पंजाब में जोखिम से जूझती 'आप'

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- Author, प्रमोद जोशी
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
भ्रष्टाचार-विरोधी आंदोलन के सहारे बनी आम आदमी पार्टी अपने गठन के समय से ही अंतर्विरोधों की शिकार है. वह सत्ता और आंदोलन की राजनीति में अंतर नहीं कर पा रही है.
पार्टी 'एक नेता' और 'आंतरिक लोकतंत्र के अंतर्विरोध' को सुलझा नहीं पा रही है. इसके कारण वह देश के दूसरे इलाक़ों में प्रवेश की रणनीति बना नहीं पा रही है.
पार्टी की पंजाब शाखा इसी उलझन में है, जहाँ हाल में उसके केंद्रीय नेतृत्व ने (दूसरे शब्दों में अरविंद केजरीवाल) दो सांसदों को निलंबित करके अपने पैरों पर कुल्हाड़ी मार ली है.
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दिल्ली के बाद पंजाब में पार्टी का अच्छा प्रभाव है. संसद में उसकी उपस्थिति पंजाब के कारण ही है, जहाँ से लोक सभा में चार सदस्य हैं.
पंजाब में कांग्रेस, शिरोमणि अकाली दल और बीजेपी के नेता मानते हैं कि उन्हें सबसे बड़ा ख़तरा 'आप' से है.
'आप' का सेल्फ गोल
पंजाब की जनता को भी 'आप' में विकल्प नज़र आता है.
उम्मीद थी कि अकाली सरकार के ख़िलाफ़ 'एंटी इनकम्बैंसी' को देखते हुए वहाँ कांग्रेस पार्टी अपने प्रभाव का विस्तार करेगी, पर वह भी धड़ेबाज़ी की शिकार है.
ऐसे में 'आप' की संभावनाएं बेहतर हैं, पर लगता है कि यह पार्टी भी सेल्फ़ गोल में यक़ीन करती है.
पार्टी ने हाल में पटियाला के सासंद धर्मवीर गांधी और फ़तेहगढ़ साहिब से जीतकर आए हरिंदर सिंह ख़ालसा को अनुशासनहीनता के आरोप में निलंबित किया है. दोनों का मज़बूत जनाधार है.
मनमुटाव की शुरुआत

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केजरीवाल और प्रशांत भूषण के टकराव के दौरान इस मनमुटाव की शुरुआत हुई थी. तब से धर्मवीर गांधी योगेंद्र यादव के साथ हैं. शुरू में हरिंदर सिंह खालसा का रुख़ साफ़ नहीं था, पर अंततः वे भी केंद्रीय नेतृत्व के ख़िलाफ़ हो गए.
इन दोनों नेताओं को समझ में आता है कि प्रदेश में लहर उनके पक्ष में है. दूसरी ओर पार्टी नेतृत्व को लगता है कि पार्टी से अलग होने के बाद किसी नेता की पहचान क़ायम नहीं रहती.
बाग़ी जाएंगे कहाँ?

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पार्टी के राज्य संयोजक सुच्चा सिंह छोटेपुर मानते हैं कि जिस तरह जसवंत सिंह, उमा भारती और कल्याण सिंह जैसे नेता भाजपा से हटने के बाद महत्वहीन हो गए उसी तरह 'आप' के बाग़ी परकटे पंछी जैसे रह जाएंगे. वे नहीं देख पा रहे हैं कि पंजाब में उनका संगठनात्मक आधार ही नहीं बना है.
केजरीवाल से अलग होने के बाद योगेंद्र यादव ने स्वराज अभियान की शुरुआत की है. हालांकि यह राजनीतिक दल नहीं है, पर लगता है कि वर्ष 2017 में पंजाब के विधानसभा चुनाव में 'आप' का समांतर गुट भी मैदान में उतरेगा.
रक्षाबंधन के मौक़े पर बाबा बकाला में पार्टी ने सम्मेलन बुलाया था, जिसके समांतर गांधी और खालसा ने भी सभा की. यह सीधी बग़ावत थी जिसे देखते हुए पार्टी ने कड़ा रुख़ अख़्तियार किया.
बग़ावत की शुरुआत

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बग़ावत की शुरुआत तब हुई जब जुलाई में पार्टी की राज्य अनुशासन समिति के अध्यक्ष डॉ दलजीत सिंह को बर्ख़ास्त किया गया. डॉ दलजीत सिंह सम्मानित समाजसेवी हैं. वे पिछले चुनाव में अमृतसर से अरुण जेटली और कैप्टन अमरिंदर सिंह के ख़िलाफ़ चुनाव लड़ चुके हैं. उन्हें अच्छे वोट मिले थे.
उनकी बर्ख़ास्तगी के बाद भाई बलदीप सिंह और ज्योति मान हटाए गए, जिन्होंने पिछली बार लोकसभा चुनाव पार्टी टिकट पर लड़ा था. इनके अलावा सुमेल सिंह सिद्धू और मंजीत सिंह भी हटाए गए. ये सब योगेंद्र यादव के क़रीबी बताए जाते हैं.
कितने किंतु-परंतु
पंजाब में जनता अकाली-भाजपा सरकार से नाराज़ है. वह कांग्रेस को भी विकल्प के रूप में नहीं देख रही है. अविभाजित 'आप' के लिए यह सुनहरा मौक़ा था, फ़िलहाल उसके सामने कई किंतु-परंतु हैं.
पंजाब में विधानसभा की 117 सीटें हैं. सरकार बनाने के लिए 59 सीटों की दरकार होगी. लोकसभा के पिछले चुनाव में पार्टी 36 विधानसभा सीटों पर आगे थी और 25 में दूसरे स्थान पर थी.
हाल में पार्टी ने सदस्यता अभियान चलाया है, जिसमें तक़रीबन साढ़े 16 लाख नए सदस्यों के जुड़ने की ख़बरें हैं. पिछले लोकसभा चुनाव में पार्टी को लगभग 33 लाख वोट मिले थे, जो कुल पड़े वोटों का 30.8 फीसदी था. इतने ही वोट शिरोमणि अकाली दल को मिले.
माना जा रहा है कि 16.5 लाख नए सदस्य 25 से 30 लाख नए वोटर ले आएंगे, जिससे उसके वोटों की संख्या 40 फीसदी या उससे ज्यादा तक हो सकती है. त्रिकोणीय संघर्ष में इतने वोट आसानी से पूर्ण बहुमत दिला सकते हैं.
'आप' बनाम 'आप'

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सवाल है यदि 'आप' के मुक़ाबले एक और 'आप' हो तब क्या होगा? इन दोनों निलंबित सांसदों के प्रभाव क्षेत्र में 18 विधानसभा सीटें हैं.
पंजाब में झगड़ा इस बात को लेकर है कि मुख्यमंत्री पद का प्रत्याशी कौन होगा? चारों सांसद और शायद पार्टी के राज्य संयोजक छोटेपुर भी इसके दावेदार हैं.
'बाग़ी आम आदमियों' ने चुनाव की तैयारी अभी से शुरू कर दी है.
कॉमेडियन भगवंत मान के मुक़ाबले वे पंजाबी गायक रब्बी शेरगिल को अपने साथ ले आए हैं. बाबा बकाला में शेरगिल ने 'आप' पर जमकर हमला बोला और कहा कि पार्टी अपने रास्ते से भटक चुकी है.
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