की 31वीं इंफ़ैंट्री ब्रिगेड के ब्रिगेडियर पहलजानी ने."

सुंदरजी की सलाह नहीं मानी गई

भारत ने स्थिति की गंभीरता को देखते हुए मेजर जनरल डुन को मुंबई से कच्छ भेजा. पाकिस्तान ने भी इस बीच पूरी 8वीं इंफ़ैंट्री डिवीजन को कराची से पाकिस्तानी शहर हैदराबाद बुला लिया.

उस समय इलाके में ब्रिगेड कमांडर की भूमिका निभा रहे लेफ़्टिनेंट कर्नल सुंदरजी ने पुलिस की वर्दी पहनकर इलाके का निरीक्षण किया और सलाह दी की भारत को कंजरकोट पर हमला कर देना चाहिए.

लेफ़्टिनेंट जनरल सुंदरजी ऑपरेशन ब्लू स्टार के दौरान जेनरल वैद्या के साथ.

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लेकिन सरकार ने उनकी बात नहीं मानी. बाद में यही सुंदरजी भारतीय सेनाध्यक्ष बने और इसी इलाके में उन्होंने 1987 में मशहूर ब्रासस्टैक अभ्यास किया जिसकी वजह से भारत और पाकिस्तान की सेनाएं लगभग युद्ध के कगार पर पहुंच गईं.

इस बीच दिलचस्प बात ये हुई कि पाकिस्तानी वायु सेनाध्यक्ष एयर मार्शल असग़र ख़ाँ ने भारतीय वायु सेनाध्यक्ष एयर मार्शल अर्जन सिंह को फ़ोन कर पेशकश की कि दोनों देशों की वायु सेना इस लड़ाई से अपने आप को अलग रखें.

अर्जन सिंह ने उनकी ये सलाह मान ली लेकिन असग़र ख़ाँ ने इस पेशकश पर फ़ील्ड मार्शल अयूब ख़ाँ की सहमति नहीं ली थी.

हालांकि असग़र ख़ाँ ने अपनी आत्मकथा 'द फर्स्ट राउंड' में इस घटना का ज़िक्र नहीं किया है, लेकिन बाद में ये क़यास लगाए गए कि शायद इसी के कारण युद्ध शुरु होने से मात्र दस दिन पहले अयूब ख़ाँ ने उन्हें उनके पद से हटाकर एयर मार्शल नूर ख़ां को पाकिस्तानी वायु सेना का नया प्रमुख बना दिया था.

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भारत की शर्मिंदगी

24 अप्रैल को ब्रिगेडियर इफ़्तिकार जुनजुआ (जो बाद में पाकिस्तान के थल सेनाध्यक्ष बने) के नेतृत्व में पाकिस्तानी सैनिकों ने सेरा बेत पर कब्ज़ा कर लिया.

उन्होंने इसके लिए पूरी दो टैंक रेजिमेंटों और तोपख़ाने का इस्तेमाल किया और भारतीय सैनिकों को पीछे हटना पड़ा. अगले दो दिनों में भारतीय सैनिकों को बियर बेत की चौकी भी खाली करनी पड़ी.

1965 के युद्ध से ठीक पहले पाकिस्तान वायुसेना प्रमुख एयर मार्शल असगर ख़ान को उनके पद से हटा दिया गया था.
इमेज कैप्शन, 1965 के युद्ध से ठीक पहले पाकिस्तान वायुसेना प्रमुख एयर मार्शल असगर ख़ान को उनके पद से हटा दिया गया था.

भारत को उस समय और शर्मसार होना पड़ा जब पाकिस्तान ने देशी और विदेशी पत्रकारों को बुलाकर भारतीय सैनिकों के छोड़े हुए हथियार और गोला बारूद दिखाए.

पाकिस्तान को ग़लतफ़हमी

बाद में ब्रिटेन के हस्तक्षेप से दोनों सेनाएं अपने पुराने मोर्चे पर वापस चली गईं. फ़ारूख़ बाजवा ने अपनी किताब 'फ़्रॉम कच्छ टू ताशकंद' में लिखा कि इससे पाकिस्तानी सेना को कम-से-कम सीमित स्तर पर ही सही, भारतीय सेना की क्षमता को आज़माने का मौका मिला.

भारत के तत्कालीन उप सेनाध्यक्ष जनरल कुमारमंगलम ने कहा, "भारत के लिए कच्छ की लड़ाई सही दुश्मन के साथ ग़लत समय पर ग़लत लड़ाई थी.'' इस लड़ाई में पाकिस्तान भारत पर भारी पड़ा लेकिन इसकी वजह से "पाकिस्तान को ये ग़लतफ़हमी भी हो गई और इसका उन्हें बहुत नुकसान भी हुआ कि कश्मीर की लड़ाई उनके लिए एक केकवॉक साबित होगी."

पाकिस्तान में भारत के पूर्व उच्चायुक्त शंकर बाजपेयी के साथ रेहान फ़ज़ल.
इमेज कैप्शन, पाकिस्तान में भारत के पूर्व उच्चायुक्त शंकर बाजपेयी के साथ रेहान फ़ज़ल.

पाकिस्तान में भारत के पूर्व उच्चायुक्त शंकर बाजपेई का कहना है कि ये मुठभेड़ भारत के लिए वरदान साबित हुई क्योंकि वो पाकिस्तान के मंसूबों के प्रति सजग हो गए. तीन महीने बाद जब पाकिस्तान ने ऑपरेशन जिब्राल्टर के तहत अपने घुसपैठिए कश्मीर में घुसाए तो भारतीय सेना उनसे निपटने के लिए पहले से तैयार थी.

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